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खेत बचाओ अभियान: छत्तीसगढ़ के किसानों को कृषि वैज्ञानिकों ने बताए फसल सुरक्षा के उपाय

newz@gmail.com | Oct 24, 2026, 13:19 IST

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के बगौद गांव में खेत बचाओ अभियान शुरू हुआ। वैज्ञानिकों ने किसानों को कीट-रोग नियंत्रण, फसल विविधीकरण, फसल चक्र और संतुलित पोषण के उपाय बताए।

खेत बचाओ

बेमेतरा में अभियान की शुरुआत

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में किसानों के लिए खेत बचाओ अभियान शुरू हुआ। इसकी शुरुआत ग्राम बगौद में हुई। अभियान में फसलों की सुरक्षा और टिकाऊ खेती पर ध्यान दिया गया।

यह पहल भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research) के संस्थान ने शुरू की। संस्थान का पूरा नाम राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान है। इसे आईसीएआर-एनआईबीएसएम (ICAR-National Institute of Biotic Stress Management) कहा जाता है। रायपुर स्थित संस्थान ने कृषि विज्ञान केंद्र बेमेतरा के साथ मिलकर कार्यक्रम आयोजित किया।

अभियान का मुख्य उद्देश्य किसानों को फसल नुकसान के कारणों से जागरूक करना है। इसमें कीट, रोग और अन्य जैविक तनाव शामिल हैं। वैज्ञानिक खेती के तरीकों को खेतों तक पहुंचाना भी इसका लक्ष्य है। इसके साथ फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की योजना है।

वैज्ञानिकों ने किसानों से की चर्चा

कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों और संस्थान के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। अभियान के नोडल अधिकारी डॉ. पंकज शर्मा भी उपस्थित रहे। डॉ. एसके जैन और डॉ. केसी शर्मा ने भी भाग लिया। कृषि विज्ञान केंद्र बेमेतरा के डॉ. लव कुमार भी कार्यक्रम में शामिल हुए।

वैज्ञानिकों ने किसानों से सीधे बातचीत की। उन्होंने खेती से जुड़ी समस्याओं को समझने की कोशिश की। इसके बाद फसलों को सुरक्षित रखने के व्यावहारिक तरीके बताए। किसानों को वैज्ञानिक सलाह के आधार पर फैसले लेने के लिए प्रेरित किया गया।

ऐसे कार्यक्रमों में स्थानीय समस्याओं पर चर्चा महत्वपूर्ण होती है। हर क्षेत्र की मिट्टी, मौसम और फसल संबंधी जरूरतें अलग हो सकती हैं। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सलाह उपयोगी रहती है। अभियान में इसी तरह की जानकारी पर जोर दिया गया।

फसल विविधीकरण क्यों जरूरी है

डॉ. पंकज शर्मा ने फसल विविधीकरण अपनाने की सलाह दी। उन्होंने उपयुक्त वैकल्पिक फसलों को शामिल करने पर जोर दिया। किसानों को फसल चक्र अपनाने के लिए भी प्रेरित किया गया। कीटों और रोगों की समय पर पहचान जरूरी बताई गई।

फसल विविधीकरण का अर्थ खेतों में अलग-अलग फसलें अपनाना है। इससे किसान किसी एक फसल पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहते। किसी फसल में नुकसान होने पर दूसरी फसल मदद कर सकती है। हालांकि, सही विकल्प चुनना स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

फसल चक्र में अलग-अलग मौसमों में फसलें बदली जाती हैं। इससे खेती की योजना अधिक संतुलित बन सकती है। उपयुक्त फसल चुनने से उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव है। वैज्ञानिक सलाह से किसानों को विकल्प समझने में मदद मिलती है।

डॉ. पंकज शर्मा के अनुसार, विविधीकृत खेती जोखिम घटाने में मदद कर सकती है। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग भी संभव है। किसानों की आय बढ़ाने में भी ऐसी व्यवस्था सहायक हो सकती है। हालांकि, वास्तविक लाभ फसल, लागत और बाजार पर निर्भर करेगा।

कीट और रोग समय पर पहचानें

फसलों में कीट और रोग नुकसान की बड़ी वजह बन सकते हैं। शुरुआती लक्षण पहचानने से उचित कदम उठाना आसान होता है। इसलिए वैज्ञानिकों ने समय पर पहचान पर जोर दिया। किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने की सलाह दी गई।

डॉ. केसी शर्मा ने समन्वित कीट प्रबंधन अपनाने की बात कही। इसे आईपीएम (Integrated Pest Management) कहा जाता है। इस तरीके में कीट नियंत्रण के लिए कई उपायों का समन्वय किया जाता है। इसका उद्देश्य फसल की सुरक्षा के साथ अनावश्यक रासायनिक उपयोग घटाना है।

वैज्ञानिकों ने रासायनिक कीटनाशकों और रोगनाशकों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल पर भी जोर दिया। किसानों को बिना सही जानकारी के दवाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए। फसल और समस्या के अनुसार उपाय चुनना जरूरी है। जरूरत पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

