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धान के कटोरे में विज्ञान की नई फसल, छत्तीसगढ़ के चावल को मिल रही नई पहचान

newz@gmail.com | Sep 7, 2026, 19:48 IST

छत्तीसगढ़ में धान की 40 से अधिक किस्में विकसित हुई हैं। अब पारंपरिक धान को नई तकनीक से बेहतर बनाया जा रहा है। वैज्ञानिक कम अवधि, ज्यादा उपज और मजबूत पौधों पर काम कर रहे हैं।

धान की किस्में

छत्तीसगढ़ को यूं ही धान का कटोरा नहीं कहा जाता। यहां धान सिर्फ खेत की फसल नहीं, बल्कि स्वाद, खुशबू और परंपरा की पहचान भी है। अब इसी पहचान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय धान की नई कहानी लिख रहा है। विश्वविद्यालय अब तक धान की 40 से ज्यादा किस्में विकसित कर चुका है। इनमें ज्यादा उत्पादन वाली, सुगंधित, सूखा सहनशील, पोषण से भरपूर और हाईब्रिड किस्में शामिल हैं।

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के कहना है कि अब छत्तीसगढ़ की पारंपरिक धान किस्मों के गुणों को बचाकर उन्हें ज्यादा उपज, कम अवधि और मौसम की मार सहने लायक बनाने की कोशिश चल रही है। इसके लिए विश्वविद्यालय ने भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ट्रॉम्बे के साथ मिलकर म्यूटेशन ब्रीडिंग का रास्ता अपनाया है। पिछले करीब दस वर्षों से चल रहे इस सहयोग में पारंपरिक धान के पौधों में वांछित गुण विकसित करने का काम किया जा रहा है।

ज्यादा उत्पादन पर काम

विश्वविद्यालय की 40 से अधिक विकसित धान किस्मों में 17 हाई यील्डिंग, 11 सुगंधित, तीन सूखा सहनशील, पांच बायोफोर्टिफाइड और दो हाईब्रिड किस्में भी शामिल हैं। यानी वैज्ञानिकों ने एक तरफ किसान की सबसे बड़ी जरूरत उत्पादन पर काम किया तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ की पहचान माने जाने वाले सुगंधित और पारंपरिक चावल को भी आधुनिक तकनीक से बेहतर बनाने की कोशिश की।

इस सूची में महामाया, पूर्णिमा, दंतेश्वरी, बमलेश्वरी, समलेश्वरी, कर्मा महसूरी, राजेश्वरी, दुर्गेश्वरी, बस्तर धान-1, विक्रम टीसीआर और सीजी धान-1919 जैसी किस्में शामिल हैं। सुगंधित धान की श्रेणी में विष्णुभोग, बादशाहभोग, तरुणभोग, दुबराज, सीजी देवभोग, जवाफूल और सोनागाठी से जुड़ी उन्नत किस्में शामिल हैं। वहीं सीजी जिंक राइस और प्रोटीजिन जैसी किस्में धान को सिर्फ पेट भरने वाली फसल नहीं, बल्कि पोषण का स्रोत बनाने की दिशा में किए गए प्रयासों को दिखाती हैं।

म्यूटेंट किस्म एक नई कहानी

नई म्यूटेंट किस्मों की कहानी और दिलचस्प है। पांच महीने पहले अप्रैल में विश्वविद्यालय ने भाभा एटॉमिक सेंटर के सहयोग से विकसित छह उन्नत म्यूटेंट किस्मों के मिनी किट किसानों को वितरित किए। इनमें विक्रम ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ राइस (विक्रम टीसीआर), ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ विष्णुभोग म्यूटेंट, ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ सोनागाथी म्यूटेंट, ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ दुबराज म्यूटेंट-1, बौना लुचाई और ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ जवाफूल म्यूटेंट शामिल हैं।

इनका मकसद पुरानी किस्मों को खत्म करना नहीं, बल्कि उनके अच्छे गुणों को बचाकर कमजोरियों को दूर करना है। मसलन पारंपरिक धान की कई किस्में लंबी होने के कारण तेज हवा या बारिश में खेत में गिर जाती हैं। वैज्ञानिक ऐसे पौधों को अपेक्षाकृत छोटा और मजबूत बनाने पर काम कर रहे हैं, ताकि लॉजिंग यानी फसल के गिरने का खतरा कम हो और किसान को नुकसान न हो।

पौधों के आनुवांशिक गुणों में परिवर्तन

वैज्ञानिकों का कहना है कि म्यूटेशन ब्रीडिंग में विकिरण तकनीक का इस्तेमाल कर पौधे के आनुवंशिक गुणों में परिवर्तन कराया जाता है और फिर वैज्ञानिकों द्वारा उपयोगी पौधों का चयन किया जाता है। भाभा एटॉमिक सेंटर के अनुसार ट्रॉम्बे छत्तीसगढ़ विष्णुभोग म्यूटेंट पारंपरिक विष्णुभोग से विकसित एक उन्नत म्यूटेंट है। इसमें सुगंधित छोटे दाने, अपेक्षाकृत बौना पौधा और अच्छी उत्पादन क्षमता जैसे गुण दर्ज किए गए हैं। इसी तरह सोनागाठी म्यूटेंट को भी पारंपरिक सोनागाठी से विकसित किया गया है और इसमें कम अवधि, कम ऊंचाई तथा गिरने के प्रति बेहतर प्रतिरोध जैसे गुण पाए गए हैं।

अब पैदावार पर टिकी नजर

वैज्ञानिकों का कहना है कि अप्रैल में इन छह किस्मों के मिनी किट किसानों को देने का मकसद भी यही है कि प्रयोगशाला और शोध के बाद इनका वास्तविक खेतों में प्रदर्शन देखा जाए। वैज्ञानिकों के मुताबिक ये म्यूटेंट पारंपरिक किस्मों की तुलना में जल्दी पकने, ज्यादा उत्पादन देने, कम ऊंचाई और कीट-व्याधियों के प्रति बेहतर सहनशीलता जैसे गुणों के लिए विकसित किए गए हैं। यानी छत्तीसगढ़ के धान की कहानी अब सिर्फ कितनी पैदावार हुई तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों की नजर अब इस बात पर भी है कि धान कितने दिन में तैयार हो, बारिश-आंधी में कितना टिके, कितना पोषण दे, कितना सुगंधित हो और किसान के लिए कितना फायदे का सौदा साबित हो।

वैज्ञानिकों ने बेहतर काम किया

विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी संजय कक्कर ने बताया कि धान की नई किस्मों पर लगातार रिसर्च का काम हो रहा है। हम अब तक 40 से अधिक धान और 150 से अधिक अन्य फसलों पर काम करके उन्हें बेहतर और मौसम के अनुकूल बना चुके हैं।

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