राजस्थान सरकार कृषि उपज को प्रसंस्करण और निर्यात से जोड़ने की तैयारी कर रही है। इसके लिए दस फसल आधारित क्लस्टर विकसित किए जाएंगे। सरकार का दावा है, इससे किसानों को बेहतर बाजार मिल सकेगा। स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण सुविधाएं बढ़ाने की भी तैयारी है।
क्लस्टर बनने से किसान अपनी उपज आसपास की इकाइयों तक पहुंचा सकेंगे। हालांकि लाभ परियोजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
बैठक में क्या निर्देश मिले
शासन सचिवालय में हितधारकों की समीक्षा बैठक बुधवार को आयोजित हुई। मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने बैठक की अध्यक्षता की। उन्होंने फसल और क्षेत्रवार विस्तृत मैपिंग कराने के निर्देश दिए। मैपिंग से निवेश योग्य क्षेत्रों और बाजारों की पहचान होगी।
अधिकारियों को क्लस्टरवार लागू करने योग्य कार्ययोजना भी बनानी होगी। इसमें फसल उत्पादन और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी शामिल होगी। मुख्य सचिव ने किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने पर जोर दिया। उन्होंने कृषि उपज को बाजार और निर्यात से जोड़ने को कहा।
खेत से बाजार तक सुविधा
मुख्य सचिव ने क्लस्टर केवल प्रसंस्करण तक सीमित नहीं रखने को कहा। उन्होंने पूरी मूल्य श्रृंखला मजबूत करने पर जोर दिया। इसमें उपज की छंटाई, श्रेणीकरण और पैकेजिंग शामिल होगी। शीत भंडारण और प्रसंस्करण की सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी। परिवहन और आपूर्ति व्यवस्था को भी मजबूत करने की तैयारी है। ब्रांड निर्माण और बाजार से जुड़ाव भी योजना का हिस्सा रहेगा।
इन सुविधाओं से कटाई बाद नुकसान घटने की उम्मीद है। स्थानीय प्रसंस्करण बढ़ने पर उपज की मांग भी बढ़ सकती है। किसानों को वास्तविक लाभ मिलने के लिए सही स्थान चुनना जरूरी होगा। इकाइयां प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों के आसपास स्थापित होनी चाहिए।
39 फूड पार्क प्रस्तावित
कृषि एवं उद्यानिकी विभाग की प्रमुख सचिव मंजू राजपाल ने आंकड़े साझा किए। उन्होंने राज्य की मौजूदा तैयारियों की जानकारी दी। राजस्थान फूड पार्क डेवलपमेंट पॉलिसी-2026 में 39 फूड पार्क प्रस्तावित हैं। इनमें 35 स्थानों पर भूमि आवंटित हो चुकी है। भूमि आवंटन किसी परियोजना का शुरुआती चरण होता है। निर्माण, निवेश और संचालन की प्रगति अलग से देखनी होगी।
राज्य में अभी दो मेगा फूड पार्क उपलब्ध हैं। चार एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर भी पहले से मौजूद हैं। औद्योगिक विकास निगम और मसाला क्षेत्र के छह पार्क भी उपलब्ध हैं। ये सुविधाएं कृषि प्रसंस्करण का मौजूदा आधार तैयार करती हैं।
एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर में इन पर फोकस
नए क्लस्टर मूंग, सरसों और सोयाबीन पर आधारित होंगे। किन्नू, अनार, अमरूद और संतरा भी योजना में शामिल हैं। इसबगोल, जीरा और लहसुन के लिए भी क्लस्टर विकसित होंगे। इन फसलों के प्रमुख जिलों की मैपिंग की गई है।
सरकार उत्पादन क्षेत्रों को प्रसंस्करण सुविधाओं से जोड़ना चाहती है। इससे लंबी दूरी की परिवहन लागत घट सकती है। प्रसंस्करण के बाद उत्पादों की बाजार अवधि भी बढ़ सकती है। पैकेजिंग और ब्रांडिंग से नए खरीदारों तक पहुंच बनेगी।
सात क्लस्टर पात्र
उद्यानिकी आयुक्त श्वेता चौहान ने सात क्लस्टरों को पात्र बताया। ये राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के विकास कार्यक्रम में पात्र हैं। अमरूद, अनार और जीरा के अवधारणा प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं। इसबगोल, किन्नू, लहसुन और संतरा अगले चरण में प्रस्तावित होंगे।
