केंद्र सरकार की पीएम धन-धान्य कृषि योजना को एक साल पूरा हो गया है। यह योजना 11 अक्टूबर 2025 को शुरू की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य कम कृषि उत्पादकता वाले जिलों में खेती सुधारना है। इसके लिए देशभर के 100 जिलों को चुना गया है। योजना के पहले साल में जिला स्तर पर काम शुरू हुआ है। सरकार के अनुसार, सभी 100 जिलों ने अपनी कार्ययोजनाएं तैयार कर ली हैं।
इन योजनाओं में स्थानीय कृषि जरूरतों के हिसाब से काम तय किए गए हैं। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच छह प्रमुख उद्देश्यों का औसत स्कोर बढ़ा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन उद्देश्यों का औसत स्कोर 18.85 से बढ़कर 46.89 हो गया। यानी इस अवधि में 28.04 अंकों का सुधार दर्ज हुआ। यह सुधार योजना की निगरानी में इस्तेमाल किए गए संकेतकों पर आधारित है। इसे किसानों की आमदनी में हुई बढ़ोतरी का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता।
योजना को छह साल के लिए मंजूरी मिली है। इसकी शुरुआत वित्त वर्ष 2025-26 से हुई। अब सरकार का जोर जिला कार्ययोजनाओं को आगे बढ़ाने पर है। इसके साथ सिंचाई, भंडारण और कृषि ऋण जैसी सुविधाएं मजबूत करने का लक्ष्य है।
किन जिलों को मिलेगा लाभ?
इस योजना में ऐसे जिले शामिल किए गए हैं, जहां कृषि उत्पादकता कम है। कुछ जिलों में किसान सालभर में कम फसलें ले पाते हैं। कई जगह किसानों को कृषि ऋण मिलने में भी परेशानी होती है। इन्हीं कमियों को ध्यान में रखकर जिलों का चयन किया गया है।
जिलों के चयन में खेती का कुल क्षेत्र और परिचालन जोत भी देखी गई। कोशिश की गई कि हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश से कम से कम एक जिला शामिल हो। इससे योजना का लाभ अलग-अलग कृषि क्षेत्रों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।
योजना का लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है। किसानों को खेती के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी इसका हिस्सा है। बेहतर सिंचाई से फसल उत्पादन को सहारा मिल सकता है। भंडारण की सुविधा मिलने पर किसानों को उपज संभालने में मदद मिल सकती है।
कृषि ऋण की बेहतर उपलब्धता से किसानों को खेती में निवेश करने का अवसर मिल सकता है। फसल विविधीकरण से किसान अलग-अलग फसलों के विकल्प तलाश सकते हैं। हालांकि, लाभ स्थानीय जरूरतों और योजनाओं के सही क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
छह उद्देश्यों पर काम
पीएम धन-धान्य कृषि योजना में छह प्रमुख उद्देश्यों को शामिल किया गया है। इनमें कृषि उत्पादकता बढ़ाना और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना शामिल है। टिकाऊ खेती के तरीकों को अपनाने पर भी जोर है। इसके अलावा फसल कटाई के बाद भंडारण क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
सिंचाई ढांचे में सुधार योजना का एक अन्य प्रमुख उद्देश्य है। इसके साथ किसानों को कृषि ऋण तक बेहतर पहुंच दिलाने की कोशिश की जा रही है। छठा उद्देश्य प्रशासन और सरकारी सेवाओं की पहुंच सुधारना है। इन सभी क्षेत्रों की प्रगति को अलग-अलग संकेतकों से मापा जा रहा है।
सरकारी आंकड़ों में कृषि उत्पादकता का औसत स्कोर 1.50 से बढ़कर 8.08 हुआ। फसल विविधीकरण और टिकाऊ खेती का स्कोर 4.08 से बढ़कर 10.18 पहुंचा। फसल कटाई के बाद भंडारण का स्कोर 2.14 से बढ़कर 5.19 हुआ। सिंचाई ढांचे का स्कोर 1.38 से बढ़कर 4.91 दर्ज किया गया।
कृषि ऋण तक पहुंच का स्कोर 2.40 से बढ़कर 6.53 हुआ। प्रशासन और सेवा वितरण का स्कोर 7.41 से बढ़कर 12.05 दर्ज किया गया। ये आंकड़े अप्रैल से अगस्त 2026 की अवधि के हैं। इनसे अलग-अलग उद्देश्यों पर हुई प्रगति का संकेत मिलता है।
