बीजों से दूर होता किसान
किसान की पहचान केवल खेत में मेहनत करने वाले व्यक्ति की नहीं रही है। वह कभी अपनी खेती का वैज्ञानिक भी हुआ करता था। उसे पता रहता था कि किस मौसम में कौन-सी फसल बोनी है। वह बीज, पानी और मिट्टी का हिसाब भी समझता था। फसल में बीमारी आने पर घरेलू उपचार और पौधों की पहचान करता था।
बीज बचाकर रखना भी खेती के पारंपरिक ज्ञान का अहम हिस्सा था। किसान अच्छी फसल से अनाज अलग रखता था। फिर उसे अगली बुवाई के लिए संभालकर रखता था। इससे हर साल बाजार से बीज खरीदने की जरूरत कम पड़ती थी।
खेती का यह तरीका धीरे-धीरे बदल गया है। अब कई किसान अपनी पूरी उपज बाजार में बेच देते हैं। अगली फसल के लिए उन्हें बीज खरीदने पड़ते हैं। कंपनियों और बाजार पर उनकी निर्भरता बढ़ती जा रही है।
मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में कपास की खेती इसका उदाहरण है। यहां खरगोन, खंडवा, बड़वानी और बुरहानपुर प्रमुख कपास उत्पादक जिले हैं। किसानों के अनुभव बताते हैं कि बीजों के मामले में बदलाव गहरा है। सवाल केवल बीज खरीदने का नहीं है। यह किसानों के पारंपरिक ज्ञान और खेती पर उनके नियंत्रण से भी जुड़ा है।
हाइब्रिड से बीटी कपास तक
भारत में 1970 के दशक में देशी कपास से संकर बीजों की ओर बदलाव शुरू हुआ। हाइब्रिड बीजों ने कपास की खेती में नई संभावनाएं पैदा कीं। इसके बाद बीटी कपास का चलन तेजी से बढ़ा। देश में कपास की खेती का बड़ा हिस्सा इसी पर आधारित हो गया।
बीटी कपास के बीज सामान्य रूप से दोबारा बोने के लिए उपयुक्त नहीं माने जाते। हाइब्रिड बीजों से भी अगली पीढ़ी में एक जैसी उपज मिलने की गारंटी नहीं होती। इसलिए किसान हर सीजन नए बीज खरीदने लगे।
इस बदलाव का असर केवल खेती के खर्च पर नहीं पड़ा। बीज तैयार करने और सुरक्षित रखने का पारंपरिक ज्ञान भी कमजोर हुआ। कई किसान अब बाजार में उपलब्ध बीजों पर निर्भर हैं। नई पीढ़ी के किसानों के लिए पुराने बीजों पर लौटना भी आसान नहीं है।
20 से अधिक किसानों से बीज तैयार करने के बारे में चर्चा की गई। कई किसानों को खुद बीज तैयार करने की प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी। इससे पता चलता है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक खेती के बीच दूरी बढ़ी है।
बीज के नाम पर नुकसान
खरगोन जिले के भीकनगांव क्षेत्र के किसान राकेश तितइया का अनुभव इस समस्या को दिखाता है। वे कालदाखेड़ी गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि बाजार में बीज उपलब्ध होने के कारण घर पर बीज तैयार करने की जरूरत कम महसूस होती है। किसानों के पास खेती के दूसरे काम भी बहुत होते हैं।
हालांकि बाजार पर निर्भरता का जोखिम भी है। राकेश तितइया के मुताबिक, पिछले साल उन्होंने चर्चा में आए बीटी कपास के 5जी नाम वाले बीज लगाए थे। खेत में पौधे हरे-भरे दिखाई दिए। इसके बावजूद उन्हें उत्पादन नहीं मिला।
