भानपुरा के एक किसान ने बैंक की नौकरी छोड़कर खेती की राह चुनी। उनका नाम अनिल बंबोरिया है। उन्होंने पॉलीहाउस में पान की खेती शुरू की। आज उनकी फसल दिल्ली की मंडी तक पहुंच रही है। यह कहानी बताती है कि तकनीक और सरकारी मदद से खेती बदल सकती है।
अनिल का परिवार पहले से पान की परंपरागत खेती करता रहा है। बैंक की नौकरी में उन्हें सीमित वेतन मिलता था। इसलिए उन्होंने खेती को बड़े स्तर पर करने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने पॉलीहाउस तकनीक अपनाई। उद्यानिकी विभाग की हितग्राही मूलक योजना में उन्हें 50 प्रतिशत सब्सिडी मिली।
पॉलीहाउस में पान की खेती
पॉलीहाउस एक ढंका हुआ ढांचा होता है। इसमें पौधों को बारिश, तेज हवा और गर्मी से बचाया जाता है। पान की फसल पर मौसम की मार जल्दी पड़ती है। अध्ययन में अनिल को पता चला कि पॉलीहाउस में पान की खेती बेहतर है। इससे आमदनी भी ज्यादा होती है।
सब्सिडी से कैसे बना पॉलीहाउस
पॉलीहाउस बनाने के लिए अनिल के पास पर्याप्त रकम नहीं थी। उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से उन्हें योजना की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने योजना के तहत आवेदन किया।
प्रकरण स्वीकृत होने पर उन्हें 2.67 लाख रुपए की सब्सिडी मिली। इतनी ही राशि उन्होंने अपने हिस्से के रूप में लगाई। यानी खर्च का करीब आधा हिस्सा योजना से मिला। कुल लागत करीब 5.5 लाख रुपए आई। वर्ष 2021-22 में उन्होंने पॉलीहाउस तैयार कर पान की खेती शुरू की।
पारंपरिक पनवाड़ी की मुश्किलें
अनिल के मुताबिक पारंपरिक पनवाड़ी एक से डेढ़ वर्ष में नष्ट हो जाती थी। पनवाड़ी यानी पान उगाने का खेत या बाड़ा। आंधी-तूफान, बारिश और गर्मी से फसल को काफी नुकसान होता था। बारिश में जड़ों में बीमारी लगती थी और जड़ें गल जाती थीं। सर्दियों में पत्ते जल जाने की समस्या भी आती थी।
पॉलीहाउस में पान की फसल इन समस्याओं से काफी हद तक सुरक्षित रहती है। उनके मुताबिक पॉलीहाउस में पनवाड़ी 15 से 20 वर्ष तक चल सकती है। इससे बार-बार नई पनवाड़ी तैयार करने का खर्च घट सकता है। पान का उत्पादन भी करीब डेढ़ गुना तक बढ़ गया है।
शुरुआती दो वर्षों में अच्छी आय मिली। इससे उत्साहित होकर अनिल ने शासन की योजना से दूसरा पॉलीहाउस भी बनवाया। अब उनके पास दो पॉलीहाउस में पान की खेती है। यानी पहला प्रयोग सफल रहा।
एक्सप्रेसवे से दिल्ली मंडी तक पहुंचना हुआ आसान
अनिल अपनी पान की फसल दिल्ली मंडी भेजते हैं। पहले परिवहन में ज्यादा समय लगता था। इस वजह से फसल खराब हो जाती थी और आर्थिक नुकसान होता था। अनिल बताते हैं कि जिले में एक्सप्रेसवे बनने से उन्हें फायदा हुआ है।
अब उनकी फसल दूसरे ही दिन दिल्ली मंडी पहुंच जाती है। इससे फसल खराब होने की संभावना कम हुई है। साथ ही अच्छा भाव मिलने की सुविधा भी बढ़ी है।
30 से 40 किसान पान की खेती के इच्छुक
अनिल की सफलता से आसपास के किसान प्रेरित हुए हैं। करीब 30 से 40 किसान पान की खेती के लिए आगे आए हैं। मुख्यमंत्री जन-विश्वास शिविर में अनिल की मुलाकात कलेक्टर दिव्यांक सिंह से हुई। उन्होंने पॉलीहाउस में पान की खेती करने की इच्छा जताई।
कलेक्टर ने किसानों को हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया। किसानों की मांग पर पान कृषकों का क्लस्टर बनाने के निर्देश भी दिए। ये निर्देश संबंधित विभाग को दिए गए हैं। क्लस्टर का मतलब है एक इलाके के किसानों का समूह बनाना। आम तौर पर इससे सुविधाएं और जानकारी साझा करना आसान होता है।
अनिल की किसानों से अपील
अनिल ने किसानों से पॉलीहाउस में पान की खेती अपनाने की अपील की। उनका कहना है कि इससे किसानों को अधिक लाभ मिल सकता है। उन्होंने अपनी सफलता में शासन की योजनाओं का योगदान बताया। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आभार जताया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रति भी उन्होंने आभार व्यक्त किया।
किसान क्या सीख सकते हैं
इस कहानी से पहली सीख योजना की जानकारी की है। अनिल को उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से ही योजना का पता चला। इसलिए इच्छुक किसान अपने जिले के उद्यानिकी विभाग से संपर्क कर सकते हैं। योजना की शर्तें और पात्रता विभाग से ही पूछकर तय करें। इस मामले में किसान को अपना हिस्सा भी लगाना पड़ा।
दूसरी सीख बाजार तक पहुंच की है। फसल अच्छी हो, पर समय पर मंडी न पहुंचे तो नुकसान होता है। अनिल के अनुभव में एक्सप्रेसवे ने यही दिक्कत काफी कम की। तीसरी सीख मौसम से सुरक्षा की है। आंधी, बारिश और सर्दी की मार पान जैसी फसल पर भारी पड़ती है। पॉलीहाउस इस जोखिम को घटाने में मदद करता है।
इस साल ज्यादा बारिश से कई जगह खरीफ की फसल खराब हुई है। ऐसे माहौल में सुरक्षित खेती के मॉडल पर किसानों की नजर जाती है। हालांकि हर किसान के लिए हर तकनीक एक जैसी फायदेमंद नहीं होती। फसल, जमीन और लागत देखकर ही फैसला लें।
एक नजर तथ्यों पर
अनिल बंबोरिया भानपुरा के किसान हैं। उन्हें उद्यानिकी विभाग की योजना में 2.67 लाख रुपए की सब्सिडी मिली। पॉलीहाउस की कुल लागत करीब 5.5 लाख रुपए रही। यह पॉलीहाउस वर्ष 2021-22 में तैयार हुआ। इसके बाद उन्होंने दूसरा पॉलीहाउस भी बनवाया। उत्पादन करीब डेढ़ गुना बढ़ा है। फसल दूसरे दिन दिल्ली मंडी पहुंच रही है। आसपास के करीब 30 से 40 किसान इस खेती की ओर बढ़े हैं।
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