अमानक बीज से मिलेगा छुटकारा या खतरे में पड़ जाएंगे किसान और परम्परागत खेती ?
newz@gmail.com|Oct 6, 2026, 20:52 IST
सीड बिल 2026 में नकली बीजों पर भारी जुर्माना और QR ट्रेसिंग प्रस्तावित है। सरकार किसान हित और पारंपरिक बीजों की सुरक्षा का दावा कर रही है। किसान संगठन कीमत, केंद्रीकरण और देसी बीजों पर असर को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
संजय शर्मा@भोपाल. नए बीज विधेयक 2026 को लेकर देशभर में टकराव बढ़ गया है। सरकार का दावा है कि 1966 के कमजोर कानून की जगह QR कोड, 30 लाख जुर्माना और 15 दिन में मुआवजे से किसानों को नकली बीज से राहत मिलेगी। वहीं, किसान संगठनों की चिंता है कि दुनिया के कई देशों की परम्परागत खेती ऐसे कानून और विदेशी हस्तक्षेप से प्रभावित हो चुकी है। उनका आरोप है यह बिल किसानों को नहीं बड़ी कंपनियों को फायदा देगा। केंद्रीकरण से राज्यों के अधिकार छिनेंगे, देसी बीज बाजार से बाहर हो जाएंगे और कीमतों पर नियंत्रण नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में इस पर बड़ी राजनीतिक हलचल तय है।
कृषि प्रधान मध्य प्रदेश में भी इसे लेकर किसानों में चर्चा तेज हो गई है। किसानों के संगठन विरोध की रणनीति बना रहे हैं। किसान सूत्र ने भी सीड बिल के ड्राफ्ट पर बढ़ते विरोध पर किसान संगठन और कृषि के जानकारों से चर्चा की। इस दौरान मिले जुले तर्क सामने आए हैं। किसान अमानक बीजों पर सख्ती को सही मान रहे हैं, लेकिन सिस्टम द्वारा इसका दुरुपयोग करने का अंदेशा भी जता रहे हैं। वहीं, बिल से सबसे ज्यादा खतरा परम्परागत बीज प्रजाति और किसानी को होने की बात कही जा रही है।
केंद्र सरकार ने करीब 60 साल पुराने बीज कानून को बदलने की तैयारी पर सवाल उठ रहे हैं। प्रस्तावित बीज अधिनियम 2026, बीज अधिनियम 1966 और बीज नियंत्रण आदेश 1983 की जगह लेगा। सरकार द्वारा 12 नवंबर को जारी किए गए ड्रॉफ्ट पर किसान संगठन, विपक्ष और कृषि एक्सपर्ट विरोध जता रहे हैं। केंद्र सरकार की मंशा इस बिल को सहमति से पारित करने की है। इसीलिए ड्रॉफ्ट पर 11 दिसंबर तक सुझाव मांगे गए हैं, लेकिन देशभर में हो रहे व्यापक विरोध से सहमति बन पाना मुश्किल नजर आ रहा है।
सरकार का दावा और बिल के प्रावधान
सीड बिल को लेकर सरकार का दावा है कि नए कानून का लक्ष्य किसानों को अमानक बीज से बचाना है। नया कानून बीज की सप्लाई चेन में पारदर्शिता लाएगा। इसके लिए 6 अहम प्रावधान किए गए हैं। बीज के हर पैकेट पर QR कोड दर्ज करना जरूरी होगा। इसके जरिए किसान खरीद से पहले कोड को स्कैन कर बीज के बारे में हर जानकारी हासिल कर सकेगा। अमानक बीज बेचने वालों पर जुर्माना 500 रुपए से बढ़ाकर 30 लाख रुपए किया गया है। वहीं तीन साल की सजा की सख्ती भी इसमें शामिल की गई है।
बीज बेचने वाली हर कंपनी और विक्रेता का पंजीकरण जरूरी होगा। किसान अपने देशी, पारंपरिक और स्वयं विकसित किए बीज बचा सकेंगे। उन्हें आपस में अदला-बदली और स्थानीय स्तर पर बेचने की छूट रहेगी। राज्यों में सीड सेफ्टी फंड बनेगा। अगर बीज खराब होने की पुष्टि होती है तो 15 दिन में किसान को मुआवजा मिलेगा।
कैसा होगा नया नियामक ढांचा
बिल में बीजों के आयात, उत्पादन और आपूर्ति के लिए एक मजबूत नियामक तंत्र बनाया गया है। किसान, डीलर, वितरक और उत्पादक को अलग-अलग इकाई के रूप में परिभाषित किया गया है।27 सदस्यों वाली केंद्रीय बीज समिति और 15 सदस्यों वाली राज्य बीज समिति बनेगी। केंद्रीय समिति बीज के अंकुरण, शुद्धता और गुणवत्ता के मानक तय करेगी। राज्य समिति उत्पादकों और नर्सरियों के पंजीकरण पर सलाह देगी।केंद्र और राज्य स्तर पर बीज परीक्षण प्रयोगशालाएं बनेंगी।
बीज निरीक्षकों को तलाशी और जब्ती की शक्ति मिलेगी। सभी बीज प्रसंस्करण इकाइयों का पंजीकरण राज्य सरकारों के पास अनिवार्य होगा। कई राज्यों में काम करने वाली कंपनियों के लिए केंद्र सरकार एक पारदर्शी केंद्रीय मान्यता प्रणाली बनाएगी, ताकि कारोबार में आसानी हो।
