किसान की बात,सूत्र के साथ

एमपी की फर्म-समितियां चौथाई बीज भी नहीं बना पा रहीं, खुले बाजार से खरीदने को मजबूर हो रहे किसान

newz@gmail.com | Sep 25, 2026, 13:59 IST

मध्य प्रदेश में किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के दावे किए जा रहे हैं। यह सिलसिला करीब दो दशक से चल रहा है। किसान की कमाई दोगुनी करने के वादे भी कई बार हुए हैं। खेती को लाभ का धंधा बनाने के दावे भी सुनने को मिले हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। कृषि प्रधान मध्य प्रदेश में अब भी सर्टिफाइड बीज की भारी कमी है। किसान सूत्र ने इस संकट की गहराई से पड़ताल की है। यह पड़ताल बताती है कि किसान आखिर कैसे छला जा रहा है।

अमानक बीज

संजय शर्मा@भोपाल. मध्य प्रदेश में 1400 से ज्यादा रजिस्टर्ड बीज उत्पादक समिति और निजी फर्म भी बीज का पर्याप्त उत्पादन नहीं कर पा रही हैं। ऐसी स्थिति में किसान रबी और खरीफ सीजन में खुले बाजार से गैर सर्टिफाइड बीज खरीदने मजबूर हैं। हर साल सैकड़ों किसान ऐसे ही सब स्टैंडर्ड बीज खरीदकर नुकसान का शिकार बन रहे हैं। बीज प्रमाणीकरण के सख्त प्रावधान न होने से किसान अमानक बीज निर्माताओं के चक्रव्यूह में फंस रहे हैं।

कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था और एक करोड़ से ज्यादा किसानों वाले प्रदेश में अमानक बीज निर्माताओं की लूट पर अंकुश नहीं है। इसे समझने के लिए खरीफ और रबी सीजन की बुआई के आंकड़ों को जानना जरूरी है। सबसे पहले बात करते हैं खरीफ सीजन की। खरीफ सीजन के दौरान मध्य प्रदेश में सोयाबीन, उड़द, मूंग, मूंगफली, मक्का, ज्वार जैसी फसलों की बुआई होती है। इनमें सोयाबीन, उड़द सीजन की प्रमुख फसलें हैं।

1400 बीज उत्पादक फर्म और समिति भी लाचार

मध्य प्रदेश में सोयाबीन की बुआई का रकबा करीब 60 लाख हैक्टेयर है। इसके लिए करीब 45 लाख क्विटंल बीज की जरूरत होती है। वहीं, प्रदेश में उड़द की बुआई का रकबा लगभग 8 लाख हैक्टेयर है। जिसमें करीब डेढ़ लाख क्विटंल बीज लगता है। बीज प्रमाणीकरण संस्था के एमडी रेवा सिंह सिसौदिया के अनुसार प्रदेश में 1400 बीज उत्पादक संस्थाएं हैं। इनमें 600 सहकारी समितियां और 800 निजी फर्म हैं।

खरीफ सीजन में निजी फर्म और समितियां करीब 12 लाख क्विंटल सोया बीज का उत्पादन कर पा रही है। जबकि मांग 50 लाख से भी ज्यादा है। उधर रबी सीजन में गेंहू के सर्टिफाइड बीज की डिमांड 40 लाख और चना बीज की मांग 18 लाख क्विटंल तक पहुंच जाती है। सर्टिफाइड बीज की उपलब्धता पर्याप्त न होने से रबी और खरीफ सीजन की बुआई के समय बीज का संकट खड़ा हो जाता है।

बुआई के लिए बीज तक तैयार नहीं कर पा रहे

मध्य प्रदेश में रबी और खरीफ सीजन में प्रमुख फसलों के रकबे और बीज की मांग पर नजर डालते हैं। मध्य प्रदेश सोया स्टेट है और देश में सबसे ज्यादा सोयाबीन उत्पादन का खिताब इसके नाम है। प्रदेश में खरीफ सीजन में करीब 60 लाख हैक्टेयर में सोयाबीन की बुआई होती है। जिसके लिए लगभग 55 लाख क्विटंल बीज की जरूरत होती है। वहीं, उड़द का रकबा 8 लाख हैक्टेयर और बीज की मांग डेढ़ लाख क्विटंल तक है। इसी सीजन में मूंग क रकबा डेढ़ से दो लाख हैक्टेयर रहता है जबकि बीज की डिमांड 30 हजार क्विटंल से कुछ अधिक होती है।

