Dhaan Ka katora: छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। यहां चुनावी राजनीति में किसानों का मुद्दा हमेशा केंद्र में रहा है। धान की कीमत, बोनस, कर्जमाफी, समर्थन मूल्य और फसल खरीदी जैसे मुद्दों ने कई चुनावों की दिशा तय की है, लेकिन छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अब तक के चार मुख्यमंत्रियों में से दो ऐसे रहे हैं, जिनके चुनावी हलफनामों में खेती-किसानी सिर्फ जमीन-जायदाद के रूप में नहीं, बल्कि उनके पेशे और आय के स्रोत के तौर पर दर्ज है। ये दो नाम हैं मौजूदा मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल।
किसान परिवार से जुड़े हुए हैं विष्णुदेव साय
मौजूदा मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मामले में तस्वीर ज्यादा साफ है। 2023 के विधानसभा चुनाव के लिए दाखिल हलफनामे में उनके पेशे के सामने सीधे किसान लिखा है। आय के स्रोतों में भी कृषि शामिल है। हलफनामे में उनके एचयूएफ की आय में भी कृषि का उल्लेख है।
जशपुर की आदिवासी और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विष्णुदेव साय का राजनीतिक सफर गांव की जमीन से शुरू होकर दिल्ली की राजनीति तक पहुंचा।
विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री और अब मुख्यमंत्री बनने तक उन्होंने लंबी राजनीतिक यात्रा तय की, लेकिन चुनावी दस्तावेजों में उनकी पेशेवर पहचान में आज भी किसान शामिल है। उनका परिवार खेती किसानी से ही जुड़ा हुआ है। खुद विष्णुदेव साय खेतों में धान की रोपाई करने निकल जाते हैं।
बघेल का खेती से पुराना रिश्ता
भूपेश बघेल की पहचान राजनीति में भले ही एक तेजतर्रार नेता की रही हो, लेकिन उनके चुनावी दस्तावेज खेती से उनके पुराने रिश्ते की कहानी भी बताते हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपना पेशा सिर्फ कृषि बताया था।
2018 में पेशे के रूप में कृषि दर्ज किया गया और 2023 के हलफनामे में भी कृषि उनके पेशे का हिस्सा रही। उनकी पत्नी के पेशे में भी कृषि दर्ज है। बघेल के हलफनामों में दुर्ग जिले के पाटन क्षेत्र के कई गांवों में कृषि भूमि का उल्लेख मिलता है। 2023 के चुनावी दस्तावेज में भिलाई-3, बलौदी और कुरुदडीह समेत अन्य स्थानों पर कृषि भूमि दर्ज है।
यानी पाटन की राजनीति से निकले बघेल का खेती से रिश्ता केवल राजनीतिक मंचों पर किसानों की बात करने तक सीमित नहीं दिखता। भूपेश बघेल ने खेती किसानी को जिया भी है।
चार मुख्यमंत्री, दो के दस्तावेजों में खेती
छत्तीसगढ़ (CG Dhaan Ka katora) में अब तक चार लोग मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं। अजीत जोगी, डॉ. रमन सिंह, भूपेश बघेल और विष्णुदेव साय। इनमें अजीत जोगी की पृष्ठभूमि प्रशासनिक सेवा की रही, जबकि डॉ. रमन सिंह पेशे से चिकित्सक रहे। दूसरी तरफ भूपेश बघेल और विष्णुदेव साय के चुनावी हलफनामों में कृषि सीधे उनके पेशे या आय के स्रोत का हिस्सा दिखाई देती है। इस लिहाज से चार मुख्यमंत्रियों में दो के दस्तावेजों में खेती का सीधा उल्लेख मिलता है। यह आंकड़ा छोटा लग सकता है, लेकिन धान के कटोरे की राजनीति के लिहाज से इसका अपना महत्व है।
खेत से सत्ता तक दो अलग-अलग राजनीतिक यात्राएं
भूपेश बघेल और विष्णुदेव साय की राजनीतिक यात्राएं एक-दूसरे से काफी अलग रही हैं। बघेल पाटन क्षेत्र की राजनीति से निकलकर प्रदेश कांग्रेस के बड़े चेहरे बने और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। दूसरी ओर साय ने जशपुर के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र से अपनी राजनीति शुरू की और सांसद से केंद्रीय मंत्री होते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने। दोनों की राजनीतिक विचारधारा और दल अलग हैं, लेकिन एक बात समान है। दोनों के चुनावी दस्तावेजों में खेती उनकी पहचान का हिस्सा रही है।
किसान छत्तीसगढ़ की राजनीति की धुरी
छत्तीसगढ़ में किसान सिर्फ एक वोट बैंक नहीं है। धान की एक घोषणा लाखों किसानों को प्रभावित करती है और सरकारों के राजनीतिक भविष्य तक पर असर डाल सकती है। समर्थन मूल्य से लेकर धान खरीदी तक, किसानों से जुड़े फैसले सीधे गांव और चुनाव दोनों पर असर डालते हैं। ऐसे राज्य में दो मुख्यमंत्रियों का खुद को चुनावी दस्तावेजों में किसान या कृषि से जुड़ा बताना प्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक संरचना की भी झलक देता है।
बेशक, केवल कृषि भूमि होना किसी को किसान नहीं बनाता और न ही खेती से जुड़ा होना किसी मुख्यमंत्री की प्रशासनिक क्षमता का पैमाना है। सरकार चलाने के लिए नीति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक समझ की जरूरत होती है, लेकिन जब धान के कटोरे की राजनीति की बात होती है, तब यह तथ्य जरूर दिलचस्प हो जाता है कि राज्य की कमान संभालने वाले चार मुख्यमंत्रियों में दो के चुनावी दस्तावेजों में खेत और खेती का जिक्र मौजूद है। यानी छत्तीसगढ़ की राजनीति को समझने के लिए सिर्फ मंत्रालय और विधानसभा तक देखना काफी नहीं। कई बार इसकी असली कहानी खेत की मेड़ से शुरू होती है और सत्ता के गलियारों तक पहुंचती है।
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