किसान की बात,सूत्र के साथ

एमपी में पैराक्वाट से मूंग-उड़द की फसल सुखाने पर वैज्ञानिकों ने चेताया, मिट्टी-पानी और सेहत पर पड़ रहा असर!

newz@gmail.com | Sep 19, 2026, 00:39 IST

मध्य प्रदेश में मूंग और उड़द की फसल जल्दी सुखाने के लिए पैराक्वाट के इस्तेमाल पर सवाल उठे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक अवशेष मिट्टी और पानी तक पहुंच सकते हैं। जबलपुर के खरपतवार अनुसंधान निदेशालय की वैज्ञानिक डॉ. शोभा संध्या इसके असर की जांच से जुड़ी हैं।

मूंग-उड़द फसल

मध्य प्रदेश में मूंग और उड़द की फसल को लेकर चिंता सामने आई है। सवाल पैराक्वाट (Paraquat) नाम के खरपतवारनाशक के इस्तेमाल पर उठ रहे हैं। कुछ जगहों पर फसल जल्दी सुखाने में इसके इस्तेमाल की बात होती रही है।

खेतों में खरपतवार खत्म करने के लिए किसान कई रसायन इस्तेमाल करते हैं। खरपतवार नियंत्रण में इनकी भूमिका जरूर है। लेकिन सही फसल, सही मात्रा और सरकारी सिफारिश का पालन जरूरी है। गलत या ज्यादा इस्तेमाल हो, तो असर खेत तक सीमित नहीं रहता। रसायन के अवशेष मिट्टी, पानी और फसल तक पहुंच सकते हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि हर रसायन स्वीकृत सिफारिश के अनुसार ही इस्तेमाल हो। तय मात्रा का ध्यान रखना भी जरूरी है।

मूंग जल्दी काटने की होड़

मध्य प्रदेश के कई जिलों में मूंग की खेती होती है। इनमें विदिशा, रायसेन, सीहोर और हरदा शामिल हैं। यहां गर्मी के मौसम में यह खेती बड़े पैमाने पर होती है। मूंग की फसल करीब 60 से 70 दिन में तैयार हो जाती है। कटाई के बाद किसानों को खरीफ सीजन की तैयारी करनी होती है। इसलिए खेत जल्दी खाली करना जरूरी हो जाता है।

इसी वजह से कुछ जगह रसायन से फसल सुखाने की बात उठती रही है। पैराक्वाट पौधे के हरे हिस्से पर तेजी से असर करता है। इसके बाद पौधे के हिस्से सूख जाते हैं। फिर किसान मशीन से फसल निकाल लेते हैं। यहीं से खाद्य सुरक्षा का सवाल खड़ा होता है। कटाई के इतने करीब रसायन डालने पर फसल में अवशेष कितने रह सकते हैं?

वैज्ञानिक क्या जांच रहे हैं

जबलपुर के खरपतवार अनुसंधान निदेशालय में डॉ. शोभा संध्या प्रधान वैज्ञानिक हैं। वे दो दशक से खरपतवारनाशकों के असर पर काम कर रही हैं। उनके मुताबिक पैराक्वाट जैसे रसायनों का पर्यावरण पर असर समझना जरूरी है। इसके लिए सावधानी बरतनी होगी। खेत में डाला गया रसायन मिट्टी के संपर्क में आता है। बारिश या सिंचाई में उसका व्यवहार समझना जरूरी हो जाता है।

खरपतवार अनुसंधान निदेशालय की वैज्ञानिक डॉ. शोभा संध्या

इसके लिए वैज्ञानिक लाइसीमीटर (Lysimeter) तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि रसायन पानी के साथ नीचे कैसे जाता है। यह भी देखा जाता है कि उसकी मौजूदगी कितने समय तक रहती है।

मिट्टी से भूजल तक चिंता

पैराक्वाट मिट्टी के कणों से मजबूती से जुड़ने के लिए जाना जाता है। फिर भी हर जगह उसका व्यवहार एक जैसा नहीं होता। मिट्टी, मौसम, पानी और इस्तेमाल की स्थिति से फर्क पड़ सकता है। किसी इलाके में यह भूजल तक कितना पहुंचता है, इसका जवाब जांच देगी।