इस नुकसान से उबरने के बाद उन्होंने इस साल पारंपरिक बीटी कपास लगाया। उनके अनुसार, कम बारिश के बावजूद एक एकड़ में दस क्विंटल कपास मिला। यह उनका व्यक्तिगत अनुभव है। इसे हर किसान के लिए समान उत्पादन का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
इस उदाहरण से एक अहम बात सामने आती है। बीज खरीदते समय केवल प्रचार या दूसरे किसानों की बात पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। किसान को किस्म की जानकारी, स्थानीय अनुभव और भरोसेमंद सलाह देखनी चाहिए। किसी बीज से नुकसान होने पर संबंधित कृषि विभाग से भी संपर्क करना चाहिए।

देशी कपास पर लौटना कठिन
कालदाखेड़ी के किसान लखन पाटीदार बताते हैं कि देशी कपास पर लौटना आसान नहीं है। उनके अनुसार, पहले किसान घर पर ही कपास के बीज तैयार कर लेते थे। अब खेती के तरीके बदल गए हैं। किसान बीज तैयार करने की प्रक्रिया से दूर होते गए हैं।
उन्होंने बीटी कपास के बीजों से निकले काकड़े को दोबारा बोने की कोशिश भी की। लेकिन उन्हें अपेक्षित उत्पादन नहीं मिला। उनके अनुभव में बीज को फिर इस्तेमाल करने में मेहनत ज्यादा लगती है। परिणाम भी भरोसेमंद नहीं रहता।
लखन पाटीदार का मानना है कि अब पुरानी पद्धति अपनाने में कई चुनौतियां हैं। पानी की कमी और पर्यावरण से जुड़ी परेशानियां भी खेती को प्रभावित करती हैं। नई पीढ़ी को पारंपरिक तरीकों की उपयोगिता समझाना भी आसान नहीं है।
बीटी कपास को अपनाने के पीछे किसानों के अपने कारण रहे हैं। दरअसल, किसान मौसम और पानी के उतार-चढ़ाव के बीच बेहतर फसल की उम्मीद करते हैं। वे खेती में अनिश्चितता कम करना चाहते हैं। ऐसे में केवल पुरानी पद्धति अपनाने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। किसानों को भरोसेमंद बीज और व्यावहारिक विकल्प भी चाहिए।
देशी बीजों पर विशेषज्ञ की राय
खरगोन के सेवानिवृत्त कृषि विस्तार अधिकारी पीएस बार्चे लंबे समय से देशी बीजों के संरक्षण पर काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि किसानों को नॉन-बीटी कपास की ओर लौटाना बड़ी चुनौती है। किसानों के पास पुराने बीजों की उपलब्धता भी सीमित हो गई है।
बार्चे के अनुसार, 1990 के दशक में कपास की खेती का अनुभव अलग था। उस समय मार्च, अप्रैल और मई तक खेतों में कपास मौजूद रहता था। उनके मुताबिक, ठंड के मौसम में भी कपास अच्छी तरह उगता था। एक पौधे पर डेढ़ सौ से दो सौ तक घेटे लगने का अनुभव भी रहा।
वे बताते हैं कि उस दौर में हाइब्रिड कपास से 14 से 15 क्विंटल तक उत्पादन मिलता था। उनके अनुसार, बीटी कपास की शुरुआत में उत्पादन दस से बारह क्विंटल तक पहुंचा। अब कई जगह औसत उत्पादन चार से पांच क्विंटल बताया जा रहा है।
नॉन-बीटी बीजों की नई उम्मीद

देशी बीजों के संरक्षण और नए विकल्प विकसित करने के प्रयास जारी हैं। नागपुर स्थित कपास अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक कुछ हाइब्रिड किस्मों पर काम कर रहे हैं। कुछ कंपनियों ने स्वदेशी-4 जैसी नॉन-बीटी किस्में भी विकसित की हैं। इन किस्मों को देशी कपास के साथ संकरण करके तैयार किया गया है।
