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बागवानी किसानों की आय बढ़ाएगी आधुनिक तकनीक, खेत तक पहुंचे रिसर्च : ICAR महानिदेशक डॉ. जाट

newz@gmail.com | Oct 7, 2026, 18:20 IST

ICAR महानिदेशक डॉ. एमएल जाट ने पारंपरिक कृषि ज्ञान और विज्ञान के मेल पर जोर दिया। उन्होंने आधुनिक सिंचाई, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मूल्य संवर्धन को बागवानी किसानों की आय बढ़ाने के लिए जरूरी बताया।

डॉ. जाट

भारत का बागवानी क्षेत्र किसानों की आय बढ़ाने की बड़ी क्षमता रखता है। इसकी सफलता केवल ज्यादा उत्पादन पर निर्भर नहीं है। बेहतर किस्में और सही तकनीक भी उतनी ही जरूरी हैं। मजबूत बाजार और प्रोसेसिंग व्यवस्था से किसानों को अधिक लाभ मिल सकता है। ICAR (Indian Council of Agricultural Research) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने यही बात कही। उन्होंने परंपरा और विज्ञान को साथ लाने पर जोर दिया। उनके अनुसार किसानों के पुराने अनुभव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उस ज्ञान को आधुनिक शोध और तकनीक का समर्थन मिलना चाहिए।

बागवानी की असली ताकत

भारत में अलग-अलग जलवायु और भौगोलिक क्षेत्र मौजूद हैं। इसी विविधता ने भारतीय बागवानी को विशेष पहचान दी है। कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के सेब और अखरोट प्रसिद्ध हैं। उत्तर प्रदेश अपने आम उत्पादन के लिए जाना जाता है।

महाराष्ट्र के संतरे और बिहार की लीची अलग पहचान रखते हैं। दक्षिण भारत में नारियल और मसालों का बड़ा उत्पादन होता है। हर क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु अलग होती है। इसलिए सभी क्षेत्रों में एक जैसी तकनीक कारगर नहीं रहती। डॉ. जाट ने स्थानीय जरूरतों के अनुसार समाधान बनाने पर जोर दिया। इससे किसानों को सही तकनीक चुनने में मदद मिल सकती है।

ज्ञान और विज्ञान का मेल

भारतीय किसानों के पास खेती का सदियों पुराना अनुभव है। वे स्थानीय मिट्टी और मौसम को अच्छी तरह समझते हैं। किसानों को पेड़-पौधों के व्यवहार की व्यावहारिक जानकारी भी होती है। यह ज्ञान कई पीढ़ियों से आगे बढ़ता आया है।

अब मौसम और जलवायु तेजी से बदल रहे हैं। इसलिए पारंपरिक अनुभव को वैज्ञानिक प्रमाणों से जोड़ना जरूरी है। आधुनिक अनुसंधान मौसम के नए खतरों को समझने में मदद करता है। किसान का अनुभव स्थानीय समस्याओं का व्यावहारिक समाधान देता है। दोनों व्यवस्थाएं मिलकर बेहतर खेती का रास्ता बना सकती हैं। इससे लागत और जोखिम कम करने में सहायता मिलेगी।

लैब से खेत तक तकनीक

डॉ. जाट ने कृषि अनुसंधान के व्यावहारिक इस्तेमाल पर जोर दिया। उनके अनुसार शोध किसानों के खेतों तक पहुंचना चाहिए। प्रयोगशाला में विकसित तकनीक तभी उपयोगी मानी जाएगी। उसका फायदा किसान को खेत और बाजार में मिलना चाहिए। नई तकनीक से पैदावार बढ़ाने की संभावनाएं बन सकती हैं। इससे खेती की लागत घटाने में भी मदद मिल सकती है।

ICAR के संस्थान नई बागवानी किस्में विकसित कर रहे हैं। वैज्ञानिक बेहतर पौध सामग्री पर भी काम कर रहे हैं। इन प्रयासों का लक्ष्य मौसम सहन करने वाली किस्में विकसित करना है। ऐसी किस्में किसानों का उत्पादन जोखिम कम कर सकती हैं।

आधुनिक सिंचाई से बचत

बागवानी फसलों में सही समय पर पानी देना जरूरी होता है। अधिक पानी से फसल और मिट्टी दोनों प्रभावित हो सकते हैं। पानी की कमी से फल और सब्जियों की गुणवत्ता घट सकती है। आधुनिक सिंचाई तकनीक इस समस्या का समाधान दे सकती है।

ड्रिप सिंचाई जड़ों तक सीमित मात्रा में पानी पहुंचाती है। इससे पानी की बर्बादी रोकने में सहायता मिलती है। डिजिटल कृषि सेवाएं भी किसानों के लिए उपयोगी हो सकती हैं। इनसे मौसम और सिंचाई संबंधी सलाह समय पर मिलती है। स्थानीय मौसम के अनुसार बागवानी पद्धतियां अपनाना भी जरूरी है। इससे उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होता है।