हालांकि, स्कोर में सुधार और खेतों पर वास्तविक नतीजों में अंतर हो सकता है। उत्पादन, लागत और किसानों की आमदनी पर असर जानने के लिए अतिरिक्त आंकड़े जरूरी हैं। इसलिए योजना की सफलता का आकलन आगे भी करना होगा।
100 जिलों की कार्ययोजना
योजना के तहत प्रत्येक जिले ने अपनी कृषि विकास कार्ययोजना तैयार की है। इन योजनाओं को जिला कृषि विकास योजना के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। इनमें स्थानीय जरूरतों और कृषि क्षेत्र की कमियों का आकलन किया जाता है।
कार्ययोजनाओं में तय किया जाता है कि किस जिले में किन कामों की जरूरत है। इसमें लक्ष्य, सालाना उपलब्धियां और संबंधित योजनाओं के जरिए उठाए जाने वाले कदम शामिल हैं। राज्य के विभागों के साथ इन योजनाओं को साझा किया जाता है। इसके बाद मंजूरी और धन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य अलग-अलग सरकारी योजनाओं को बेहतर ढंग से जोड़ना है। इससे जिलों की जरूरतों के अनुसार संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। हर जिले की समस्याएं अलग हो सकती हैं। इसलिए सभी जिलों में एक जैसा काम करने के बजाय स्थानीय जरूरतों पर ध्यान दिया जा रहा है।
सरकार के अनुसार, योजना में केंद्र और राज्य की मौजूदा योजनाओं का समन्वय किया जा रहा है। इससे कृषि विकास से जुड़े कामों को एक साथ आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। लेकिन कार्ययोजना बनना और उसका पूरा होना अलग-अलग चरण हैं। वास्तविक परिणामों के लिए काम समय पर पूरा करना जरूरी होगा।
121 संकेतकों से निगरानी
सरकार योजना की प्रगति मापने के लिए 121 संकेतकों का इस्तेमाल कर रही है। इनमें 74 आउटपुट और 47 आउटकम संकेतक शामिल हैं। आउटपुट संकेतक बताते हैं कि कितने काम हुए या सुविधाएं तैयार हुईं। आउटकम संकेतक इन कामों से आए बदलाव को समझने में मदद करते हैं।
योजना का ऑनलाइन डैशबोर्ड अक्टूबर 2025 के अंतिम सप्ताह में शुरू किया गया था। नवंबर 2025 से जिलों की मासिक रैंकिंग भी शुरू हुई। अगस्त 2026 तक सभी 100 जिलों ने आउटपुट संकेतकों का डेटा जमा किया। वित्त वर्ष 2025-26 के आउटकम संकेतकों के आंकड़े भी सभी जिलों ने दिए।
जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर गठित समितियां योजना की निगरानी कर रही हैं। केंद्रीय नोडल अधिकारी भी नियमित रूप से प्रगति की समीक्षा करते हैं। इस व्यवस्था से कमजोर प्रदर्शन वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद मिल सकती है। इसके बाद संबंधित विभाग सुधार के लिए कदम उठा सकते हैं।
हालांकि, केवल रैंकिंग से किसानों को मिलने वाला वास्तविक लाभ तय नहीं होता। इसके लिए खेती की लागत, उपज और आमदनी जैसे नतीजे भी देखने होंगे। समय पर आंकड़े देना और उनकी गुणवत्ता बनाए रखना भी जरूरी है।
11 मंत्रालयों की 36 योजनाएं
पीएम धन-धान्य कृषि योजना के तहत 11 मंत्रालयों और विभागों की 36 केंद्रीय योजनाओं को जोड़ा गया है। इसमें राज्य सरकारों की योजनाओं और निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी शामिल किया गया है। मकसद कृषि विकास से जुड़े संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है।
इस व्यवस्था में हर जिले की जरूरतों के अनुसार काम तय किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसी जिले में सिंचाई की कमी बड़ी समस्या हो सकती है। दूसरे जिले में भंडारण या कृषि ऋण की सुविधा कमजोर हो सकती है। योजना के तहत इन जरूरतों को ध्यान में रखकर काम आगे बढ़ाया जाएगा।
योजना में केंद्र, राज्य और जिला स्तर की भूमिका अहम है। राज्यों के संबंधित विभागों को जिला कार्ययोजनाओं के साथ समन्वय करना होगा। इसके लिए योजनाओं को राज्य की वार्षिक योजनाओं में शामिल करने की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है।