2019 के मसौदे से कितना अलग नया ड्राफ्ट
यह नया मसौदा 2019 के मसौदे से काफी सख्त है। पहले जुर्माना 25 हजार से 5 लाख और एक साल की सजा थी। अब इसे 30 लाख और 3 साल कर दिया गया है।किसानों के अधिकारों को पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम 2001 से जोड़ा गया है। गुणवत्ता मानकों को और कड़ा किया गया है। विदेशी बीजों के आयात को ज्यादा उदार बनाया गया है।
एमपी की देसी किस्मों पर क्या असर पड़ेगा
मध्य प्रदेश शरबती गेहूं, चिन्नौर चावल, महाकौशल चावल, सीतही कुटकी और बैगनी अरहर जैसी GI टैग वाली किस्मों के लिए जाना जाता है। झाबुआ के सीड बैंकों में 193 से ज्यादा पारंपरिक किस्में हैं। विशेषज्ञों को डर है कि यदि बड़ी कंपनियां इन देसी बीजों के जर्म प्लाज्म में थोड़ा बदलाव करके नई किस्म के नाम से पंजीकृत करा लें, तो इसे बायोपायरेसी कहा जाएगा। इससे देसी बीजों की शुद्धता खत्म हो सकती है।
दूसरा डर है कि पंजीकरण और QR कोड की जटिल प्रक्रिया छोटे किसानों और आदिवासी सीड बैंकों के लिए मुश्किल होगी। इससे बाजार में सिर्फ बड़ी कंपनियों के हाइब्रिड बीज ही रह जाएंगे। विदेशी बीजों के परागकण से देसी किस्में दूषित भी हो सकती हैं।
क्या कहते हैं दुनिया के अनुभव
कोलंबिया ने 2010 में रेसोल्यूशन 970 लागू किया था। बिना पंजीकरण वाले बीजों को अवैध कर दिया गया। 2011 में हजारों टन देसी बीज नष्ट किए गए, जिसके बाद 2013 में बड़ा किसान आंदोलन हुआ।
इराक में 2004 में ऑर्डर 81 आया, जिसने किसानों की बीज बचाने की परंपरा को गैरकानूनी बना दिया। किसानों को हर साल कंपनियों से बीज खरीदना पड़ा।
मैक्सिको में 1994 में नाफ्टा समझौते के बाद देसी मक्के की किस्में विदेशी बीजों से दूषित हो गईं। घाना ने 2020 में प्लांट वैराइटी प्रोटेक्शन एक्ट लागू किया, जिसका आज भी विरोध हो रहा है।
क्यों हो रहा है सीड बिल का विरोध
मध्य प्रदेश के किसान संगठनों का कहना है बिल कॉर्पोरेट केंद्रित है। अभी भी बीज पर निजी फर्मों की मनमानी है, नया एक्ट आने के बाद तो छोटे किसानों की मुश्किल और बढ़ जाएगी। कीमत नियंत्रण का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। फसल बर्बाद होने पर सीधा और समयबद्ध मुआवजा कैसे मिलेगा, इसकी कानूनी गारंटी साफ नहीं है। गांवों में इंटरनेट कमजोर है, ज्यादातर पुराने किसान मोबाइल तकनीक के जानकारी नहीं हैं। ऐसे में QR कोड और SATHI पोर्टल की व्यवस्था कैसे चलेगी। विदेशी बीजों के आयात से देशी बीज, जैव-विविधता खतरे में पड़ जाएगी।
बिल की वकालत
1966 का कानून अब पूरी तरह अप्रभावी हो चुका है। नकली बीज बेचने पर मात्र 500 रुपये का मामूली जुर्माना था। नए कानून के तहत नकली और घटिया बीज बेचने वालों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई जाएगी और दोषियों को 30 लाख रुपए तक जुर्माना या 3 साल तक की जेल होगी। किसानों की चिंता को दूर करके और आम सहमति बनाकर ही बिल पारित करेंगे। – शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री
बिल का विरोध
भारतीय किसान संघ सीड बिल के वर्तमान स्वरूप से पूरी तरह असहमत है। इसमें कई प्रावधान किसान और परम्परागत खेती पर बुरा असर डालने वाले हैं। संगठन के राष्ट्रीय पदाधिकारी भी इसका विरोध कर चुके हैं। यदि सरकार सुझाए गए बदलावों के साथ सीड बिल को नए सिरे से तैयार करती है तब ही उस पर सहमति बन सकती है। किसानों के हित की अनदेखी वाला एक भी प्रावधान स्वीकार्य नहीं होगा। -कमल सिंह आंजना, अध्यक्ष भारतीय किसान संघ, मध्य प्रदेश
यह कानून भारत के संघीय ढांचे पर सीधा हमला है, क्योंकि यह राज्य सरकारों की मौजूदा जांच और मूल्य-नियंत्रण की शक्तियों को छीनकर केंद्र के पास केंद्रित कर रहा है। अगर नकली बीज से किसी गरीब किसान की पूरी फसल तबाह हो जाती है, तो कंपनी द्वारा किसान को सीधे मुआवजा देने की कानूनी समय-सीमा और गारंटी इसमें गायब है। -धर्मेन्द्र सिंह चौहान, अध्यक्ष मध्य प्रदेश किसान कांग्रेस