किसान की बात,सूत्र के साथ

आप भी जैविक खेती शुरू करना चाहते हैं..? जानिए रासायनिक खाद घटाने का सही तरीका

newz@gmail.com | Oct 9, 2026, 13:55 IST

रासायनिक खेती से जैविक खेती की ओर अचानक बदलाव करने पर पैदावार प्रभावित हो सकती है। किसान मिट्टी की जांच कराएं और धीरे-धीरे जैविक खाद बढ़ाएं। विशेषज्ञों की सलाह से रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम करना बेहतर है।

जैविक खेती

खेती में बदलाव करना किसानों के लिए बड़ा फैसला होता है। इसका असर उत्पादन, लागत और कमाई पर पड़ सकता है। इसलिए जैविक खेती शुरू करने से पहले तैयारी करना जरूरी है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, रासायनिक खेती से जैविक खेती में अचानक बदलाव नुकसान पहुंचा सकता है। शुरुआत में फसल का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रहती है। किसानों को इसलिए धीरे-धीरे बदलाव करने की सलाह दी गई है।

लंबे समय से रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करने वाली मिट्टी को नई व्यवस्था अपनाने में समय लग सकता है। जैविक खाद से पोषक तत्व धीरे-धीरे उपलब्ध होते हैं। मिट्टी की जैविक गतिविधियों में सुधार भी धीरे-धीरे होता है। ऐसे में शुरुआती समय में फसल की जरूरत पूरी करना चुनौती बन सकता है।

अगर किसान बिना तैयारी के सभी रासायनिक खाद बंद कर दें, तो फसल पर असर पड़ सकता है। उत्पादन घटने से आमदनी प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि जैविक खेती की शुरुआत सोच-समझकर करना जरूरी है।

पहले मिट्टी की जांच कराएं

जैविक खेती की शुरुआत मिट्टी की स्थिति समझने से करनी चाहिए। मिट्टी की जांच से पोषक तत्वों की कमी और उपलब्धता का पता चलता है। इससे खेत के लिए खाद की सही योजना बनाने में मदद मिलती है।

किसानों को अपनी फसल और मिट्टी के अनुसार सलाह लेनी चाहिए। इसके लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से संपर्क किया जा सकता है। मिट्टी की जांच के बाद ही पोषण प्रबंधन की योजना बनाना बेहतर है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research, ICAR) भी मिट्टी की जांच आधारित खाद प्रबंधन पर जोर देती है। इसके विशेषज्ञ संतुलित पोषण और जैविक स्रोतों के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। इससे जरूरत के अनुसार खाद देने और अनावश्यक खर्च घटाने में मदद मिल सकती है।

रासायनिक खाद धीरे-धीरे घटाएं

किसानों को शुरुआत में सभी रासायनिक उर्वरक एक साथ बंद नहीं करने चाहिए। इसकी जगह जैविक खाद की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाई जा सकती है। गांव जंक्शन की रिपोर्ट में इसके लिए एक उदाहरण दिया गया है।

पहले चरण में लगभग 40 प्रतिशत जैविक खाद और 60 प्रतिशत रासायनिक खाद इस्तेमाल करने का सुझाव है। अगली फसल में दोनों की हिस्सेदारी करीब 50-50 प्रतिशत रखी जा सकती है। इसके बाद जैविक खाद की मात्रा 60 प्रतिशत और रासायनिक खाद की मात्रा 40 प्रतिशत की जा सकती है।

यह अनुपात हर खेत के लिए तय नियम नहीं है। अलग-अलग फसलों की पोषण जरूरतें अलग होती हैं। मिट्टी की स्थिति और उपलब्ध जैविक खाद भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इन अनुपातों को सीधे अपने खेत पर लागू नहीं करना चाहिए।

किसानों को मिट्टी की जांच और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार बदलाव करना चाहिए। जरूरत के मुताबिक खाद की मात्रा तय करना ज्यादा सुरक्षित रहेगा। लक्ष्य सिर्फ रासायनिक खाद कम करना नहीं, बल्कि फसल को पर्याप्त पोषण देना भी है।

कौन-सी जैविक खाद अपनाएं?

जैविक खेती की ओर बढ़ते समय किसान स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। सड़ी हुई गोबर की खाद इसका एक विकल्प है। कंपोस्ट और हरी खाद भी मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।

गोबर की खाद का इस्तेमाल करते समय उसका अच्छी तरह सड़ा होना जरूरी है। अधपकी खाद का गलत इस्तेमाल फसल प्रबंधन में परेशानी पैदा कर सकता है। खाद की मात्रा मिट्टी और फसल की जरूरत के अनुसार तय करनी चाहिए।

कंपोस्ट बनाने के लिए फसल अवशेष और अन्य उपयुक्त जैविक सामग्री का उपयोग किया जा सकता है। हरी खाद के लिए ढैंचा जैसी फसलें उपयोगी हो सकती हैं। इन्हें खेत की स्थिति और बुवाई के समय के अनुसार अपनाना चाहिए।

कृषि अनुसंधान से जुड़े विशेषज्ञ जैविक खाद, हरी खाद और फसल अवशेषों के पुनः उपयोग को महत्वपूर्ण मानते हैं। इनके साथ जैव उर्वरकों का उपयोग भी किया जा सकता है। हालांकि, हर विकल्प हर फसल और मिट्टी के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं होता।