कटाई बाद नुकसान रोकें

फल और सब्जियां जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पाद हैं। गलत भंडारण से किसानों को बड़ा नुकसान हो सकता है। कटाई बाद प्रबंधन (Post-Harvest Management) से यह नुकसान घटाया जा सकता है। इसमें तुड़ाई से बाजार तक की पूरी व्यवस्था आती है। सही तापमान और भंडारण से उत्पाद अधिक समय सुरक्षित रहता है। परिवहन की बेहतर व्यवस्था भी खराबी रोक सकती है।

फलों और सब्जियों की सावधानी से छंटाई होनी चाहिए। खराब उत्पाद अलग करने से अच्छी उपज की गुणवत्ता बनी रहती है। ग्रेडिंग के जरिए उत्पादों को गुणवत्ता के अनुसार बांटा जाता है। इससे किसान अलग गुणवत्ता के लिए अलग कीमत मांग सकता है।

मूल्य संवर्धन से कमाई

डॉ. जाट ने प्रोसेसिंग को किसानों की आय से जोड़ा है। कच्ची उपज बेचने पर कीमत सीमित रह सकती है। मूल्य संवर्धन (Value Addition) से उसी उपज का मूल्य बढ़ता है। फल से जूस और जैम तैयार किया जा सकता है।

सब्जियों से सॉस और दूसरे तैयार उत्पाद बनाए जा सकते हैं। मसालों की सफाई और पैकिंग से भी मूल्य बढ़ता है। बेहतर पैकेजिंग उत्पाद को आकर्षक और सुरक्षित बनाती है। इससे दूर के बाजारों तक माल भेजना आसान होता है। प्रोसेसिंग से खराब होने वाली उपज का इस्तेमाल भी हो सकता है। इससे बर्बादी घटती है और किसानों को अतिरिक्त आय मिलती है।

बाजार से जुड़ना जरूरी

केवल बेहतर उत्पादन किसानों की आय बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं है। उपज के लिए मजबूत बाजार व्यवस्था भी चाहिए। किसानों को बाजार की मांग की जानकारी समय पर मिलनी चाहिए। इससे वे सही फसल और किस्म चुन सकते हैं। प्रोसेसिंग इकाइयों से किसानों का सीधा जुड़ाव फायदेमंद हो सकता है। इससे उपज की नियमित खरीद की संभावना बढ़ती है।

किसान समूह मिलकर ग्रेडिंग और पैकेजिंग केंद्र बना सकते हैं। सामूहिक बिक्री से परिवहन खर्च भी कम हो सकता है। डिजिटल बाजार किसानों को नए खरीदारों से जोड़ सकते हैं। पारदर्शी कीमत मिलने से सौदे का जोखिम कम होगा।

देसी किस्मों का संरक्षण

भारत में फलों और सब्जियों की कई देसी किस्में मौजूद हैं। कुछ किस्में स्थानीय मौसम को बेहतर तरीके से सहती हैं। इन किस्मों में रोगों से लड़ने के प्राकृतिक गुण हो सकते हैं। उनका संरक्षण भविष्य की खेती के लिए जरूरी है।

डॉ. जाट ने दुर्लभ जर्मप्लाज्म बचाने पर भी जोर दिया। जर्मप्लाज्म पौधों की आनुवंशिक सामग्री और विविधता से जुड़ा है। इसके संरक्षण से वैज्ञानिक नई किस्में विकसित कर सकते हैं। इससे जैव विविधता सुरक्षित रखने में भी मदद मिलती है। देसी किस्में स्वाद और पोषण के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। इनकी बाजार पहचान किसानों को बेहतर कीमत दिला सकती है।

गांवों में बढ़ेगा रोजगार

बागवानी केवल खेती तक सीमित क्षेत्र नहीं है। इससे कई ग्रामीण कारोबार विकसित किए जा सकते हैं। नर्सरी और पौध उत्पादन में रोजगार के अवसर बनते हैं। ग्रेडिंग और पैकिंग केंद्रों में भी काम मिलता है।

प्रोसेसिंग इकाइयां गांवों में नए छोटे उद्योग शुरू कर सकती हैं। इनमें महिलाओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ सकती है। डॉ. जाट के अनुसार बागवानी पोषण सुरक्षा में भी मदद करती है। फल और सब्जियां संतुलित भोजन का जरूरी हिस्सा हैं। बागवानी का विस्तार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है। इससे किसानों को आय के कई रास्ते मिल सकते हैं।

किसानों के लिए मुख्य संदेश

किसान स्थानीय अनुभव और वैज्ञानिक सलाह का साथ में उपयोग करें। फसल चुनने से पहले बाजार की मांग भी समझें। प्रमाणित पौध सामग्री और उपयुक्त किस्म का चुनाव जरूरी है। सिंचाई और पोषण प्रबंधन मौसम के अनुसार होना चाहिए।

किसान कटाई के बाद उपज को सुरक्षित रखने पर ध्यान दें। ग्रेडिंग और पैकेजिंग से बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ती है। छोटे किसान समूह बनाकर प्रोसेसिंग की शुरुआत कर सकते हैं। प्रशिक्षण और तकनीकी सलाह लेकर जोखिम कम किया जा सकता है।

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