डेयरी चलाने वालों के पास हर दिन गोबर निकलता है। आगर-मालवा के एक पशुपालक ने इसी गोबर को कमाई का जरिया बनाया। जितेंद्र खजूरिया डेयरी के गोबर से जैविक खाद बना रहे हैं। इससे हर साल करीब 3.60 लाख रुपए की अतिरिक्त आय हो रही है।
डेयरी और जैविक खाद का काम साथ-साथ
आगर मालवा जिले में जितेंद्र खजूरिया का फार्म है। उन्होंने महाकाल एग्रो ऑर्गेनिक एवं डेयरी फार्म की स्थापना की है। यहां डेयरी का काम और जैविक खाद बनाने का काम साथ चलता है। डेयरी से मिलने वाला गोबर खाद बनाने में काम आता है। इसके अलावा दूसरे जैविक अवशेष भी इस्तेमाल हो रहे हैं।
सेवा संकल्प अभियान की प्रेरणा
यह पहल सरकार के सेवा संकल्प अभियान से जुड़ी है। अभियान में आगर मालवा के खेती और पशुपालन नवाचार को बढ़ावा मिल रहा है। जैविक खेती को भी बढ़ावा देने की बात कही गई है। जितेंद्र ने इसी पहल से प्रेरणा लेकर अपना फार्म शुरू किया।
सेवा संकल्प अभियान 17 सितंबर से 17 अक्टूबर 2026 तक चलना है। यह अभियान प्रधानमंत्री मोदी की लोक सेवा के 25 साल पर है। मध्य प्रदेश में 2026 को कृषक कल्याण वर्ष घोषित किया गया है। सरकार खेती के साथ पशुपालन और उद्यानिकी पर भी ध्यान दे रही है।
एचडीपीई वर्मी यूनिट क्या है
जितेंद्र ने अपनी इकाई में HDPE (High-Density Polyethylene) वर्मी खाद यूनिट लगाई है। इसमें अस्थायी HDPE बेड बनाकर खाद तैयार की जाती है। HDPE एक मजबूत प्लास्टिक होता है। वर्मी खाद केंचुओं की मदद से बनने वाली जैविक खाद है। केंचुए गोबर और जैविक कचरे को खाद में बदलते हैं।
400 क्विंटल खाद, 3.60 लाख आय
हितग्राही की जानकारी के अनुसार साल में करीब 400 क्विंटल जैविक खाद बनती है। खाद बनाने का काम नियमित रूप से चल रहा है। इससे जितेंद्र को हर साल करीब 3.60 लाख रुपए की आय मिल रही है। यह आय डेयरी की कमाई के अलावा है।
400 क्विंटल यानी 40,000 किलो खाद। इस हिसाब से औसत भाव करीब 900 रुपए प्रति क्विंटल बैठता है। यानी करीब 9 रुपए प्रति किलो। 3.60 लाख रुपए साल का मतलब करीब 30 हजार रुपए महीना है।
पशुपालन और खाद का जोड़
जितेंद्र ने गोबर का इस्तेमाल खाद बनाने में किया है। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग हो रहा है। रिपोर्ट इसे जैविक संसाधनों का पुनर्चक्रण बताती है। पुनर्चक्रण यानी बेकार समझी जाने वाली चीज को दोबारा काम में लाना। इससे जैविक खेती को भी बढ़ावा मिलता है।
आम तौर पर डेयरी से रोज गोबर मिलता है। इसे खाद में बदलें तो कच्चा माल अपने ही फार्म से मिलता है। इस तरह डेयरी की एक उप-उपज से अलग आमदनी बन सकती है। यह मॉडल पशुपालकों के लिए सोचने का एक तरीका है। पर हर फार्म पर नतीजे एक जैसे नहीं होंगे।
किसानों के लिए क्या सीख
पहली सीख यह है कि गोबर बेकार नहीं, संसाधन है। जिन किसानों के पास पशु हैं, वे इसे खाद में बदल सकते हैं। खाद अपने खेत में भी काम आ सकती है। जरूरत से ज्यादा खाद बेची भी जा सकती है।
दूसरी सीख यह है कि पैमाने का हिसाब जरूर लगाएं। जितेंद्र के फार्म पर कितने पशु हैं, यह रिपोर्ट में नहीं है। यह भी नहीं बताया गया कि यूनिट में कितना निवेश हुआ। इकाई पर कोई सरकारी सहायता मिली या नहीं, यह भी साफ नहीं है। इसलिए इसे सीधे हूबहू दोहराने से पहले पूरी जानकारी लें।
तीसरी सीख यह है कि खाद की गुणवत्ता और बाजार पर ध्यान दें। खरीदार भरोसा तभी करता है जब खाद ठीक से बनी हो। रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि खाद कहां और किसे बेची जाती है। किसान बिक्री की जगह पहले से तय कर लें।
चौथी सीख प्रशिक्षण से जुड़ी है। वर्मी खाद बनाने में तापमान, नमी और देखभाल जरूरी होती है। इसकी जानकारी कृषि या पशुपालन विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र से ली जा सकती है। शुरुआत छोटे स्तर से करना समझदारी रहेगी।
मध्य प्रदेश के लिए क्यों अहम
मध्य प्रदेश में इस साल कई इलाकों में बारिश से फसल खराब होने की खबरें आईं। ऐसे में किसान अलग आमदनी के रास्ते खोज रहे हैं। डेयरी और खाद जैसे काम खेती की आय में सहारा दे सकते हैं। पर यह हर परिवार के लिए आसान नहीं होगा। इसके लिए जमीन, पानी, पशु और पूंजी चाहिए।
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