प्रदेश में खेती का दूसरा सीजन रबी का है। इस सीजन की मुख्य फसल गेहूं है। प्रदेश में गेहूं का रकबा 90 लाख हैक्टेयर से भी ज्यादा है। जिसकी बुआई के लिए 40 लाख क्विटंल बीज की जरूरत होती है। वहीं, दलहनी फसल चना का रकबा 23 लाख हैक्टेयर के आसपास रहता है और इसके लिए 16 लाख क्विंटल बीज लगता है। जबकि मसूर की बुआई का रकबा 8 से 10 लाख हैक्टेयर है जिसकी पूर्ति के लिए 3 लाख क्विटंल सर्टिफाइड बीज की आवश्यकता होती है।

मांग ज्यादा, पूर्ति कम इसलिए बीज का संकट

अब बात करते हैं सर्टिफाइड बीज के उत्पादन, पूर्ति के संकट और कमी के कारण होने वाली कालाबाजारी की। मध्य प्रदेश बीज प्रमाणीकरण संस्था के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में रबी और खरीफ सीजन की बुआई के लिए पर्याप्त बीज उत्पादन नहीं हो रहा है। निजी फर्म और सहकारी समितियों की क्षमता ही इतनी नहीं है, जितनी किसानों की मांग है। अकेले सोयाबीन की बात करें तो प्रदेश में मांग के मुकाबले चौथाई बीज भी हम तैयार नहीं कर पा रहे हैं।

मांग और कमी का यह अंतर हर साल बढ़ रहा है, फिर भी कृषि विभाग के जिम्मेदार अधिकारी अनदेखी कर रहे हैं। मांग और आपूर्ति के इसी अंतर का फायदा बीज की कालाबाजारी करने वाले उठा रहे हैं। सीजन आते ही बीज की कृत्रिम किल्लत का हल्ला मचाया जाता है। किसान बुआई की जल्दबाजी में फंस जाते हैं और प्रमाणिकता को नजरअंदाज कर बीज खरीदना उनकी मजबूरी बन जाती है।

बस नाम का काम, जिम्मेदारी किसी की नहीं

किसान सूत्र ने मध्य प्रदेश में हर सीजन में बीज की किल्लत और किसानों से लूट की पड़ताल की है। इसके लिए सर्टिफाइड बीज तैयार करने वाली संस्था, सब स्टैंडर्ड बीजों की पड़ताल करने वाले अधिकारियों से भी बात की। इस पूरी पड़ताल में सामने आया कि मध्य प्रदेश में कृषि विभाग की शाखाएं तो बहुत हैं, लेकिन जिम्मेदारी केवल कागजों तक ही सीमित है। बीज प्रमाणीकरण संस्था की जिम्मेदारी एमडी रेवा सिंह सिसौदिया के पास है। संस्था ने 600 सहकारी बीज उत्पादक समिति और 800 निजी फर्मों को लाइसेंस दिया है, लेकिन पर्याप्त बीज उत्पादन का दायित्व तय नहीं किया।

बीजों की गुणवत्ता जांचने का जिम्मा बीज प्रमाणीकरण इकाई के पास है। इसकी निगरानी कृषि विभाग का संचालनालय करता है। प्रदेश में 10 बीज परीक्षण प्रयोगशाला हैं। वहीं, फील्ड में तैनात बीज निरीक्षक केवल सैंपलिंग कर उन्हें प्रयोगशाला भेजने का अधिकार रखते हैं। इसके अलावा दुकानदार, फर्म या समिति को नोटिस देकर कार्रवाई करने की प्रक्रिया इतनी लंबी है कि इससे पहले ही अमानक बीज बाजार में खप चुका होता है। डेढ़ महीने पहले तक बीज निरीक्षण का दायित्व संयुक्त संचालक जितेन्द्र सिंह परिहार संभाल रहे थे। सीजन में हुई सैंपलिंग के नतीजे और कार्रवाई से पहले ही उनकी बदली हो गई।

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