किसान की बात,सूत्र के साथ

ICAR-IARI ने किसानों के बताए जल प्रबंधन के तरीके, शिवराज ने खेती में पानी बचाने वाली तकनीकें अपनाने की सलाह दी

newz@gmail.com | Oct 14, 2026, 18:35 IST

दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में दो दिवसीय किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पानी बचाने, ड्रिप सिंचाई, फसल विविधीकरण और हाइड्रोपोनिक्स अपनाने पर जोर दिया।

किसानों का प्रशिक्षण

खेती में पानी की सही मात्रा और समय पर उपलब्धता जरूरी है। इसी जरूरत को ध्यान में रखकर किसानों को आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI) में कार्यक्रम आयोजित हुआ। यह दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम 14 अक्टूबर को संपन्न हुआ। इसमें मध्य प्रदेश के विदिशा, रायसेन और सीहोर जिलों के किसान शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को जल प्रबंधन के बेहतर तरीके सिखाना था।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों से संवाद किया। उन्होंने खेती में पानी बचाने वाली तकनीकें अपनाने की सलाह दी। उन्होंने सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण और हाइड्रोपोनिक्स पर विशेष जोर दिया। इन तकनीकों से उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। किसानों को खेती की जरूरतों के अनुसार सही तकनीक चुनने की जानकारी भी मिली। इसका उद्देश्य उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय सुधारने के रास्ते खोलना है।

ड्रिप सिंचाई से कैसे होगा फायदा?

प्रशिक्षण का मुख्य विषय पानी का बेहतर उपयोग करना था। कार्यक्रम का विषय उच्च जल उत्पादकता के लिए उन्नत जल प्रबंधन तकनीक था। इसमें सूक्ष्म सिंचाई पर विशेष ध्यान दिया गया। कार्यक्रम का आयोजन जल प्रौद्योगिकी केंद्र (WTC) ने किया। यह केंद्र भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का हिस्सा है। प्रशिक्षण मध्य प्रदेश के कृषि रोडमैप के तहत आयोजित किया गया।

किसानों को ड्रिप सिंचाई की अलग-अलग प्रणालियों की जानकारी दी गई। इनमें मल्चिंग के साथ एकीकृत ड्रिप सिंचाई भी शामिल थी। उप-सतही ड्रिप प्रणाली के बारे में भी किसानों को बताया गया। ड्रिप सिंचाई में पानी बूंद-बूंद करके पौधों की जड़ों तक पहुंचता है। इससे खेत में पानी देने की प्रक्रिया को नियंत्रित करना आसान होता है। जरूरत के अनुसार पानी पहुंचाने से इसके बेहतर इस्तेमाल में मदद मिलती है।

हालांकि, हर फसल और खेत के लिए एक जैसी प्रणाली सही नहीं होती। किसान मिट्टी, फसल और पानी की उपलब्धता देखकर तकनीक चुन सकते हैं। सही डिजाइन और रखरखाव भी सिंचाई की सफलता के लिए जरूरी है।

फर्टिगेशन और पानी का प्रबंधन

प्रशिक्षण में स्वचालित ड्रिप फर्टिगेशन की जानकारी भी दी गई। फर्टिगेशन में सिंचाई के पानी के साथ उर्वरक दिए जाते हैं। इससे पौधों तक पानी और पोषक तत्व पहुंचाने में मदद मिलती है। किसानों को औषधीय पौधों और ड्रैगन फ्रूट की खेती में इसका उपयोग समझाया गया। प्रशिक्षण में सिंचाई का सही समय तय करने की तकनीकें भी शामिल थीं। प्राकृतिक खेती में फूलों की फसलों के जल प्रबंधन पर भी चर्चा हुई।

वर्षा जल संरक्षण और पानी की गुणवत्ता प्रबंधन की जानकारी भी दी गई। इन तरीकों का मकसद खेती में उपलब्ध पानी का बेहतर उपयोग करना है। किसानों के लिए पानी की गुणवत्ता समझना भी जरूरी है। सिंचाई के पानी की गुणवत्ता मिट्टी और फसल पर असर डाल सकती है। इसलिए पानी की जांच और उचित प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए। इससे खेती के फैसले अधिक जानकारी के आधार पर लिए जा सकते हैं।

धान, सोयाबीन और गेहूं पर फोकस

प्रशिक्षण में कई प्रमुख फसलों की खेती पर चर्चा हुई। किसानों ने धान, सोयाबीन, गेहूं, चना और सब्जियों से जुड़ी जानकारी प्राप्त की। इन फसलों में पानी का कुशल उपयोग करने के तरीकों पर जोर रहा। किसानों को ऐसी किस्मों और कृषि पद्धतियों की जानकारी दी गई। इनका उद्देश्य उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है। साथ ही फसल उत्पादन और जल उपयोग दक्षता में सुधार करना भी लक्ष्य है।

मध्य प्रदेश में फसल के अनुसार पानी की जरूरत अलग-अलग होती है। इसलिए किसानों के लिए सिंचाई की योजना बनाना महत्वपूर्ण है। खेत की स्थिति और फसल की अवस्था देखकर पानी देना चाहिए। फसल विविधीकरण भी इस प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। इसका मतलब खेती में एक ही फसल पर निर्भरता कम करना है। किसान अपनी जमीन, मौसम और बाजार की जरूरतों के अनुसार विकल्प चुन सकते हैं।

