मध्य प्रदेश के पांच जिलों ने खेती के मोर्चे पर राष्ट्रीय पहचान बनाई है। धन धान्य कृषि योजना में इन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना गया है। ये जिले टीकमगढ़, उमरिया, सीधी, शहडोल और डिंडोरी हैं। योजना की पहली वर्षगांठ पर दिल्ली में कार्यक्रम हुआ। यहीं इन जिलों का नाम सामने आया। टीकमगढ़ की ओर से कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय ने सम्मान लिया।
कौन से हैं ये पांच जिले
चयनित जिलों के नाम साफ हैं। इनमें टीकमगढ़, उमरिया, सीधी, शहडोल और डिंडोरी शामिल हैं। पांचों जिलों को राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना गया।
ये जिले प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में आते हैं। टीकमगढ़ बुंदेलखंड में है। सीधी, शहडोल और उमरिया बघेलखंड अंचल में हैं। डिंडोरी प्रदेश के पूर्वी हिस्से में पड़ता है। यानी पुरस्कार किसी एक इलाके तक सीमित नहीं रहा। प्रदेश के कई अंचलों में काम की पहचान हुई है।
किस आधार पर हुआ चयन
चयन का आधार केपीआई (Key Performance Indicators) रहा। हिंदी में इन्हें प्रमुख प्रदर्शन संकेतक कहते हैं। भारत सरकार ने ये संकेतक हर महीने के लिए तय किए थे।
पांचों जिलों ने इन संकेतकों पर उल्लेखनीय प्रगति दिखाई। इसी प्रगति के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना गया। योजना के तहत जिलों की प्रगति पर महीने दर महीने नजर रखी जाती है। इसके लिए एक डैशबोर्ड बना है। उसमें कुल 117 संकेतकों पर काम की निगरानी होती है।
धन धान्य कृषि योजना क्या है
केंद्रीय कैबिनेट ने इस योजना को जुलाई 2025 में मंजूरी दी थी। यह योजना देश के 100 जिलों के लिए है। इसकी अवधि छह साल है। यह साल 2025-26 से शुरू हुई है।
योजना का मकसद खेती की उत्पादकता बढ़ाना है। फसल विविधीकरण और टिकाऊ खेती पर भी जोर है। पंचायत और ब्लॉक स्तर पर फसल कटाई के बाद भंडारण बढ़ाने की बात है। सिंचाई सुधारना भी इसका हिस्सा है। किसानों को कर्ज आसानी से मिले, यह भी लक्ष्य है।
योजना में 36 मौजूदा योजनाओं को जोड़ा गया है। ये योजनाएं 11 विभागों की हैं। राज्य की योजनाएं और निजी क्षेत्र की भागीदारी भी इसमें जुड़ती है।
जिले कैसे चुने जाते हैं
योजना में कमजोर प्रदर्शन वाले कृषि जिलों पर खास ध्यान है। जिलों की पहचान तीन पैमानों पर होती है। पहला पैमाना कम उत्पादकता है। दूसरा पैमाना कम फसल सघनता है। तीसरा पैमाना कम कर्ज वितरण है। हर राज्य को जिले उसके खेती योग्य क्षेत्र के आधार पर मिलते हैं। हर राज्य को कम से कम एक जिला मिलता है।
टीकमगढ़ ने क्या कर दिखाया
पांचों जिलों में टीकमगढ़ के काम का ब्योरा सामने आया है। इसे खासकर फसल कटाई के बाद भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए सम्मान मिला। यह काम एकीकृत कृषि विकास के तहत हुआ।
जिले में गेहूं उत्पादन 2023-24 में 6.12 लाख मीट्रिक टन था। साल 2025-26 में यह 6.92 लाख मीट्रिक टन हो गया। गेहूं का रकबा 2.08 लाख से बढ़कर 2.22 लाख हेक्टेयर से ज्यादा हुआ।
खरीफ में 2,30,810 हेक्टेयर में बुवाई हुई। यह लक्ष्य से थोड़ी ज्यादा रही। उड़द का रकबा 16.68 फीसदी बढ़ा। जल संरक्षण में भी लक्ष्य पूरा हुआ। जिले में 134 नई जल संरचनाएं बनीं। वाटरशेड के काम 7,392 हेक्टेयर में हुए। प्राकृतिक खेती से 5,225 किसान जुड़े हैं। यह खेती 2,090 हेक्टेयर में होती है। जैविक खेती से 1,983 किसान जुड़े हैं।
जिले की सभी 64 प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों का कंप्यूटरीकरण हो चुका है। 1,200 से ज्यादा महिलाएं महिला किसान उत्पादक कंपनियों से जुड़ी हैं।
टीकमगढ़ का प्रतिनिधिमंडल
टीकमगढ़ से पांच लोग दिल्ली के कार्यक्रम में पहुंचे। इनमें कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय शामिल थे। नोडल अधिकारी और डिप्टी कलेक्टर अंजलि शर्मा भी साथ थीं। कृषि वैज्ञानिक डॉ. बी.एस. किरार और उप संचालक कृषि मनोज कश्यप भी पहुंचे। प्रगतिशील किसान बालचंद्र अहिरवार भी दल में थे।
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