अनाज के बाजार में अब बड़ा बदलाव होने वाला है। नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को 18वां BRICS शिखर सम्मेलन हुआ। BRICS का मतलब है Brazil, Russia, India, China, South Africa। भारत ने इस बार सम्मेलन की मेजबानी की। इसके घोषणापत्र में अनाज एक्सचेंज को लेकर बड़ी पुष्टि हुई है। यह फैसला दुनिया भर के किसानों के लिए अहम माना जा रहा है। व्यापारियों के लिए भी यह बड़ी खबर है।
सदस्य देशों ने अनाज कारोबार के लिए साझा एक्सचेंज बनाने का फैसला किया है। यह दिशा तय की गई है। यह पहल रूस की तरफ से रखी गई थी। रूस चाहता है कि इसे इस साल शुरू किया जाए। इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू करने की योजना है। इसके बाद 2027 तक इसे पूरी तरह चालू कर दिया जाएगा।
ग्रेन एक्सचेंज से कीमत और सप्लाई पर नजर
BRICS देशों का मानना है कि अनाज उत्पादन में उनकी बड़ी हिस्सेदारी है। दुनिया के बड़े अनाज उत्पादक और निर्यातक देश इसी समूह में शामिल हैं। इसलिए साझा प्लेटफॉर्म बनाने से खाद्य सुरक्षा मजबूत हो सकती है। इस एक्सचेंज का मकसद कीमतों में अचानक आने वाली बढ़ोतरी थामना है। साथ ही सप्लाई में आने वाली रुकावटों का असर भी कम करना है।
ऐसी रुकावटें आमतौर पर मौसम या वैश्विक तनाव से आती हैं। आगे चलकर इसमें दूसरे कृषि उत्पाद और कमोडिटीज भी जोड़ी जा सकती हैं। यानी यह सिर्फ अनाज तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले सालों में इसका दायरा और बड़ा हो सकता है। इससे सदस्य देशों के बीच व्यापार भी आसान हो सकता है।
रूस को बड़ी बचत की उम्मीद
रूस काफी समय से इस मांग को उठाता रहा है। यह मांग पहले भी कई BRICS बैठकों में सामने आ चुकी है। रिपोर्टों के मुताबिक रूस मौजूदा अंतरराष्ट्रीय फ्यूचर्स ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म का विकल्प चाहता है। रूस के मुताबिक इससे अनाज कारोबार में लागत घट सकती है। रिपोर्टों के मुताबिक रूस को इससे हर साल करीब 2.5 अरब डॉलर की बचत होने की उम्मीद है। यह रकम काफी बड़ी है। इसलिए रूस इस प्रस्ताव पर लगातार जोर दे रहा है। अपने खुद के एक्सचेंज से रूस को पश्चिमी प्लेटफॉर्म पर निर्भरता भी घटेगी।
खाद पर भी होगी बात
घोषणापत्र में खाद की सप्लाई को लेकर भी चिंता जताई गई है। खाद की कमी सीधे खेती और खाद्य उत्पादन को प्रभावित करती है। चीन ने फर्टिलाइजर निर्यात पर भविष्य के प्रतिबंध से छूट नहीं दी है। इसलिए इस मुद्दे पर आगे बातचीत जारी रहेगी। साथ ही सदस्य देशों ने खाद और बीज बढ़ाने पर जोर दिया है। जरूरी संसाधन बढ़ाने पर भी सहमति बनी है। सूखे और जलवायु बदलाव से निपटने के लिए बेहतर बीज प्रणाली चाहिए। राष्ट्रीय खाद्य भंडारण व्यवस्था मजबूत करने पर भी सहमति बनी है। इससे संकट के समय अनाज की कमी नहीं होगी।
AGRIN नेटवर्क बनेगा
