खेत में खरपतवार दिखने में छोटे लग सकते हैं। लेकिन इनका असर फसल की पैदावार पर बड़ा होता है। खरपतवार फसल के साथ पानी के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। वे मिट्टी के पोषक तत्व और धूप भी लेते हैं। खेत में जगह के लिए भी दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है।
फसल की शुरुआती अवस्था में यह समस्या ज्यादा गंभीर रहती है। इस दौरान पौधों को पर्याप्त पानी और पोषण चाहिए। खरपतवार तेजी से बढ़कर संसाधनों पर कब्जा कर सकते हैं। इससे फसल की बढ़वार प्रभावित होती है। आगे चलकर उत्पादन में भी कमी आ सकती है।
71 हजार करोड़ रुपए का नुकसान
राष्ट्रीय खरपतवार अनुसंधान संस्थान जबलपुर में स्थित है। संस्थान खरपतवार प्रबंधन पर लंबे समय से शोध कर रहा है। संस्थान के निदेशक डॉ. जे.एस. मिश्रा ने जानकारी दी। उनके अनुसार, स्थिति में पिछले वर्षों में सुधार आया है।
वर्ष 2004 से 2014 के बीच नुकसान करीब 25 प्रतिशत था। इस नुकसान का आर्थिक मूल्य लगभग 71 हजार करोड़ रुपए था। इसके बाद वैज्ञानिक प्रबंधन पर ज्यादा जोर दिया गया। किसानों में खरपतवार नियंत्रण को लेकर जागरूकता बढ़ी।
डॉ. मिश्रा के मुताबिक, 2014 से 2024 में बदलाव आया। इस अवधि में नुकसान करीब 14 प्रतिशत तक पहुंच गया। बेहतर खरपतवार प्रबंधन से नुकसान घटाने में मदद मिली। फसल को पानी और पोषक तत्व भी बेहतर मिले। इससे उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली। किसानों की आय पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ा।
गाजर घास पर जैविक नियंत्रण
खरपतवारों में गाजर घास एक आक्रामक प्रजाति है। इसे पार्थेनियम भी कहा जाता है। यह खेतों के अलावा खाली जमीन पर भी फैलती है। सड़क किनारे भी इसका फैलाव आसानी से देखा जाता है।
जबलपुर संस्थान इसके नियंत्रण पर भी शोध कर रहा है। वैज्ञानिक जैविक नियंत्रण के अलग-अलग उपायों पर काम कर रहे हैं। इसमें ऐसे कीटों और जैविक उपायों का अध्ययन शामिल है। इनका उद्देश्य गाजर घास का फैलाव रोकना है।
जैविक नियंत्रण से रासायनिक उपायों पर निर्भरता घट सकती है। इससे पर्यावरण और कृषि पारिस्थितिकी को भी मदद मिल सकती है। संस्थान जाल खरपतवार समेत अन्य प्रजातियों पर भी शोध करता है।
खरपतवार पर 37 साल से चल रही रिसर्च
जबलपुर का राष्ट्रीय खरपतवार अनुसंधान संस्थान पुराना शोध केंद्र है। संस्थान करीब 37 वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रहा है। इसका काम सिर्फ खरपतवार की पहचान तक सीमित नहीं है।
वैज्ञानिक इनके नुकसान और नियंत्रण के तरीके भी खोजते हैं। संस्थान में मृदा और फसल स्वास्थ्य पर भी अध्ययन होता है। पर्यावरण से जुड़े विषयों पर भी शोध किया जाता है। जेनेटिक इंजीनियरिंग से जुड़े अध्ययन भी यहां होते हैं।
वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित करना चाहते हैं। जिसे किसान अपने खेत में आसानी से अपना सकें। इसलिए शोध को खेतों तक पहुंचाने पर जोर है। इसका मकसद प्रयोगशाला और किसान के बीच दूरी घटाना है।
टेक्नोलॉजी पार्क में प्रयोग
संस्थान ने एक टेक्नोलॉजी पार्क भी विकसित किया है। यहां अलग-अलग फसलों में प्रयोग किए जाते हैं। वैज्ञानिक अलग परिस्थितियों में खरपतवार का असर देखते हैं। वे यह भी जांचते हैं कि कौन सा तरीका ज्यादा प्रभावी है। किस फसल में कौन सा खरपतवार नुकसान करता है। इसके आधार पर नियंत्रण की तकनीक परखी जाती है।
संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पी.के. सिंह ने जानकारी दी। उनके मुताबिक, प्रयोग खेत जैसी परिस्थितियों में किए जाते हैं। तकनीक के परिणाम किसानों के साथ साझा किए जाते हैं। इससे किसानों को व्यावहारिक जानकारी मिलती है।
शुरुआत में नियंत्रण ज्यादा जरूरी
खरपतवार नियंत्रण में समय की भूमिका बहुत अहम है। खेत में खरपतवार फैलने से पहले कदम उठाना जरूरी है। ज्यादा फैलने पर नियंत्रण मुश्किल और महंगा हो सकता है। किसानों को फसल की शुरुआती अवस्था में निगरानी करनी चाहिए। पहले खरपतवार की सही पहचान जरूरी है। उसकी प्रजाति और जीवन चक्र समझना भी जरूरी है। इसके बाद फसल के अनुसार नियंत्रण तरीका चुनना चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण के कई तरीके उपलब्ध हैं। इनमें यांत्रिक और सांस्कृतिक तरीके शामिल हैं। जैविक उपाय भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर रासायनिक उपाय अपनाए जा सकते हैं। खरपतवारनाशी का इस्तेमाल सोच-समझकर करना चाहिए। फसल और खरपतवार की प्रजाति ध्यान में रखनी चाहिए। स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार ही इसका इस्तेमाल करें।
शोध का फायदा किसान तक पहुंचे
जबलपुर संस्थान का लक्ष्य शोध को खेतों तक पहुंचाना है। वैज्ञानिक जानकारी किसानों के लिए उपयोगी बनाना जरूरी है। केवल प्रयोगशाला में तकनीक विकसित करना पर्याप्त नहीं है।
खरपतवार का दबाव घटने से उत्पादन बढ़ सकता है। इससे खेती की लागत नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। किसान की आय पर भी इसका असर पड़ सकता है। इसलिए खेत में उगने वाले खरपतवार को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर पहचान नुकसान कम करने में मदद करती है। वैज्ञानिक प्रबंधन से फसल को बेहतर सुरक्षा मिल सकती है। जबलपुर का शोध इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
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