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भारत का अनाज भंडार बफर स्टॉक से दोगुना, वैश्विक संकट में सुरक्षा कवच, किसानों को भी राहत

newz@gmail.com | Oct 10, 2026, 17:00 IST

भारत के सरकारी गोदामों में गेहूं और चावल का भंडार तय बफर मानकों से काफी अधिक है। एक सितंबर 2026 को केंद्रीय पूल में 870.45 लाख टन अनाज था। वैश्विक खाद्य संकट और उर्वरक महंगाई के बीच यह अनाज भंडार खाद्य सुरक्षा और बाजार स्थिरता में मदद कर सकता है।

अनाज भंडार

भारत के सरकारी गोदामों में गेहूं और चावल का पर्याप्त भंडार मौजूद है। यह भंडार तय बफर मानकों से काफी अधिक है। वैश्विक खाद्य संकट के बीच इसे देश की खाद्य सुरक्षा के लिए अहम माना जा रहा है। एक जुलाई 2026 को केंद्रीय पूल में 925.85 लाख मीट्रिक टन अनाज था। इसके लिए निर्धारित बफर मानक 411.20 लाख मीट्रिक टन था। यानी तय जरूरत से 514.65 लाख मीट्रिक टन ज्यादा अनाज उपलब्ध था।

इस भंडार में 522.74 लाख मीट्रिक टन गेहूं शामिल था। वहीं, चावल का भंडार 403.11 लाख मीट्रिक टन दर्ज किया गया। ये आंकड़े कृषि लागत एवं मूल्य आयोग और भारतीय खाद्य निगम के आंकड़ों पर आधारित हैं।

सितंबर में भी भंडार मजबूत

सरकारी गोदामों में अनाज का भंडार जुलाई के बाद भी काफी मजबूत रहा। 1 सितंबर 2026 को केंद्रीय पूल में 870.45 लाख मीट्रिक टन गेहूं और चावल था। इसमें 479.92 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 390.53 लाख मीट्रिक टन चावल शामिल था।

एक अक्टूबर के लिए निर्धारित बफर मानक 307.70 लाख मीट्रिक टन था। सितंबर का भंडार इस मानक से करीब 2.8 गुना ज्यादा था। इसके अलावा, भारतीय खाद्य निगम और राज्य एजेंसियों के पास 307.51 लाख मीट्रिक टन बिना मिलिंग वाला धान भी था।

धान की मिलिंग के बाद उससे चावल तैयार किया जाता है। इसलिए धान का भंडार भी भविष्य में चावल की उपलब्धता से जुड़ा है। हालांकि, धान और तैयार चावल के आंकड़ों को एक जैसा नहीं मानना चाहिए।

बफर स्टॉक क्यों जरूरी है?

बफर स्टॉक यानी जरूरत के समय इस्तेमाल के लिए रखा गया अनाज। सरकार इसे खाद्य सुरक्षा और राशन व्यवस्था के लिए बनाए रखती है। इससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अनाज की आपूर्ति जारी रखने में मदद मिलती है।

सरकारी भंडार का उपयोग प्राकृतिक आपदा और फसल उत्पादन में कमी के समय भी किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर सरकार बाजार में अतिरिक्त अनाज जारी कर सकती है। इससे बाजार में उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों को संभालने में मदद मिलती है।

बफर स्टॉक का एक उद्देश्य अचानक पैदा होने वाली कमी से बचाव करना है। यह व्यवस्था गरीब परिवारों के लिए खाद्यान्न उपलब्धता बनाए रखने में भी मदद करती है। इसलिए भंडार का स्तर खाद्य सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा है।

वैश्विक संकट के बीच राहत

दुनिया के कई हिस्सों में खाद्य सुरक्षा को लेकर चुनौतियां बढ़ रही हैं। उर्वरकों की ऊंची कीमतें खेती की लागत बढ़ा रही हैं। पश्चिम एशिया में तनाव से आपूर्ति व्यवस्था पर भी असर पड़ने की आशंका है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उर्वरक की बढ़ती कीमतों और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं को चुनौती बताया है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की रिपोर्ट में भी भू-राजनीतिक तनाव का जिक्र है। आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटें कृषि बाजारों में अस्थिरता बढ़ा सकती हैं।