डॉ. शोभा संध्या के अनुसार अध्ययन में पानी में रसायन की जांच हो रही है। मकसद यह समझना है कि रसायन का पर्यावरण पर कितना असर पड़ सकता है।

अनाज में अवशेष की जांच

खाद्य पदार्थों में कीटनाशक अवशेष की एक अधिकतम सीमा तय होती है। इसे MRL (Maximum Residue Limit) कहते हैं। इसका मकसद है कि भोजन में रसायन तय सीमा से ज्यादा न रहे।

मूंग या उड़द में पैराक्वाट के अवशेष का दावा हो, तो सबूत जरूरी हैं। लैब रिपोर्ट सामने होनी चाहिए। नमूनों की संख्या और जांच की तारीख भी बतानी होगी। जांच का वैज्ञानिक तरीका भी साफ होना चाहिए। केवल एक आंकड़े से पूरे इलाके की फसल को असुरक्षित बताना सही नहीं होगा।

सेहत के लिए कितना खतरा

पैराक्वाट की सबसे बड़ी चिंता इसकी विषाक्तता है। बड़ी मात्रा में निगलने पर कई अंगों को गंभीर नुकसान हो सकता है। गंभीर विषाक्तता में फेफड़े, किडनी और लीवर प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन भोजन में बहुत कम अवशेष को सीधे स्लो प्वाइजन कहना ठीक नहीं होगा।

इसके लिए अवशेष की असल मात्रा देखनी होगी। लगातार संपर्क और शरीर में पहुंचने की मात्रा भी देखनी होगी। वैज्ञानिक जोखिम आकलन भी जरूरी है। असली सवाल यह है कि क्या कटाई के करीब पैराक्वाट डालना खतरा बढ़ाता है? खासकर तब, जब इस्तेमाल सिफारिश से अलग तरीके से हुआ हो। इसका जवाब लैब जांच और वैज्ञानिक मूल्यांकन से ही मिलेगा।

मछलियों पर असर का दावा

डॉ. शोभा संध्या के अनुसार उनके अध्ययन में मछलियों पर असर देखा गया। रसायन मिला पानी एक टैंक में रखा गया। इसके बाद मछलियों के मरने की बात सामने आई। लेकिन ऐसे प्रयोग के नतीजे को सीधे बड़े निष्कर्ष में बदलना ठीक नहीं। पहले पूरी वैज्ञानिक जानकारी देखनी होगी। इसमें रसायन की मात्रा और पानी की मात्रा शामिल है। संपर्क का समय और नियंत्रण समूह भी देखना होगा।

उड़द किसान क्या ध्यान रखें

नरसिंहपुर और आसपास उड़द की खेती भी बड़े पैमाने पर होती है। यहां भी खरपतवार नियंत्रण के लिए अलग-अलग रसायनों के इस्तेमाल की बात आती है। किसान पहले देखें कि रसायन उस फसल के लिए स्वीकृत है या नहीं।

किसान बरतें ये सावधानियां

किसान खरपतवारनाशक लेबल, सरकारी सिफारिश और विशेषज्ञ की सलाह से ही इस्तेमाल करें। कटाई से ठीक पहले किसी रसायन का इस्तेमाल हो तो प्रतीक्षा अवधि देखें। इसे PHI (Pre-Harvest Interval) कहते हैं।

रसायन तय मात्रा से ज्यादा न डालें। छिड़काव में दस्ताने, मास्क, चश्मा और सुरक्षात्मक कपड़े पहनें। रसायन को कुएं, नलकूप या दूसरे जलस्रोत के पास न रखें। खाली बोतल या पैकेट को पानी के स्रोत में न फेंकें।

सवाल थाली की सुरक्षा का

सबसे जरूरी बात सही उपयोग और नियमित जांच है। फसल जल्दी सुखाने की जल्दबाजी में गलत इस्तेमाल हुआ, तो असर फसल पर पड़ेगा। मिट्टी और पानी भी इससे प्रभावित हो सकते हैं।

मूंग और उड़द हमारी थाली की रोजमर्रा की दालें हैं। इसलिए किसान, वैज्ञानिक और प्रशासन, तीनों की जिम्मेदारी बनती है। सही जानकारी और जांच से ही भरोसा बनेगा। अब नजर इस पर रहेगी कि आगे की जांच में क्या सामने आता है।

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