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दलहन के प्रमाणित बीज पर सरकार दे रही 100% सब्सिडी, किसानों को ₹12,000 तक मदद

newz@gmail.com | Oct 10, 2026, 13:24 IST

केंद्र सरकार ने तुअर, उड़द और मसूर के नए प्रमाणित बीजों पर सब्सिडी बढ़ाकर 100 प्रतिशत की है। किसानों को प्रति क्विंटल ₹12,000 तक मदद मिल सकती है। चना और अन्य दलहनी फसलों के बीजों पर भी अलग दरों से सहायता मिलेगी।

दलहन

केंद्र सरकार ने दलहन के प्रमाणित बीजों पर सब्सिडी बढ़ाई है। इस बदलाव का उद्देश्य किसानों को बेहतर बीज अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। खासतौर पर तुअर, उड़द और मसूर की नई किस्मों पर जोर दिया गया है। इन फसलों के पात्र प्रमाणित बीजों पर लागत की 100 प्रतिशत तक सहायता मिलेगी। इसकी अधिकतम सीमा ₹12,000 प्रति क्विंटल रखी गई है।

यह फैसला दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के तहत लिया गया है। योजना का उद्देश्य देश में दलहन उत्पादन बढ़ाना है। साथ ही, भारत की आयात पर निर्भरता घटाने पर भी जोर है। सरकार चाहती है कि किसान बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों का इस्तेमाल करें। इससे खेती की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, 100 प्रतिशत सब्सिडी का अर्थ हर किसान को बिना शर्त नकद भुगतान नहीं है। सहायता तय दरों और योजना के नियमों के अनुसार मिलेगी। बीज की किस्म, उसकी उम्र और संबंधित फसल के आधार पर दर बदल सकती है। इसलिए बीज खरीदने से पहले किसान स्थानीय कृषि विभाग से पात्रता की पुष्टि करें।

किस फसल के बीज पर कितनी मदद?

संशोधित दिशानिर्देशों में बीज की किस्म की उम्र के आधार पर सहायता तय है। पांच साल के भीतर जारी तुअर, उड़द और मसूर की किस्मों पर अधिकतम लाभ मिलेगा। इन पर बीज की पूरी लागत तक सहायता मिल सकती है। लेकिन अधिकतम सीमा ₹12,000 प्रति क्विंटल है।

चना और अन्य दलहनी फसलों के लिए सहायता की दर अलग है। पांच साल के भीतर जारी किस्मों पर 75 प्रतिशत तक सब्सिडी मिल सकती है। इसकी अधिकतम सीमा ₹6,000 प्रति क्विंटल रखी गई है। दोनों सीमाओं में जो रकम कम होगी, वही लागू होगी।

पांच से दस साल पुरानी तुअर, उड़द और मसूर की किस्मों पर भी सहायता मिलेगी। इन पर 75 प्रतिशत या ₹9,000 प्रति क्विंटल तक सब्सिडी का प्रावधान है। चना और अन्य दलहनी फसलों के लिए दर 50 प्रतिशत तक है। इन बीजों पर अधिकतम सहायता ₹4,000 प्रति क्विंटल रखी गई है। यहां भी कम राशि वाली सीमा लागू होगी।

इसलिए सभी दलहनी फसलों के लिए एक समान सब्सिडी नहीं है। किसानों को अपनी फसल और बीज की किस्म की उम्र देखनी होगी। बीज खरीदते समय प्रमाणित किस्म की जानकारी लेना भी जरूरी है। इससे पात्रता और मिलने वाली सहायता समझने में आसानी होगी।

महाराष्ट्र की मांग के बाद बदलाव

इस सब्सिडी में बढ़ोतरी से पहले महाराष्ट्र सरकार ने मुद्दा उठाया था। महाराष्ट्र के कृषि मंत्री दत्तात्रेय भरणे ने जुलाई में केंद्र को पत्र लिखा था। उन्होंने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से सब्सिडी बढ़ाने का आग्रह किया था। उनकी मांग प्रमाणित दलहन बीजों पर सहायता 50 से बढ़ाकर 100 प्रतिशत करने की थी।

महाराष्ट्र सरकार का तर्क था कि बीजों की ऊंची कीमत किसानों के लिए परेशानी बन रही थी। इस वजह से किसान प्रमाणित बीजों का इस्तेमाल कम कर रहे थे। इससे फसल की उत्पादकता प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी। इसके बाद केंद्र ने 28 अगस्त 2026 को संशोधित दिशानिर्देश जारी किए।

नई व्यवस्था में बीज की किस्म और फसल के अनुसार सहायता तय की गई है। इसका लाभ लेने के लिए किसानों को योजना की शर्तें समझनी होंगी। केवल बीज खरीदने से सब्सिडी मिलने की गारंटी नहीं मानी जानी चाहिए। पात्रता और आवेदन की प्रक्रिया की पुष्टि स्थानीय कृषि विभाग से करनी चाहिए।

चना किसानों को क्या फायदा?