भारत का बड़ा अनाज भंडार ऐसी परिस्थितियों में सुरक्षा कवच बन सकता है। इससे घरेलू जरूरतों के लिए अनाज की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलती है। हालांकि, अनाज का भंडार उर्वरक की महंगाई जैसी सभी समस्याओं का समाधान नहीं है।

पिछले साल से 26% ज्यादा अनाज भंडार

एक जुलाई 2025 की तुलना में इस साल गेहूं और चावल का कुल भंडार करीब 26 प्रतिशत बढ़ा। गेहूं के भंडार में अकेले लगभग 46 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई। इससे सरकारी खरीद और उत्पादन की स्थिति का अंदाजा मिलता है।

वर्ष 2025-26 में गेहूं उत्पादन 120.7 मिलियन टन रहने का अनुमान था। वर्ष 2024-25 में यह उत्पादन 110.6 मिलियन टन दर्ज किया गया था। इस तरह गेहूं उत्पादन में भी बढ़ोतरी का अनुमान सामने आया।

अधिक उत्पादन और सरकारी खरीद से भंडार मजबूत हो सकता है। लेकिन ज्यादा भंडार के साथ भंडारण और रखरखाव की लागत भी बढ़ती है। इसलिए सरकार को खरीद, वितरण और भंडारण के बीच संतुलन बनाना होता है।

किसानों की खरीद पर क्या असर?

सरकारी गोदामों में ज्यादा अनाज होने से नई फसल की खरीद का सवाल भी उठता है। रबी और खरीफ सीजन में सरकारी खरीद का संबंध बफर स्टॉक से रहता है। भंडार ज्यादा होने पर अनाज रखने और उसकी देखभाल का दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि, अधिक भंडार का मतलब यह नहीं है कि किसानों से सरकारी खरीद बंद हो जाएगी। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) के तहत मिलने वाली कीमत पर इसका असर नहीं पड़ना चाहिए। खरीद प्रक्रिया तय नियमों के अनुसार चलती है।

सरकार ने रबी विपणन सीजन 2027-28 के लिए गेहूं समेत छह फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी मंजूर की है। गेहूं का समर्थन मूल्य 2,610 रुपए प्रति क्विंटल तय किया गया है। यह कीमत किसानों के लिए सरकारी खरीद व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

खुले बाजार में बिक सकता है अतिरिक्त अनाज

जरूरत पड़ने पर सरकार अतिरिक्त अनाज खुले बाजार में बेच सकती है। इसके लिए खुले बाजार बिक्री योजना का इस्तेमाल किया जाता है। भारतीय खाद्य निगम इस व्यवस्था के तहत गेहूं और चावल बाजार में जारी कर सकता है।

इससे बाजार में अनाज की उपलब्धता बढ़ सकती है। आपूर्ति बढ़ने पर कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। इससे आम उपभोक्ताओं को भी राहत मिलने की संभावना रहती है।

हालांकि, अतिरिक्त अनाज कब और कितनी मात्रा में बेचा जाएगा, यह सरकार के फैसले पर निर्भर करता है। अधिक भंडार होने से भंडारण खर्च भी बढ़ता है। इसलिए आने वाले महीनों में कुछ अनाज खुले बाजार में उतारे जाने की संभावना जताई गई है।

उर्वरक महंगाई से किसानों की चिंता

अनाज का भंडार मजबूत है, लेकिन खेती की लागत का दबाव बना हुआ है। हाल के महीनों में यूरिया आयात सौदे 935 से 959 डॉलर प्रति टन के बीच हुए। एक साल पहले यह दर लगभग 410 से 420 डॉलर प्रति टन थी।

भारत यूरिया आयात के लिए खाड़ी क्षेत्र के कई देशों पर निर्भर है। ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन से भारत को कुल यूरिया आयात का करीब 40 प्रतिशत मिलता है। इसलिए इस क्षेत्र में तनाव से उर्वरक की आपूर्ति और कीमत प्रभावित हो सकती है।

उर्वरक महंगा होने से किसानों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसका असर फसल की लागत और खेती से होने वाली कमाई पर पड़ सकता है। ऐसे में अनाज का बड़ा भंडार खाद्य उपलब्धता के लिए राहत है। लेकिन किसानों को लागत के मोर्चे पर अलग सहायता और स्थिर आपूर्ति भी जरूरी है।

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