इस मॉडल से नई और पुरानी योजनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने की कोशिश है। हालांकि, अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय बनाए रखना बड़ी जिम्मेदारी होगी। धन की समय पर उपलब्धता और काम की नियमित समीक्षा भी जरूरी होगी।
एफपीओ की भी भागीदारी
योजना के पहले साल में किसान उत्पादक संगठनों को जोड़ने के प्रयास भी हुए। दिसंबर 2025 में पीएम धन-धान्य कृषि योजना एफपीओ संगम आयोजित किया गया था। इसमें 15 राज्यों और योजना के 33 जिलों के 72 से अधिक किसान उत्पादक संगठनों ने हिस्सा लिया।
किसान उत्पादक संगठन (Farmer Producer Organization) किसानों को सामूहिक रूप से काम करने में मदद करते हैं। इनके जरिए उपज की बिक्री, बाजार तक पहुंच और खेती से जुड़े संसाधनों पर काम किया जा सकता है। संगम में इन विषयों से जुड़े अनुभव साझा किए गए।
कार्यक्रम में प्राकृतिक खेती, तिलहन और मधुमक्खी पालन जैसे विषयों पर चर्चा हुई। संरक्षित खेती और सूक्ष्म सिंचाई भी चर्चा का हिस्सा रहे। संस्थागत वित्त और डिजिटल कृषि पर भी जानकारी साझा की गई।
ऐसी भागीदारी से किसानों को खेती के नए विकल्प समझने का अवसर मिल सकता है। समूहों के जरिए बाजार तक पहुंच मजबूत करने की संभावनाएं भी बनती हैं। लेकिन इन प्रयासों का असर जानने के लिए बिक्री, उत्पादन और किसानों की आमदनी के आंकड़े जरूरी होंगे।
निजी क्षेत्र और सीएसआर की भूमिका
योजना में निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी जगह दी गई है। सार्वजनिक उद्यम विभाग ने वित्त वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए प्रावधान किया है। इसके तहत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम योजना वाले जिलों में कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (Corporate Social Responsibility) के काम कर सकते हैं।
इससे जिलों में कृषि से जुड़ी सुविधाओं को मजबूत करने के अवसर बन सकते हैं। भंडारण, खेती के संसाधन और दूसरी स्थानीय जरूरतों पर काम किया जा सकता है। हालांकि, किस जिले में कौन-सा काम होगा, यह संबंधित योजनाओं और मंजूरियों पर निर्भर करेगा।
सरकारी और निजी संसाधनों का सही इस्तेमाल इस पहल के लिए महत्वपूर्ण होगा। जरूरत के अनुसार काम तय होने से निवेश का बेहतर लाभ मिल सकता है। इसके लिए पारदर्शिता और नियमित निगरानी भी जरूरी है।
किसानों को क्या फायदा होगा?
इस योजना का उद्देश्य किसानों की खेती से जुड़ी समस्याओं को कम करना है। बेहतर सिंचाई से फसलों को पानी उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। भंडारण सुविधाओं से उपज को सुरक्षित रखने के विकल्प बढ़ सकते हैं। कृषि ऋण तक पहुंच मिलने से किसान जरूरी संसाधनों में निवेश कर सकते हैं।
फसल विविधीकरण भी योजना का अहम हिस्सा है। किसान स्थानीय मौसम और बाजार के अनुसार दूसरी फसलों पर विचार कर सकते हैं। इससे खेती के विकल्प बढ़ सकते हैं। लेकिन नई फसल अपनाने से पहले बाजार, लागत और पानी की उपलब्धता समझना जरूरी है।
योजना से छोटे और सीमांत किसानों को भी लाभ पहुंचाने का लक्ष्य है। इसके लिए जिला स्तर पर कृषि जरूरतों के अनुसार काम तय किए जा रहे हैं। फिर भी हर किसान को एक जैसी सहायता मिलेगी, ऐसा मानना सही नहीं होगा। लाभ संबंधित जिले की योजना और लागू सुविधाओं पर निर्भर करेगा।
एक साल के आंकड़े बताते हैं कि योजना के छह उद्देश्यों के स्कोर में सुधार हुआ है। अब देखना होगा कि आने वाले वर्षों में इसका असर खेतों तक कितना पहुंचता है। उत्पादन, लागत, कृषि ऋण और किसानों की आय में बदलाव इसकी सफलता के अहम पैमाने होंगे।
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