रबी सीजन में चना बोने वाले किसानों के लिए भी यह बदलाव अहम है। चना देश की प्रमुख दलहनी फसलों में शामिल है। इसकी खेती में बीज की गुणवत्ता फसल की शुरुआत को प्रभावित करती है। बेहतर बीज से अच्छी फसल लेने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, अंतिम उत्पादन मौसम, मिट्टी, सिंचाई और खेती के तरीके पर भी निर्भर करता है।

नई व्यवस्था के तहत पांच साल के भीतर जारी चने की किस्मों पर 75 प्रतिशत तक सहायता मिल सकती है। इसकी अधिकतम सीमा ₹6,000 प्रति क्विंटल है। पांच से दस साल पुरानी किस्मों के लिए अधिकतम सहायता ₹4,000 प्रति क्विंटल है। इन दोनों मामलों में तय प्रतिशत और अधिकतम राशि में जो कम होगी, वही लागू होगी।

किसानों को बीज खरीदने से पहले किस्म जारी होने का वर्ष पूछना चाहिए। साथ ही, बीज प्रमाणित है या नहीं, इसकी पुष्टि भी जरूरी है। इससे गलत जानकारी के आधार पर खरीद करने का जोखिम कम होगा। किसान सहकारी समिति या जिले के कृषि विभाग से उपलब्ध बीजों की जानकारी ले सकते हैं।

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन क्या है?

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन देश में दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए शुरू किया गया है। इसका लक्ष्य तुअर, उड़द, मसूर, चना और मूंग जैसी फसलों को बढ़ावा देना है। केंद्र सरकार ने मिशन के लिए ₹11,440 करोड़ का प्रावधान किया है। इसकी अवधि 2025-26 से 2030-31 तक ह

सरकार के मुताबिक, मिशन के तहत प्रमाणित बीजों की उपलब्धता बढ़ाई जाएगी। किसानों तक नई और बेहतर किस्मों के बीज पहुंचाने पर जोर रहेगा। योजना में बीज वितरण के साथ उत्पादन और बाजार व्यवस्था को भी मजबूत करने का लक्ष्य है। इससे दलहन की खेती का रकबा और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

मिशन के तहत 2030-31 तक दलहन उत्पादन 350 लाख टन करने का लक्ष्य रखा गया है। खेती का रकबा 310 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने की योजना है। इसके अलावा, किसानों को प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने और फसल की उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

दलहन उत्पादन बढ़ने से देश में दालों की उपलब्धता बेहतर हो सकती है। इससे आयात पर निर्भरता कम करने के लक्ष्य को भी मदद मिलेगी। लेकिन इसका असर मौसम, बीज उपलब्धता और किसानों द्वारा योजना अपनाने पर निर्भर करेगा। इसलिए सब्सिडी के साथ समय पर बीज वितरण भी महत्वपूर्ण है।

किसान सब्सिडी का लाभ कैसे लें?

सबसे पहले किसान अपने जिले के कृषि विभाग या सहकारी समिति से संपर्क करें। वहां प्रमाणित दलहन बीजों की उपलब्धता और लागू सहायता दर पूछें। बीज की किस्म और जारी होने का वर्ष जरूर पता करें। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किस श्रेणी की सब्सिडी लागू होगी।

किसान बीज खरीदने से पहले जरूरी दस्तावेजों की जानकारी भी लें। आवेदन की प्रक्रिया और सहायता प्राप्त करने के तरीके की पुष्टि करें। योजना के अंतर्गत उपलब्ध बीज और उनकी कीमत की जानकारी भी जुटाएं। अलग-अलग किस्मों पर सहायता की दर अलग हो सकती है।

कृषि विभाग से यह भी पूछें कि सहायता सीधे किसान को मिलेगी या किसी अन्य प्रक्रिया से। उपलब्ध दिशानिर्देशों के अनुसार जरूरी पंजीयन और दस्तावेज पूरे करें। आवेदन या खरीद से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित रखना उपयोगी रहेगा। इससे भविष्य में जानकारी या भुगतान संबंधी समस्या होने पर मदद मिल सकती है।

योजना में खेतों की सही माप के लिए कृषि मैपर तकनीक के उपयोग पर भी सहायता जोड़ी गई है। इसके लिए ₹30 प्रति हेक्टेयर की अलग मदद बताई गई है। किसान इस सुविधा की पात्रता और उपयोग की प्रक्रिया विभाग से समझ सकते हैं।

प्रमाणित बीज क्यों जरूरी हैं?

प्रमाणित बीजों की गुणवत्ता तय मानकों के आधार पर जांची जाती है। इससे किसानों को बीज की पहचान और गुणवत्ता पर भरोसा करने में मदद मिलती है। अच्छी किस्मों से उपज बढ़ने की संभावना भी बन सकती है। कुछ किस्मों में कीट और रोग सहने की बेहतर क्षमता हो सकती है।

हालांकि, प्रमाणित बीज इस्तेमाल करने से हर स्थिति में अधिक उपज की गारंटी नहीं मिलती। फसल का परिणाम मौसम, मिट्टी, सिंचाई और पोषण पर भी निर्भर करता है। किसान अपनी जमीन और क्षेत्र के अनुकूल किस्म चुनें। स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह से सही निर्णय लेना उपयोगी होगा।

सब्सिडी बढ़ने से बीज की शुरुआती लागत का बोझ कम हो सकता है। इससे किसान नई किस्मों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं। लेकिन वास्तविक लाभ बीज की उपलब्धता और समय पर सहायता मिलने पर निर्भर करेगा। इसलिए किसानों को योजना की शर्तें समझकर ही खरीदारी करनी चाहिए।

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