पीएस बार्चे ने नागपुर की देशी किस्म सूरज के बीजों से प्रदर्शन भी किया था। उनके अनुसार, इसका परिणाम अच्छा रहा। इस किस्म पर वैज्ञानिक स्तर पर काम जारी है। उद्देश्य किसानों को नॉन-बीटी कपास के विकल्प उपलब्ध कराना है।
हालांकि किसी किस्म को बड़े स्तर पर अपनाने से पहले उसके परीक्षण और स्थानीय प्रदर्शन को समझना जरूरी है। किसानों को बीज की उपलब्धता, उपज और खेती की लागत की जानकारी चाहिए। केवल देशी या नॉन-बीटी नाम होने से कोई किस्म हर क्षेत्र के लिए उपयुक्त नहीं हो जाती।
निमाड़ में बीजों का बड़ा कारोबार
निमाड़ क्षेत्र में कपास की खेती बड़े पैमाने पर होती है। चार जिलों का कुल कपास रकबा करीब 3.37 लाख हेक्टेयर है। इनमें खरगोन का क्षेत्र सबसे बड़ा है। बड़वानी दूसरे स्थान पर है। खंडवा और बुरहानपुर में भी कपास उगाई जाती है।
खरगोन में करीब 2.06 लाख से 2.15 लाख हेक्टेयर में कपास की खेती होती है। बड़वानी में यह रकबा 67 हजार से 80 हजार हेक्टेयर है। खंडवा में 48 हजार से 50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में कपास उगाई जाती है। बुरहानपुर में कपास का रकबा लगभग 16 हजार हेक्टेयर बताया गया है।
यदि प्रति हेक्टेयर पांच पैकेट बीटी कपास बीजों का अनुमान लिया जाए, तो कुल खपत 16.85 लाख पैकेट होती है। यह गणना न्यूनतम उपयोग के आधार पर की गई है। कुछ किसान एक हेक्टेयर में छह से आठ पैकेट भी इस्तेमाल करते हैं।
सरकारी अधिकतम खुदरा मूल्य के आधार पर बोलगार्ड-II के एक पैकेट की कीमत 901 रुपए मानी गई है। इस दर से कुल लागत करीब 151.81 करोड़ रुपए बैठती है। बोलगार्ड-I के लिए 635 रुपए प्रति पैकेट का आधार लिया गया है। इस हिसाब से कुल कीमत करीब 106.99 करोड़ रुपए होती है।
बीज और अनाज की कीमत में अंतर
खंडवा जिले के भोजाखेड़ी गांव के किसान सलीम खान के पास आठ एकड़ जमीन है। वे सोयाबीन, मक्का और गेहूं की खेती करते हैं। उन्होंने बीजों की कीमत को लेकर अपना अनुभव साझा किया।
सलीम खान ने बताया कि परिवार की अचानक जरूरत के कारण उन्हें घर में रखी मक्का बेचनी पड़ी। ऑफ-सीजन में उन्हें एक बोरी मक्का के तीन हजार रुपए मिले। बाद में बुवाई के लिए बाजार से मक्का का बीज खरीदने गए। वहां बीज की कीमत 300 रुपए प्रति किलो थी।
यह अनुभव खेती के एक बड़े आर्थिक अंतर की ओर इशारा करता है। किसान जरूरत के समय अनाज कम कीमत पर बेच सकता है। लेकिन बुवाई के समय उसे बीज महंगा खरीदना पड़ सकता है। हालांकि, अनाज और प्रमाणित बीज की गुणवत्ता तथा उपयोग अलग होते हैं। इसलिए दोनों की कीमतों की तुलना करते समय यह अंतर समझना जरूरी है।
सलीम खान के अनुसार, उनका परिवार खुद तैयार किए बीजों का इस्तेमाल करता है। वे प्याज के बीज भी अपने स्तर पर तैयार करते हैं। उनका कहना है कि बीज बचाने में मेहनत लगती है। खेत में इस्तेमाल करने से पहले बीज की जांच करना भी जरूरी है।
उनके विचार में बीज बचाना किसान के आत्मनिर्भर रहने का तरीका है। वे इसे किसान के अधिकार और सम्मान से जोड़ते हैं। उनका अनुभव बताता है कि कुछ फसलों में बीज संरक्षण से खरीद का खर्च घट सकता है। लेकिन बीज बचाने का तरीका फसल और उसकी किस्म के अनुसार बदलता है।