हाइड्रोपोनिक्स से लेकर वर्टिकल फार्मिंग

प्रशिक्षण में किसानों को केवल कक्षा में जानकारी नहीं दी गई। उन्हें संस्थान में मौजूद आधुनिक खेती के मॉडल भी दिखाए गए। इससे तकनीकों को व्यावहारिक रूप में समझने का अवसर मिला। किसानों ने हाइड्रोपोनिक्स और एक्वापोनिक्स के मॉडल देखे। हाइड्रोपोनिक्स में मिट्टी के बिना पौधे उगाए जाते हैं। इसमें पौधों को जरूरी पोषक तत्व पानी के माध्यम से दिए जाते हैं।

एक्वापोनिक्स में मछली पालन और पौधों की खेती को जोड़ा जाता है। वर्टिकल फार्मिंग में पौधों को अलग-अलग ऊंचाई वाली परतों में उगाया जाता है। इन तरीकों में तकनीकी प्रबंधन और शुरुआती निवेश महत्वपूर्ण होते हैं। किसानों ने पॉलीहाउस खेती और एकीकृत कृषि प्रणाली के मॉडल भी देखे। एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) में खेती के साथ दूसरी कृषि गतिविधियां जोड़ी जा सकती हैं। इससे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने के अवसर मिलते हैं।

कार्यक्रम में एग्रीवोल्टाइक्स की जानकारी भी शामिल थी। इसमें कृषि गतिविधियों के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन को जोड़ा जाता है। किसानों ने स्वचालित सिंचाई प्रणालियों और उन्नत कृषि उपकरणों को भी देखा। इसके अलावा अमृत सरोवर और बीज उत्पादन से जुड़ी सुविधाओं का अवलोकन कराया गया। इन प्रदर्शनों का उद्देश्य किसानों को नई तकनीकों से परिचित कराना था। किसान अपनी जरूरत के अनुसार इन तरीकों की उपयोगिता समझ सकते हैं।

शिवराज सिंह चौहान ने क्या कहा?

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों से सीधे संवाद किया। उन्होंने जल-कुशल कृषि पद्धतियां अपनाने पर जोर दिया। उनका संदेश पानी बचाने और खेती की उत्पादकता बढ़ाने पर केंद्रित रहा। खेती में पानी का बेहतर उपयोग किसानों की लागत को प्रभावित कर सकता है। वहीं, सिंचाई का सही प्रबंधन फसल की जरूरतें पूरी करने में मदद करता है। इसलिए किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तकनीक अपनानी चाहिए।

सूक्ष्म सिंचाई के साथ फसल विविधीकरण भी महत्वपूर्ण हो सकता है। हाइड्रोपोनिक्स जैसी तकनीकें कुछ परिस्थितियों में खेती के नए विकल्प देती हैं। हालांकि, इन्हें अपनाने से पहले लागत और बाजार की संभावना समझना जरूरी है। प्रशिक्षण कार्यक्रम ने किसानों और कृषि अनुसंधान संस्थानों के बीच संवाद का अवसर दिया। ऐसे कार्यक्रम नई तकनीकों की जानकारी किसानों तक पहुंचाने में मदद करते हैं। इनका लाभ तभी बढ़ेगा, जब किसान सीखी गई तकनीकों को खेतों में सही ढंग से लागू कर सकेंगे।

कृषि वैज्ञानिकों ने भी लिया हिस्सा

कार्यक्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के उप महानिदेशक डॉ. राजबीर सिंह शामिल हुए। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. चेरुकमल्ली श्रीनिवास राव भी मौजूद रहे।

परिषद के सहायक महानिदेशक डॉ. आर.आर. बर्मन ने भी भाग लिया। संस्थान के संयुक्त निदेशक प्रसार डॉ. आर.एन. पडारिया भी कार्यक्रम में शामिल हुए। जल प्रौद्योगिकी केंद्र के परियोजना निदेशक डॉ. पी.एस. ब्रह्मानंद सहित अन्य वैज्ञानिक और कर्मचारी मौजूद रहे।

वैज्ञानिकों की भागीदारी से किसानों को तकनीकी जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिला। ऐसे संवाद खेती से जुड़ी समस्याओं और उनके संभावित समाधानों पर चर्चा का मंच बनते हैं। इससे शोध और खेतों में अपनाई जाने वाली तकनीकों के बीच संपर्क मजबूत हो सकता है।

किसानों के लिए क्या है इसका महत्व?

पानी की उपलब्धता खेती की उत्पादकता को प्रभावित करने वाला अहम कारक है। कई क्षेत्रों में सिंचाई का सही प्रबंधन किसानों के लिए जरूरी है। ऐसे में जल प्रबंधन का प्रशिक्षण व्यावहारिक जानकारी उपलब्ध करा सकता है।

ड्रिप सिंचाई, वर्षा जल संरक्षण और सिंचाई का सही समय तय करना उपयोगी हो सकता है। हाइड्रोपोनिक्स और पॉलीहाउस जैसी तकनीकें भी कुछ किसानों के लिए विकल्प बन सकती हैं। हालांकि, किसी तकनीक को अपनाने से पहले खर्च, प्रशिक्षण और बाजार का आकलन करना चाहिए।

इस प्रशिक्षण में मध्य प्रदेश के तीन जिलों के किसानों ने हिस्सा लिया। अब महत्वपूर्ण बात यह होगी कि वे सीखी गई तकनीकों को अपने खेतों में कैसे अपनाते हैं। स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर किसान अपनी जरूरतों के अनुसार सही विकल्प चुन सकते हैं।

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