केंद्र सरकार ने नया पशुधन बीमा पोर्टल लॉन्च किया है। पशुपालन और डेयरी विभाग ने यह डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किया है। यह विभाग मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत काम करता है।
केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने पोर्टल लॉन्च किया। कार्यक्रम में राज्य मंत्री एसपी सिंह बघेल, विभाग के सचिव नरेश पाल गंगवार भी शामिल हुए। राज्य सरकारों और बीमा कंपनियों के प्रतिनिधि भी पहुंचे। कार्यक्रम में 4,000 से ज्यादा लोग ऑनलाइन जुड़े।
13 भाषाओं में मिलेगी सुविधा
पशुधन बीमा पोर्टल को बहुभाषी बनाया गया है। इसमें हिंदी और अंग्रेजी के साथ 11 क्षेत्रीय भाषाएं हैं। इससे ग्रामीण पशुपालकों को जानकारी समझने में मदद मिलेगी। भाषा की परेशानी कम होने से पहुंच बढ़ सकती है।
पोर्टल का मकसद बीमा सेवाओं को ज्यादा आसान बनाना है। किसान बीमा प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी डिजिटल तरीके से देख सकेंगे। बीमा कंपनियां भी डिजिटल सिस्टम से जुड़ेंगी। राज्य सरकारों और विभागों के बीच समन्वय भी बेहतर होगा।
बीमा प्रक्रिया होगी डिजिटल
नए पोर्टल पर पॉलिसी जारी करने की सुविधा होगी। प्रीमियम प्रबंधन भी डिजिटल सिस्टम से किया जाएगा। दावे की प्रक्रिया भी इसी प्लेटफॉर्म से जुड़ी होगी। लाभार्थी का सत्यापन भी डिजिटल तरीके से होगा। पॉलिसी की निगरानी रियल टाइम में की जा सकेगी।
इस व्यवस्था से कागजी प्रक्रिया कम होने की उम्मीद है। दावे की स्थिति पर निगरानी भी आसान होगी। विभाग को योजनाओं का डेटा एक जगह मिल सकेगा। इससे योजना प्रबंधन में बेहतर जानकारी मिल सकती है।
किस योजना से जुड़ा है पोर्टल
पशुधन बीमा गतिविधि राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM) से जुड़ी है। NLM का पूरा नाम National Livestock Mission है। यह मिशन पशुपालन क्षेत्र से जुड़ी कई गतिविधियों को समर्थन देता है। पशुधन बीमा इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस बीमा व्यवस्था का उद्देश्य पशुओं के नुकसान से सुरक्षा देना है। बीमारी, दुर्घटना और प्राकृतिक आपदा से पशुओं को नुकसान होता है। पशु की मृत्यु से किसान को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। बीमा ऐसी स्थिति में आर्थिक जोखिम घटाने में मदद करता है।
किसान कितना प्रीमियम देंगे
मौजूदा व्यवस्था में किसान की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत है। बाकी 85 प्रतिशत प्रीमियम सरकारें मिलकर देती हैं। अधिकांश राज्यों में केंद्र और राज्य का अनुपात 60:40 है। हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों में अनुपात 90:10 है।
यहां 15 प्रतिशत का मतलब प्रीमियम में किसान हिस्सा है। यह पशु की कुल कीमत का 15 प्रतिशत नहीं है। बीमा कराने से पहले पात्रता और नियम समझना जरूरी है। दावे के लिए संबंधित शर्तें भी पूरी करनी होती हैं।
कितने पशुओं का बीमा होगा
मौजूदा व्यवस्था में 10 कैटल यूनिट तक कवरेज है। यह सीमा एक लाभार्थी परिवार के लिए लागू है। सूअर और खरगोश के लिए सीमा पांच कैटल यूनिट है। एक कैटल यूनिट एक बड़े पशु के बराबर मानी जाती है। दस छोटे पशु भी एक कैटल यूनिट माने जाते हैं।
बीमा में कई तरह के पशु शामिल हैं। इसमें देशी और संकर दूध देने वाले पशु शामिल हैं। घोड़े, गधे और खच्चर जैसे पशु भी शामिल हैं। ऊंट और टट्टू भी इसके दायरे में आते हैं। भेड़, बकरी, सूअर और खरगोश भी शामिल हैं। याक और मिथुन भी बीमा दायरे में रखे गए हैं।
इस साल 30 लाख पशुओं का बीमा
विभाग के सचिव नरेश पाल गंगवार ने जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस साल 30 लाख से ज्यादा पशु बीमित हुए। यह आंकड़ा कार्यक्रम के दौरान साझा किया गया था। इससे योजना के मौजूदा कवरेज का अंदाजा मिलता है।
हालांकि बीमा संख्या बढ़ना अकेला पर्याप्त संकेत नहीं है। दावों के निपटारे की गति भी महत्वपूर्ण रहेगी। किसानों तक जानकारी पहुंचना भी जरूरी होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सहायता की जरूरत बनी रहेगी।
RFID से पहचान आसान होगी
पशुओं की पहचान के लिए RFID तकनीक का प्रावधान है। RFID का पूरा नाम Radio Frequency Identification है। इस तकनीक से पशु की पहचान बेहतर हो सकती है। दावा प्रक्रिया में पहचान संबंधी विवाद कम हो सकते हैं।
सरकार पहले ही RFID टैगिंग को लेकर प्रावधान कर चुकी है। इसका इस्तेमाल बीमित पशुओं की पहचान में किया जा सकता है। डिजिटल रिकॉर्ड से निगरानी भी मजबूत हो सकती है। इससे दावा निपटाने की प्रक्रिया में मदद मिल सकती है।
किसानों के लिए इसका मतलब
पशुपालन करने वाले किसानों के लिए पशु बड़ी संपत्ति हैं। कई ग्रामीण परिवार पशुओं से आय प्राप्त करते हैं। दूध, प्रजनन और अन्य गतिविधियों से कमाई होती है। पशु की मृत्यु से परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।
बीमा ऐसे जोखिम के समय आर्थिक सुरक्षा दे सकता है। नया पोर्टल प्रक्रिया को एक जगह जोड़ता है। किसान, बीमा कंपनी और सरकारी विभाग इससे जुड़ेंगे। इससे अलग-अलग स्तरों पर जानकारी साझा करना आसान होगा।
फिर भी डिजिटल पोर्टल अकेले सभी समस्याएं खत्म नहीं करेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल जानकारी जरूरी रहेगी। दावा जांच में स्थानीय स्तर की भूमिका भी रहेगी। किसानों को बीमा की शर्तें पहले समझनी चाहिए।
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