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छत्तीसगढ़ के मुकंदर ने किया कमाल… धान छोड़ डेढ़ एकड़ में अदरक की खेती के साथ मेड़ों पर बोई अरहर

newz@gmail.com | Oct 16, 2026, 21:30 IST

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के किसान मुकंदर सिंह ने धान की जगह करीब डेढ़ एकड़ में अदरक लगाया है। उन्होंने खेतों की मेड़ों पर अरहर भी बोई है। कृषि विभाग की सलाह और बीजों से उन्हें इस प्रयोग में मदद मिली। किसान को दोनों फसलों से अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद है। कृषक उन्नति योजना के तहत वैकल्पिक फसलों पर प्रति एकड़ 15 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि की जानकारी भी उन्हें मिली।

अदरक अरहर

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में एक किसान ने खेती का नया प्रयोग किया है। दरिमा गांव के मुकंदर सिंह ने पारंपरिक धान की जगह अदरक लगाया। उन्होंने खेतों की मेड़ों पर अरहर की फसल भी बोई। इस तरह उन्होंने अपनी जमीन का बेहतर इस्तेमाल करने की कोशिश की है।

मुकंदर सिंह लंबे समय से धान की खेती करते आ रहे थे। इस साल खरीफ की बुवाई से पहले उन्होंने विकल्प तलाशना शुरू किया। इसी दौरान वे दरिमा समिति पहुंचे। वहां कृषि विभाग के अधिकारियों ने उन्हें फसल विविधीकरण के फायदे बताए।

अधिकारियों ने उन्हें धान के अलावा दूसरी फसलें उगाने की जानकारी दी। इसमें अरहर, तिलहन और अन्य वैकल्पिक फसलें शामिल थीं। उन्हें कृषक उन्नति योजना के तहत मिलने वाली प्रोत्साहन राशि के बारे में भी बताया गया। इस जानकारी से उन्हें खेती में बदलाव करने का भरोसा मिला।

इसके बाद मुकंदर सिंह ने अपनी जमीन पर नया प्रयोग करने का फैसला लिया। उन्होंने करीब डेढ़ एकड़ क्षेत्र में अदरक की खेती शुरू की। साथ ही खेतों की मेड़ों पर अरहर के बीज बो दिए। इससे मुख्य फसल के साथ दूसरी फसल लेने की संभावना बनी।

मेड़ों पर अरहर उगाने का तरीका

मुकंदर सिंह के खेती मॉडल में अदरक मुख्य फसल है। इसके साथ खेतों की मेड़ों पर अरहर लगाई गई है। इस काम में कृषि विभाग से मिले बीजों ने उनकी मदद की। किसान ने उपलब्ध जमीन के अलग-अलग हिस्सों का उपयोग करने की कोशिश की।

खेतों की मेड़ें अक्सर खेत की सीमा बनाने और पानी के बहाव को संभालने में मदद करती हैं। इनका उपयोग फसल उत्पादन के लिए भी किया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए खेत की स्थिति, मिट्टी और पानी की उपलब्धता देखना जरूरी है। हर खेत में एक जैसी फसल व्यवस्था सफल हो, यह जरूरी नहीं है।

इस मामले में मुकंदर सिंह ने अदरक और अरहर को साथ उगाने का फैसला किया। उनका कहना है कि दोनों फसलों की बढ़वार अच्छी चल रही है। खेत में फसल की स्थिति देखकर वे उत्साहित हैं। उन्हें उम्मीद है कि दोनों फसलें उनकी आमदनी बढ़ाने में मदद करेंगी।

पहले इसी जमीन पर धान की खेती होती थी। इस बार उन्होंने मुख्य फसल बदलकर अदरक को चुना। मेड़ों पर अरहर लगाकर उन्होंने अतिरिक्त उपज की संभावना भी बनाई। इससे उनका प्रयोग फसल विविधीकरण का उदाहरण बन गया है।

अदरक के साथ अतिरिक्त कमाई

किसान को उम्मीद है कि अदरक की अच्छी पैदावार मिलेगी। इसके साथ अरहर से भी अतिरिक्त उपज प्राप्त हो सकती है। इससे परिवार को कमाई का एक और साधन मिल सकता है। हालांकि, अभी दोनों फसलों की अंतिम उपज और वास्तविक मुनाफे के आंकड़े सामने नहीं आए हैं।