जून महीने में इंदौर में BRICS कृषि मंत्रियों की बैठक हुई थी। भारत ने इस बैठक की मेजबानी की थी। इस बैठक का जिक्र भी घोषणापत्र में किया गया है। बैठक में BRICS AGRIN नाम से किसान-केंद्रित नेटवर्क बनाने पर सहमति बनी। इस नेटवर्क के जरिए कृषि इनपुट और जेनेटिक संसाधन साझा किए जाएंगे। साथ ही कृषि से जुड़ी जरूरी जानकारी भी आपस में साझा होगी। इससे सदस्य देशों के किसानों को सीधा फायदा मिल सकता है। भारत जैसे बड़े कृषि प्रधान देश के लिए यह नेटवर्क खास मायने रखता है।
BRICS देशों का डिजिटल खेती पर जोर
BRICS देश खेती को जलवायु बदलाव के हिसाब से मजबूत बनाना चाहते हैं। इसके लिए एग्रो-इकोलॉजी और रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर को बढ़ावा दिया जाएगा। इस मकसद से एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस नेटवर्क बनाने की बात कही गई है। यह नेटवर्क खेती के नए और टिकाऊ तरीके साझा करेगा। इसके अलावा डिजिटल खेती के लिए भी अलग नेटवर्क तैयार होगा। तकनीक की मदद से खेती को आसान बनाने पर जोर रहेगा। इसमें सिर्फ फसल उत्पादन नहीं बल्कि एग्रोफॉरेस्ट्री भी शामिल होगी। मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर जैसे क्षेत्र भी इसमें जोड़े जाएंगे। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिल सकता है।
किसानों को मिलेगा फायदा
सदस्य देशों ने कृषि व्यापार आसान बनाने पर बातचीत जारी रखने की बात कही। साथ ही भेदभाव रहित सप्लाई चेन बनाने पर भी जोर दिया गया है। WTO (World Trade Organisation) में कृषि मुद्दों पर सहयोग जारी रहेगा। घोषणापत्र में माना गया है कि बदलती नीतियां खेती को प्रभावित कर रही हैं। मौसम का असर भी साफ दिख रहा है। इसका सीधा असर छोटे और पारिवारिक किसानों की आय पर भी पड़ता है। इसलिए BRICS देशों के बीच कृषि सहयोग बढ़ाना बहुत जरूरी माना जा रहा है। इसका मकसद किसानों को बेहतर बाजार और खाद्य सुरक्षा से जोड़ना है। भारत जैसे देश के लिए यह सहयोग किसानों की आमदनी बढ़ा सकता है। आने वाले महीनों में इस एक्सचेंज की रूपरेखा और साफ हो सकती है।
जरूरी FAQ
BRICS ग्रेन एक्सचेंज क्या है?
यह BRICS देशों का साझा प्लेटफॉर्म है, जहां सदस्य देश अनाज की खरीद-बिक्री कर सकेंगे। इसका मकसद अनाज की कीमतों में अचानक आने वाले उतार-चढ़ाव और सप्लाई की रुकावट को कम करना है। रूस ने यह प्रस्ताव रखा था और इसे नई दिल्ली में हुए 18वें BRICS सम्मेलन के घोषणापत्र में शामिल किया गया।
यह एक्सचेंज कब तक पूरी तरह शुरू होगा?
रूस चाहता है कि इसे इस साल यानी 2026 में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया जाए। इसके बाद 2027 तक इसे पूरी तरह चालू करने की योजना है। हालांकि अंतिम रूपरेखा को लेकर आगे और बातचीत होनी बाकी है।
इस एक्सचेंज से रूस और किसानों को क्या फायदा होगा?
रिपोर्टों के मुताबिक रूस को इससे हर साल करीब 2.5 अरब डॉलर की बचत हो सकती है, क्योंकि उसे मौजूदा अंतरराष्ट्रीय फ्यूचर्स ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। किसानों के लिए यह पहल बेहतर बाजार, स्थिर कीमत और खाद-बीज जैसे जरूरी इनपुट की उपलब्धता बढ़ाने में मदद कर सकती है।
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