संतुलित पोषण पर भी जोर

फसल की अच्छी बढ़वार के लिए संतुलित पोषण जरूरी है। खाद और उर्वरकों का उपयोग फसल की जरूरत के अनुसार होना चाहिए। बहुत कम या जरूरत से ज्यादा पोषण नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए वैज्ञानिक सलाह के आधार पर खाद का चुनाव उपयोगी है।

अभियान में पर्यावरण के अनुकूल फसल सुरक्षा उपाय अपनाने की प्रेरणा दी गई। इससे खेती में वैज्ञानिक तरीकों की भूमिका मजबूत हो सकती है। सही प्रबंधन से उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव है। किसानों को स्थानीय कृषि सलाह का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

मिट्टी की सेहत को बनाए रखना भी टिकाऊ खेती का अहम हिस्सा है। खेत की स्थिति और फसल की जरूरत समझकर प्रबंधन करना चाहिए। इससे खेती के फैसले अधिक जानकारीपूर्ण बन सकते हैं। मृदा स्वास्थ्य पर ध्यान देने से लंबे समय की खेती को सहारा मिलता है।

स्थानीय जरूरतों के अनुसार खेती

कृषि विज्ञान केंद्र बेमेतरा के डॉ. लव कुमार ने स्थानीय परिस्थितियों पर बात की। उन्होंने फसल विविधीकरण और फसल प्रबंधन का महत्व समझाया। मृदा स्वास्थ्य बचाने और वैज्ञानिक सलाह अपनाने पर भी जोर दिया। किसानों को उपलब्ध तकनीकों का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया गया।

स्थानीय कृषि परिस्थितियों को समझना खेती के फैसलों में मदद करता है। मिट्टी, पानी और मौसम के अनुसार फसल चुनना महत्वपूर्ण है। किसानों को किसी नई तकनीक को अपनाने से पहले उसकी उपयुक्तता समझनी चाहिए। जरूरत के अनुसार कृषि विज्ञान केंद्र से मार्गदर्शन लिया जा सकता है।

इस अभियान में फसल उत्पादन और लाभप्रदता बढ़ाने की दिशा पर भी ध्यान दिया गया। वैज्ञानिक जानकारी किसानों को बेहतर विकल्प चुनने में मदद कर सकती है। लेकिन हर तकनीक का परिणाम खेत की स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए सलाह को स्थानीय जरूरतों के अनुसार अपनाना जरूरी है।

किसानों को क्या ध्यान रखना चाहिए

किसानों को फसलों की नियमित निगरानी करनी चाहिए। पत्तियों, तनों और पौधों में बदलाव दिखने पर कारण समझना जरूरी है। केवल लक्षण देखकर तुरंत रसायन का इस्तेमाल करना सही तरीका नहीं है। पहले समस्या की पहचान करें और फिर उचित सलाह लें।

कीटनाशक या रोगनाशक चुनते समय फसल और समस्या का ध्यान रखें। उत्पाद के लेबल पर दिए निर्देशों का पालन करना चाहिए। मात्रा और उपयोग की विधि को लेकर अनुमान नहीं लगाना चाहिए। जरूरत होने पर कृषि विशेषज्ञ से जानकारी लेनी चाहिए।

फसल विविधीकरण अपनाते समय बाजार और स्थानीय संसाधनों को भी समझें। वैकल्पिक फसल चुनने से पहले उसकी खेती की जानकारी जुटाएं। फसल चक्र की योजना बनाते समय मौसम और मिट्टी पर ध्यान दें। इससे खेती संबंधी जोखिमों को बेहतर ढंग से संभालने में मदद मिल सकती है।

खेत बचाओ अभियान का संदेश यही है कि फसल सुरक्षा केवल दवाओं तक सीमित नहीं है। इसमें सही पहचान, संतुलित पोषण और बेहतर फसल प्रबंधन भी शामिल हैं। वैज्ञानिक सलाह और स्थानीय अनुभव को साथ लेकर चलना उपयोगी हो सकता है। इससे टिकाऊ खेती की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं।

अभियान का व्यापक उद्देश्य

खेत बचाओ अभियान का उद्देश्य वैज्ञानिक खेती की जानकारी किसानों तक पहुंचाना है। बेमेतरा में आयोजित कार्यक्रम इसी दिशा में एक प्रयास है। इसमें फसलों को जैविक तनावों से सुरक्षित रखने पर जोर दिया गया। साथ ही टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने की बात कही गई।

अभियान के दौरान किसानों और वैज्ञानिकों के बीच संवाद हुआ। ऐसे संवाद से खेती की व्यावहारिक समस्याएं सामने आ सकती हैं। वैज्ञानिक सलाह स्थानीय जरूरतों तक पहुंचे, तो किसानों को निर्णय लेने में मदद मिल सकती है। इस पहल में फसल सुरक्षा, विविधीकरण और मृदा स्वास्थ्य को साथ रखा गया है।

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