अदरक और अरहर की खेती से होने वाली कमाई कई बातों पर निर्भर करेगी। इसमें उत्पादन, खेती की लागत और बाजार में मिलने वाला भाव शामिल है। बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी पर होने वाला खर्च भी अहम रहेगा। इसलिए केवल फसल अच्छी दिखने से अंतिम मुनाफे का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

किसान के प्रयोग का एक अहम पहलू खेत की मेड़ों का उपयोग है। इससे मुख्य फसल के अलावा दूसरी उपज लेने का अवसर मिलता है। लेकिन किसानों को अपनी जमीन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेना चाहिए। जरूरत पड़ने पर कृषि विभाग से सलाह लेना भी उपयोगी रहेगा।

मुकंदर सिंह का कहना है कि दोनों फसलें फिलहाल अच्छी स्थिति में हैं। उन्हें उम्मीद है कि यह प्रयोग उनके परिवार की आमदनी बढ़ाएगा। इस अनुभव से वे आगे भी फसल विविधीकरण अपनाने के लिए प्रेरित हुए हैं।

योजना से मिली खेती की प्रेरणा

मुकंदर सिंह को खेती बदलने के फैसले में सरकारी योजना की जानकारी से मदद मिली। दरिमा समिति में कृषि विभाग के अधिकारियों ने उन्हें वैकल्पिक फसलों के बारे में बताया था। अधिकारियों ने कृषक उन्नति योजना के तहत प्रोत्साहन राशि का भी जिक्र किया।

किसान के अनुसार, धान की जगह निर्धारित वैकल्पिक फसल लगाने पर प्रति एकड़ 15 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि मिलने की जानकारी दी गई थी। यह राशि योजना की पात्रता और तय नियमों के अनुसार मिलती है। इसलिए इसे हर किसान के लिए बिना शर्त मिलने वाला लाभ नहीं समझना चाहिए।

मुकंदर सिंह ने बताया कि नई फसल अपनाते समय किसानों को कई चिंताएं रहती हैं। उन्हें उत्पादन, बाजार और संभावित नुकसान का डर भी होता है। ऐसी स्थिति में सही जानकारी और कृषि विभाग का मार्गदर्शन मददगार हो सकता है। प्रोत्साहन योजनाओं की जानकारी भी किसानों को नए विकल्पों पर विचार करने के लिए प्रेरित कर सकती है।

किसान ने कृषि विभाग से मिले सहयोग के लिए आभार जताया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति भी आभार व्यक्त किया। उनके मुताबिक, सरकारी योजनाओं की जानकारी ने उन्हें खेती में नया प्रयोग करने का हौसला दिया।

फसल विविधीकरण क्यों जरूरी है?

फसल विविधीकरण का मतलब है एक ही फसल पर निर्भरता कम करना। किसान अपनी जमीन और संसाधनों के अनुसार दूसरी फसलें भी अपना सकते हैं। इससे आमदनी के अतिरिक्त स्रोत बनाने की संभावना रहती है। हालांकि, फसल चुनने से पहले लागत और बाजार की जानकारी लेना जरूरी है।

छत्तीसगढ़ में धान प्रमुख फसलों में शामिल है। लेकिन किसानों को दूसरी फसलों के विकल्पों से भी परिचित कराया जा रहा है। दलहन, तिलहन और अन्य फसलें स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयोगी हो सकती हैं। इनका चयन मिट्टी, पानी, मौसम और बाजार की मांग देखकर करना चाहिए।

मुकंदर सिंह का प्रयोग इसी दिशा में एक उदाहरण है। उन्होंने धान की जगह अदरक लगाया और मेड़ों पर अरहर बोई। इस तरीके से उन्होंने जमीन के उपयोग के साथ अतिरिक्त उत्पादन की संभावना बनाई। अभी उनकी फसल अच्छी स्थिति में है, लेकिन अंतिम नतीजे उपज और बिक्री के बाद ही स्पष्ट होंगे।

यह उदाहरण दूसरे किसानों को नई फसलों के बारे में जानकारी लेने के लिए प्रेरित कर सकता है। हालांकि, किसी भी तरीके को अपनाने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। इससे किसान अपने खेत के अनुसार सही फैसला कर सकते हैं।

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