गन्ना किसानों की मांग पर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। दिल्ली की बैठक में एक हफ्ते में हाईलेवल कमेटी बनाने का फैसला हुआ। यह कमेटी गन्ने से जुड़े तकनीकी मुद्दों की समीक्षा करेगी। बैठक सोमवार 12 अक्टूबर को हुई। इसमें कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और खाद्य मंत्री प्रह्लाद जोशी शामिल हुए। महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसान संगठनों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। किसानों का आंदोलन कर्नाटक में चल रहा था। अब देखना है कि इस फैसले के बाद आंदोलन का रुख क्या रहता है।
दिल्ली की बैठक में क्या हुआ
नई दिल्ली में करीब तीन घंटे बैठक चली। बैठक में महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसान संगठनों ने अपनी बात रखी। बैठक में किसानों के मुद्दों पर विस्तार से बात हुई। बैठक का सबसे बड़ा नतीजा कमेटी का फैसला रहा। तय हुआ कि एक हफ्ते के भीतर उच्चस्तरीय संयुक्त समिति बनाई जाएगी। अल्पकालिक और दीर्घकालिक नीतिगत फैसलों पर भी सहमति बनी। प्रशासनिक सुधारों पर भी बात आगे बढ़ी।
हाईलेवल कमेटी में कौन होगा
प्रस्तावित समिति में कई पक्षों को जगह मिलेगी। इसमें केंद्र सरकार के प्रतिनिधि होंगे। महाराष्ट्र और कर्नाटक सरकारों के प्रतिनिधि भी इसका हिस्सा होंगे। किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को भी समिति में रखा जाएगा। चीनी मिलों के प्रतिनिधि, विषय विशेषज्ञ और वैज्ञानिक भी इसमें होंगे। यानी किसान और मिल, दोनों पक्ष एक मेज पर बैठेंगे।
कमेटी क्या जांचेगी
समिति गन्ने से जुड़े कई तकनीकी पहलुओं की समीक्षा करेगी। इनमें गन्ने की कटाई का समय शामिल है। चीनी रिकवरी के वैज्ञानिक मानक भी जांचे जाएंगे।
रिकवरी का मतलब है कि 100 किलो गन्ने से कितनी चीनी निकलती है। किसानों का भुगतान इसी आंकड़े से जुड़ा होता है। इसलिए इसमें गड़बड़ी का सीधा असर किसान की जेब पर पड़ता है।
समिति प्रयोगशाला जांच और तौल की सटीकता भी देखेगी। यह कमेटी तय समयसीमा में अपनी सिफारिशें सौंपेगी। हालांकि समयसीमा कितनी होगी, यह अभी साफ नहीं है।
किसानों की शिकायतें क्या हैं
किसानों ने कई मुद्दे उठाए हैं। सबसे बड़ा मुद्दा रिकवरी के आंकड़ों में विसंगतियों का है। तौल और वजन में कटौती की शिकायत भी की गई है। किसान बर्बादी और प्रयोगशाला जांच पर भी सवाल उठा रहे हैं। फसल बीमा का मुद्दा भी उनकी सूची में शामिल है। इन सभी बातों का सीधा संबंध किसान की असली कमाई से है। वजन या रिकवरी में थोड़ी चूक भी बड़ा नुकसान कर सकती है।
शिवराज ने कहा- शोषण बर्दाश्त नहीं
चौहान ने कहा कि किसानों का शोषण किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं होगा। उन्होंने रिकवरी और वजन से जुड़े मामलों को बेहद संवेदनशील बताया। उन्होंने जोर दिया कि इसके लिए पारदर्शी और वैज्ञानिक व्यवस्था बननी चाहिए।
एफआरपी 365 रुपए प्रति क्विंटल
खाद्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने गन्ने के भाव की जानकारी दी। जोशी के मुताबिक चीनी सीजन 2026-27 का एफआरपी (Fair and Remunerative Price) तय हुआ। यह सीजन अक्टूबर 2026 से सितंबर 2027 तक का है। यह भाव 365 रुपए प्रति क्विंटल है। यह भाव 10.25 फीसदी की बुनियादी रिकवरी पर लागू है। एफआरपी वह न्यूनतम मूल्य है, जो मिलों को कानूनन किसानों को देना होता है।
किसानों की मुख्य मांगें
किसान संगठनों की मांगें कई हैं। पहली मांग गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाने की है। कर्नाटक शुगरकेन ग्रोअर्स एसोसिएशन की मांग कम से कम 550 रुपए प्रति क्विंटल है। यह एफआरपी से 185 रुपए ज्यादा है।
दूसरी मांग चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य बढ़ाने की है। किसानों के मुताबिक यह मूल्य फरवरी 2019 से 31 रुपए किलो पर टिका है। यानी सात साल से ज्यादा समय से इसमें बदलाव नहीं हुआ।
तीसरी मांग एफआरपी तय करने के तरीके से जुड़ी है। किसान चाहते हैं कि सिर्फ चीनी के दाम को आधार न बनाया जाए। एथेनॉल, खोई यानी बैगास और बिजली से होने वाली आय भी जोड़ी जाए।
चौथी मांग राज्य परामर्श मूल्य की है। किसान एसएपी (State Advised Price) एफआरपी से ज्यादा देने की मांग कर रहे हैं। उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और बिहार में ऐसा होता है।
कर्नाटक में आंदोलन की स्थिति
कर्नाटक के किसानों ने 29 सितंबर को हुबली में आंदोलन शुरू किया था। मांगें न मानने पर अनिश्चितकालीन हाईवे जाम की चेतावनी थी। यह जाम 13 अक्टूबर से होना था। केंद्र सरकार ने किसानों से आंदोलन वापस लेने की अपील की। उन्हें बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया गया। इसी के बाद सोमवार की बैठक हुई।
किसान संगठन का क्या कहना है
कर्नाटक शुगरकेन ग्रोअर्स एसोसिएशन के हावेरी जिला अध्यक्ष भुवनेश सिद्दापुर ने अपनी चिंता रखी। उनके मुताबिक समिति की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। इसी वजह से किसानों को तुरंत समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी चाहिए। संगठन का जोर इसी बात पर है। आगे की रणनीति पर संगठन ने फैसला नहीं किया है। यह फैसला सदस्यों से चर्चा के बाद लिया जाएगा।
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