मक्का के बीज का हिसाब
मक्का देश की प्रमुख फसलों में शामिल है। पहले कई ग्रामीण और आदिवासी परिवार सूखे भुट्टों को घरों की छत पर लटकाकर रखते थे। यह केवल भंडारण का तरीका नहीं था। इससे मक्का के दानों को सुखाकर अगले मौसम के लिए बचाने में मदद मिलती थी।
बीजों को सुरक्षित रखने के लिए नमी नियंत्रित करना जरूरी है। मक्का के बीजों में नमी दस प्रतिशत से कम रखने की जरूरत होती है। अधिक नमी से फफूंद और दूसरी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
आज मक्का की खेती में हाइब्रिड बीजों का बड़ा हिस्सा है। रिपोर्ट में देश की मक्का खेती में हाइब्रिड किस्मों की हिस्सेदारी 65.8 प्रतिशत बताई गई है। ओपन-पॉलिनेटेड किस्मों की हिस्सेदारी 34.2 प्रतिशत बताई गई है।
हाइब्रिड मक्का से मिले दानों को अगली फसल के बीज के रूप में इस्तेमाल करने पर उपज और पौधों में एकरूपता घट सकती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अगली पीढ़ी में संकर गुण उसी तरह बने रहने की गारंटी नहीं होती। इसलिए किसान को बीज बचाने से पहले अपनी किस्म की जानकारी समझनी चाहिए।
हाइब्रिड मक्का बीज की कीमत 120 से 350 रुपए प्रति किलो बताई जाती है। कंपनी के 3.5 से 4 किलो वाले पैकेट की कीमत 1,400 से 2,150 रुपए तक होती है। वहीं, मक्का का मंडी भाव 2,200 से 2,400 रुपए प्रति क्विंटल है। वर्ष 2026-27 के लिए इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,410 रुपए प्रति क्विंटल दर्ज है।
इन आंकड़ों से बीज खरीदने और अनाज बेचने के बीच कीमत का बड़ा अंतर दिखता है। हालांकि, प्रमाणित बीज की कीमत में उसकी गुणवत्ता, किस्म और उत्पादन प्रक्रिया भी शामिल होती है। इसलिए हर किसान के लिए घर पर बीज तैयार करना सही विकल्प नहीं होगा। सही जानकारी और जांच के साथ बीज बचाना ही उपयोगी रास्ता हो सकता है।
बीज पर नियंत्रण, खेती का अहम सवाल
बीज केवल खेती की शुरुआत नहीं है। यह किसान के खर्च, फसल चयन और खेती पर नियंत्रण से भी जुड़ा है। बाजार से बीज खरीदने में सुविधा मिलती है। लेकिन खराब बीज या गलत चुनाव से नुकसान का जोखिम भी रहता है।
दूसरी ओर, पारंपरिक बीजों को सुरक्षित रखना ज्ञान, समय और सावधानी मांगता है। हर फसल के बीज को एक ही तरीके से नहीं बचाया जा सकता। किसान को यह समझना होगा कि कौन-सी किस्म दोबारा बोने के योग्य है। बीज की अंकुरण क्षमता और स्वास्थ्य की जांच भी जरूरी है।
आगे का रास्ता पुराने और नए तरीकों के बीच संतुलन बनाने में है। वैज्ञानिक संस्थानों को उपयुक्त किस्मों पर काम करना होगा। किसानों तक सही जानकारी और भरोसेमंद बीज पहुंचाना भी जरूरी है। इससे किसान अपनी जमीन और जरूरत के हिसाब से बेहतर फैसला ले सकेंगे।
रिपोर्ट: आसिफ सिद्दीकी
लेखक विकास संवाद समिति, भोपाल के कलम मैत्री वरिष्ठ मीडिया फैलो हैं। यह लेख किसानों के अनुभवों, बीज संरक्षण और खेती में बढ़ती बाजार निर्भरता पर आधारित है।
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