लागत और पैदावार का हिसाब रखें

जैविक खेती अपनाने का फैसला केवल खाद के प्रकार पर निर्भर नहीं होना चाहिए। किसान को कुल लागत और फसल उत्पादन का भी हिसाब रखना चाहिए। इससे पता चलेगा कि बदलाव से खेत की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है।

हर फसल के बाद बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई और अन्य खर्च दर्ज करें। साथ ही, कुल उत्पादन और बाजार में मिले भाव का रिकॉर्ड रखें। इन आंकड़ों से अलग-अलग मौसम के परिणामों की तुलना की जा सकती है।

जैविक खाद तैयार करने में श्रम और समय लग सकता है। यदि किसान बाहर से खाद खरीदते हैं, तो उनका खर्च भी बढ़ सकता है। वहीं, खेत में उपलब्ध गोबर और फसल अवशेष उपयोग करने से कुछ बाहरी खर्च घट सकता है। वास्तविक बचत किसान की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

शुरुआती दौर में पैदावार कम होने की आशंका को भी ध्यान में रखना चाहिए। इसलिए बदलाव की योजना बनाते समय परिवार की आय और खेती की जरूरतों का आकलन करें। बिना हिसाब के पूरे खेत में एक साथ बदलाव करना जोखिम बढ़ा सकता है।

पहले छोटे हिस्से में शुरुआत करें

किसान अपनी पूरी जमीन पर एक साथ बदलाव करने के बजाय छोटे हिस्से से शुरुआत कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, पांच एकड़ जमीन वाले किसान पहले एक एकड़ में जैविक तरीके आजमा सकते हैं। यह एक उदाहरण है, कोई अनिवार्य नियम नहीं।

इस हिस्से में मिट्टी की जांच के आधार पर खाद प्रबंधन करें। फसल की बढ़वार, उत्पादन और खर्च पर नजर रखें। इसके बाद परिणामों की तुलना बाकी खेत से की जा सकती है।

अगर तरीका उपयोगी साबित हो, तो किसान अगले मौसम में इसका दायरा बढ़ा सकते हैं। यदि उत्पादन प्रभावित होता है, तो कृषि विशेषज्ञ से कारण समझें। इससे गलती सुधारने और नुकसान सीमित रखने का अवसर मिलेगा।

छोटे स्तर पर शुरुआत करने से किसान अपने खेत की जरूरतों को बेहतर समझ सकते हैं। इससे अनुभव के आधार पर आगे की योजना बनाना आसान होता है। हर खेत की मिट्टी और जलवायु अलग होती है, इसलिए एक ही तरीका सभी जगह समान नतीजे नहीं देता।

मिट्टी की सेहत पर रखें नजर

जैविक खेती का उद्देश्य सिर्फ रासायनिक खाद का इस्तेमाल घटाना नहीं है। मिट्टी की सेहत बनाए रखना और फसल को संतुलित पोषण देना भी जरूरी है। इसके लिए खाद प्रबंधन के साथ दूसरी कृषि विधियों पर भी ध्यान देना चाहिए।

फसल चक्र अपनाने से खेत में अलग-अलग फसलें उगाने का अवसर मिलता है। दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन प्रबंधन में मदद कर सकती हैं। फसल अवशेषों का सही उपयोग भी मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने में सहायक हो सकता है।

सिंचाई और खरपतवार प्रबंधन का ध्यान रखना भी जरूरी है। फसल में पोषक तत्वों की कमी दिखाई दे, तो बिना जांच के कोई भी खाद डालने से बचें। कृषि विशेषज्ञ की सलाह से कारण समझना ज्यादा उपयोगी होगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिक संतुलित और एकीकृत पोषण प्रबंधन पर जोर देते हैं। इसमें जैविक खाद, जैव उर्वरक और जरूरत के अनुसार रासायनिक खाद का उपयोग शामिल हो सकता है। इसका उद्देश्य उत्पादन बनाए रखते हुए मिट्टी की गुणवत्ता सुधारना है।

किसानों के लिए जरूरी सलाह

जैविक खेती में बदलाव का कोई एक तय तरीका सभी किसानों के लिए सही नहीं है। मिट्टी, फसल, मौसम और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार योजना बनानी चाहिए। खाद की मात्रा तय करने से पहले मिट्टी की जांच कराना उपयोगी कदम है।

किसान पहले छोटे क्षेत्र में बदलाव करके परिणाम देख सकते हैं। उत्पादन और लागत का रिकॉर्ड रखने से फैसला लेने में मदद मिलेगी। जरूरत पड़ने पर कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से सलाह लें।

रासायनिक खाद कम करने का लक्ष्य फसल को पोषण से वंचित करना नहीं होना चाहिए। सही योजना से मिट्टी की सेहत और उत्पादन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा सकती है। धीरे-धीरे बदलाव करना किसानों को जोखिम समझने और बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकता है।

ये भी पढ़ें…

सरकार की नई ग्रामीण रोजगार योजना में होंगे 375 काम, जानिए गांवों और किसानों को इससे क्या फायदा होगा

भारत-घाना में कृषि समझौता: रिसर्च और तकनीक में बढ़ेगा सहयोग, किसानों के लिए खुलेंगे नए रास्ते

बागवानी किसानों की आय बढ़ाएगी आधुनिक तकनीक, खेत तक पहुंचे रिसर्च : ICAR महानिदेशक डॉ. जाट

खेत बचाओ अभियान 22 अक्टूबर से; कृषि मंत्री शिवराज ने ली समीक्षा बैठक, योजनाओं की धीमी गति पर अफसरों को चेताया

GENERAL newz@gmail.com

Read more