पारंपरिक खेती में खर्च चलाना कई परिवारों के लिए मुश्किल होता है। नीमच के एक किसान ने इसी मुश्किल से निकलने का रास्ता खोजा। जीरन गांव के गोविंद पाटीदार ने अपनी जमीन पर संतरे का बगीचा लगाया। उनका कहना है कि इससे आय कई गुना बढ़ गई है।
MIDH योजना से मिला सहारा
गोविंद पाटीदार मध्य प्रदेश के नीमच जिले के जीरन गांव में रहते हैं। यह गांव नीमच विकासखंड में आता है। वे लंबे समय से पारंपरिक खेती कर रहे थे। इसी खेती से वे परिवार का पालन-पोषण करते थे। उनके मुताबिक इससे सालाना आय सिर्फ 1 से 1.5 लाख रुपए बन पाती थी।
इसी दौरान उन्हें उद्यानिकी विभाग से एक योजना की जानकारी मिली। यह योजना नए बगीचे लगाने में मदद करती है। इसका नाम MIDH है। हिंदी में इसे एकीकृत बागवानी विकास मिशन कहा जाता है। पाटीदार ने इस योजना का लाभ लिया। उन्होंने अपनी 2 हेक्टेयर जमीन में संतरे का बगीचा लगाया। इसके लिए उन्हें करीब 1 लाख रुपए का अनुदान मिला।
किसान के मुताबिक अनुदान से बगीचा लगाने में आर्थिक मदद मिली। इससे उन्हें पारंपरिक खेती के साथ बागवानी अपनाने का मौका मिला। यानी उन्होंने खेती पूरी तरह छोड़ी नहीं, बल्कि उसमें बागवानी जोड़ी।
योजना के बारे में जानें
MIDH केंद्र सरकार की प्रायोजित योजना है। इसमें राज्यों को आर्थिक और तकनीकी मदद दी जाती है। सरकारी जानकारी के मुताबिक इसमें कई काम शामिल हैं। फल, सब्जी और फूलों के नए बगीचे लगाना इनमें से एक है। पुराने और कमजोर बगीचों को दोबारा जिंदा करना भी शामिल है। पॉलीहाउस जैसी संरक्षित खेती को भी इसमें मदद मिलती है। कटाई के बाद भंडारण और मार्केटिंग की सुविधाएं बनाने की मदद भी है।
बगीचा लगाने की सहायता को एरिया एक्सपेंशन कहा जाता है। एरिया एक्सपेंशन यानी खेती का दायरा बढ़ाकर नए बगीचे लगाना। आम तौर पर अनुदान सरकार की तय इकाई लागत के आधार पर मिलता है। इसलिए किसान के कुल खर्च और अनुदान में फर्क हो सकता है। सही नियम और राशि जिले के उद्यानिकी विभाग से पता करें। अनुदान की रकम आम तौर पर सीधे बैंक खाते में जाती है।
आय में आया बड़ा फर्क
किसान पाटीदार के अनुसार संतरे की खेती से उनकी आय काफी बढ़ी है। पहले वे साल में 1 से 1.5 लाख रुपए कमाते थे। अब वे संतरे से करीब 8 से 10 लाख रुपए सालाना कमाने की बात कहते हैं। यानी उनकी आय लगभग 5 से 10 गुना तक बढ़ी है। यह गुना उनके बताए आंकड़ों की सीमाओं से निकाला गया है।
आय बढ़ने का असर परिवार पर भी दिखा है। पाटीदार के मुताबिक परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरी है। बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना अब पहले से आसान है। घरेलू जरूरतें पूरी करने में भी उन्हें ज्यादा सुविधा मिल रही है।
आगे की योजना और आभार
पाटीदार ने कहा कि MIDH ने उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया। उनके मुताबिक इससे वे पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर बागवानी की ओर गए। अब वे अपने कृषि कार्य का दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी कोशिश खेती को और ज्यादा फायदेमंद बनाने की है।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार का आभार जताया। उनके मुताबिक ऐसी योजनाएं किसानों को आय बढ़ाने का बेहतर मौका देती हैं।
इस कहानी से किसान क्या सीखें
पहली सीख यह है कि सरकारी योजना की जानकारी समय पर लें। पाटीदार को योजना का पता उद्यानिकी विभाग से चला। इसलिए किसान अपने जिले के उद्यानिकी विभाग से संपर्क कर सकते हैं। वहां से पात्रता, आवेदन और अनुदान की पूरी जानकारी ली जा सकती है।
दूसरी सीख यह है कि बागवानी में धैर्य चाहिए। फलदार बगीचे को कमाई देने में समय लगता है। रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि बगीचा कब लगाया गया। यह भी साफ नहीं है कि पूरा बगीचा कब से फल दे रहा है। इसलिए इसे रातोंरात कमाई का तरीका न समझें।
तीसरी सीख यह है कि आंकड़ों को परखकर आगे बढ़ें। 8 से 10 लाख रुपए कुल आमदनी है या शुद्ध मुनाफा, यह साफ नहीं है। बगीचे का कुल खर्च और मजदूरी का हिसाब भी रिपोर्ट में नहीं है। संतरे के भाव में उतार-चढ़ाव भी हो सकता है। किसान इन बातों का हिसाब लगाकर ही फैसला लें।
चौथी सीख यह है कि अपनी मिट्टी और पानी की जांच कराएं। हर इलाके की जमीन और जलवायु हर फल के लिए ठीक नहीं होती। स्थानीय उद्यानिकी अधिकारी या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेना बेहतर रहेगा। नीमच जैसे इलाके में यह अनुभव दूसरों के लिए भी संकेत हो सकता है।
मध्य प्रदेश के किसानों के लिए
मध्य प्रदेश में कई किसान बारिश और बाजार के जोखिम से जूझते हैं। इस साल कई जगह ज्यादा बारिश से खरीफ की फसल को नुकसान की खबरें आईं। ऐसे में आय के दूसरे साधन जोड़ना किसानों के लिए मायने रखता है। बागवानी एक ऐसा विकल्प हो सकता है, पर हर किसान के लिए नहीं। पाटीदार की कहानी बस एक उदाहरण है, कोई गारंटी नहीं।
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