आप शायद रोज लेज़ चिप्स खाते हों। पर क्या आपको पता है कि उस चिप्स के आलू पर एक कानूनी लड़ाई छिड़ी थी, जो सीधे किसानों के बीज बचाने के अधिकार से जुड़ी है? अगर आप या आपका कोई परिचित खेती करता है, तो यह फैसला आने वाले सालों में असर डाल सकता है। खासकर अब, जब मध्य प्रदेश के किसान भी इस कंपनी से जुड़ रहे हैं।
सोचिए एक किसान अपने ही खेत में बीज बोता है। अगले ही साल उस पर करोड़ों रुपए का मुकदमा हो जाता है। यह कोई कहानी नहीं, गुजरात के नौ किसानों के साथ असल में हुआ था।
समझें क्या है मामला
पेप्सिको ने 2019 में गुजरात के नौ आलू किसानों पर मुकदमा किया था। आरोप था कि किसान कंपनी की खास आलू किस्म बिना इजाजत उगा रहे हैं। कार्यकर्ता कविता कुरुगंटी इस मामले में किसानों के पक्ष में खड़ी हुईं। सात साल तक यह लड़ाई अलग अलग अदालतों में चली। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुना दिया है।
पहले क्या था
पेप्सिको भारत में 1989 से है और 2001 से आलू की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करती है। इसकी एक खास किस्म है, FL 2027, जिसे बाजार में FC5 कहा जाता है। यह किस्म खासतौर पर लेज़ चिप्स के लिए बनी है, क्योंकि इसमें नमी कम और चिपचिपाहट सही मात्रा में होती है। भारत का कानून, पौध किस्म एवं किसान अधिकार संरक्षण अधिनियम 2001, थोड़ा अलग है। यह कंपनी के अधिकार के साथ साथ किसान के अधिकार को भी बराबर जगह देता है। धारा 39 के तहत किसान अपने खेत का बीज बचा सकता है। बीज का खुद इस्तेमाल कर सकता है और बांट भी सकता है। बस ब्रांडेड बीज बेचना मना है।
तो किसानों और पेप्सिको विवाद कैसे शुरू हुआ
पेप्सिको ने 2016 में आलू के FL 2027 बीज का पंजीकरण करा लिया था। फिर 2019 में कंपनी ने गुजरात के नौ किसानों पर मुकदमा ठोक दिया। हर किसान से एक करोड़ रुपए से ज्यादा हर्जाना मांगा गया। यह खबर फैलते ही देशभर में विरोध शुरू हो गया। किसान संगठन सड़कों पर उतरे।
10 मई 2019 को पेप्सिको ने अचानक सभी नौ मुकदमे बिना शर्त वापस ले लिए, लेकिन कार्यकर्ता कविता कुरुगंटी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने जून 2019 में पेप्सिको का पंजीकरण ही रद्द कराने के लिए आवेदन दे दिया। दलील थी कि किसानों पर मुकदमा करना जनहित के खिलाफ है।
दिसंबर 2021 में अथॉरिटी ने पंजीकरण रद्द कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने जुलाई 2023 में इस रद्दीकरण को सही ठहराया। पर पेप्सिको भी हार मानने को तैयार नहीं थी।
जनवरी 2024 में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पंजीकरण बहाल कर दिया। कुरुगंटी सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। सवाल यह उठता है, क्या सिर्फ मुकदमा करना ही जनहित के खिलाफ माना जा सकता है? अदालत का जवाब न में था।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि सिर्फ किसानों पर मुकदमा दायर करने से पंजीकरण रद्द नहीं हो सकता। लेकिन कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर पेप्सिको किसी किसान पर फिर मुकदमा करे, तो वह किसान धारा 39 के तहत अपना बचाव कर सकता है।
कौन- कौन शामिल हैं
इस लड़ाई में तीन मुख्य पक्ष रहे। पेप्सिको इंडिया, जिसने अपनी पंजीकृत किस्म की सुरक्षा का दावा किया। कविता कुरुगंटी और उनका संगठन ASHA, जिन्होंने किसानों की तरफ से लड़ाई लड़ी। और गुजरात के वो नौ किसान, जो शुरुआत में इस कानूनी उलझन का नाम तक नहीं जानते थे।
दोनों पक्षों ने रखे अपने तर्क
पेप्सिको का पक्ष यह रहा कि उसने अपनी वैध रूप से पंजीकृत किस्म के अधिकार की रक्षा की और यह कानून के दायरे में था। कोर्ट ने भी माना कि कंपनी को अपने अधिकारों के लिए कानूनी रास्ता अपनाने से रोका नहीं जा सकता।
दूसरी तरफ कुरुगंटी ने फैसले को “गहरी निराशा” बताया है। उनका कहना है कि कोर्ट ने किसान अधिकार को शब्दों में तो माना, लेकिन भावना में नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि सुनवाई के दौरान पेप्सिको के वकील ने किसानों पर मुकदमे की वजह प्रतिस्पर्धी कंपनियों से मुकाबला बताई थी, न कि किसानों से कोई सीधी दुश्मनी।
MP, RJ, CG कनेक्शन
यह मामला अब सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं रहा है। मार्च 2025 से पेप्सिको ने मध्य प्रदेश के आठ जिलों अशोकनगर, गुना, रायसेन, सागर, शिवपुरी, नरसिंहपुर, विदिशा और धार में सीधे आलू खरीद शुरू की है। यानी अब मध्य प्रदेश के किसान भी उसी कंपनी और उसी तरह की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग व्यवस्था से जुड़ रहे हैं, जिस पर यह पूरा विवाद टिका था। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में फिलहाल इस मामले से सीधा जुड़ाव सामने नहीं आया है।
आगे क्या होगा
अब सवाल यह है कि क्या भविष्य में पेप्सिको फिर किसी किसान पर मुकदमा करेगी? अगर करती है, तो उस किसान को धारा 39 के तहत खुद को साबित करना होगा। मध्य प्रदेश के नए कॉन्ट्रैक्ट किसानों के लिए यह फैसला एक सीख की तरह है, कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत करने से पहले शर्तें समझना अब और जरूरी हो गया है।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
यह पूरा विवाद सिर्फ आलू का नहीं, बल्कि भारत के अनोखे कानून का इम्तिहान था। दुनिया के ज्यादातर देशों में जैसे अमेरिका में मोनसैंटो जैसी कंपनियां पेटेंट कानून के तहत किसानों पर मुकदमा करती हैं, जहां किसान अधिकार लगभग नहीं होते। भारत का पीपीवीएफआर कानून इकलौता ऐसा मॉडल है जो कंपनी और किसान दोनों को साथ जगह देने की कोशिश करता है, भले ही यह कोशिश पूरी तरह कामयाब न रही हो।
ये भी पढ़ें…
मोदी सरकार का प्राकृतिक कृषि मिशन, 2030 तक देश के 85 लाख किसानों तक पहुंचेगी प्राकृतिक खेती
कृषि में PhD के लिए ICAR की इंटरनेशनल फेलोशिप, 25 सितंबर अंतिम तारीख, ऐसे करें आवेदन
मध्य प्रदेश में कैटल फीड प्लांट के लिए 489 करोड़ मंजूर, पशु पालकों को होगा फायदा, दूध उत्पादन बढ़ेगा