सरसों, सोयाबीन और मूंग अलग योजनाओं से आगे बढ़ेंगे। इनमें फूड पार्क और निवेश समझौतों का सहारा लिया जाएगा। इन प्रस्तावों की मंजूरी संबंधित योजनाओं के नियमों पर निर्भर करेगी। पात्रता से परियोजना को तत्काल मंजूरी मिलना तय नहीं होता।
किसान संगठनों की मैपिंग
नाबार्ड (National Bank for Agriculture and Rural Development) आर्थिक संभावनाएं जांचेगा। वह क्लस्टरों की व्यावसायिक क्षमता का आकलन भी करेगा। यह संस्थान किसान उत्पादक संगठनों की क्षेत्रवार मैपिंग करेगा। इससे सक्रिय किसान समूहों की जानकारी मिल सकेगी।
किसान उत्पादक संगठन सामूहिक बिक्री में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं। छोटे किसान भी समूहों के जरिए बड़े बाजार पा सकते हैं। साझा पैकेजिंग और भंडारण से उनकी लागत घट सकती है। बेहतर सौदेबाजी से उपज का मूल्य भी बढ़ सकता है।
उद्योग और निर्यात पर जोर
अतिरिक्त मुख्य सचिव शिखर अग्रवाल ने बड़े उद्यम आकर्षित करने पर जोर दिया। उन्होंने निर्यात योग्य उत्पाद चिह्नित करने को कहा। संभावित घरेलू और विदेशी बाजारों की पहचान भी की जाएगी। क्लस्टरों को फूड पार्क और औद्योगिक नीतियों से जोड़ा जाएगा।
इससे साझा भंडारण, प्रसंस्करण और परिवहन लागत घट सकती है। बड़े खरीदारों तक किसानों की पहुंच भी आसान हो सकती है। मगर निवेश और बाजार समझौते समय पर पूरे होना जरूरी है। गुणवत्ता मानकों का पालन भी निर्यात के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
3,350 से अधिक इकाइयां
प्रदेश में 1,500 से अधिक एग्रो-प्रोसेसिंग इकाइयां मौजूद हैं। इन्हें प्रस्तावित क्लस्टर व्यवस्था से जोड़ने की योजना है। प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना से 1,850 इकाइयां समर्थित हैं। इनमें छोटे खाद्य प्रसंस्करण उद्यम शामिल हैं।
दोनों श्रेणियों को मिलाकर संख्या 3,350 से अधिक होती है। सरकार इनके अनुभव और सुविधाओं का उपयोग करना चाहती है। मौजूदा इकाइयां नई परियोजनाओं की शुरुआत तेज कर सकती हैं। इनके बाजार संपर्क से किसानों को खरीदार मिलने में मदद होगी।
किसानों को कैसे फायदा होगा
क्लस्टर सफल रहे तो किसानों को स्थानीय खरीदार मिल सकते हैं। उपज बेचने के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी। भंडारण सुविधा मिलने से तुरंत बिक्री का दबाव कम हो सकता है। प्रसंस्करण से कच्ची उपज के मुकाबले मूल्य बढ़ सकता है।
कटाई बाद खराब होने वाली उपज का नुकसान भी घटेगा। फल और मसाला किसानों को इसका अधिक लाभ मिल सकता है। हालांकि किसानों का मूल्य केवल क्लस्टर बनने से तय नहीं होगा। खरीद समझौते और भुगतान व्यवस्था भी पारदर्शी होनी चाहिए।
जरूरी FAQ
राजस्थान में कितने एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर विकसित होंगे?
राजस्थान में दस फसल आधारित एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर विकसित किए जाएंगे। इनका उद्देश्य उत्पादन क्षेत्रों को प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ना है। क्लस्टर बनने की समयसीमा अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।
क्लस्टर किन फसलों पर आधारित होंगे?
क्लस्टर मूंग, सरसों, सोयाबीन, किन्नू और अनार पर आधारित होंगे। इनमें अमरूद, संतरा, इसबगोल, जीरा और लहसुन भी शामिल हैं। प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों की जिला और फसलवार मैपिंग की गई है।
किसानों को क्लस्टर से क्या फायदा होगा?
किसानों को छंटाई, पैकेजिंग और शीत भंडारण सुविधाएं मिल सकती हैं। स्थानीय प्रसंस्करण से परिवहन और कटाई बाद नुकसान घट सकता है। बाजार संपर्क बढ़ने से उपज का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना रहेगी।
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