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गन्ना किसानों की शिकायतों पर केंद्र ने रमेश चंद की अध्यक्षता में बनाई उच्चस्तरीय समिति, दाम और तौल की होगी जांच

newz@gmail.com | Oct 19, 2026, 15:38 IST

केंद्र सरकार ने गन्ना किसानों की शिकायतों पर प्रोफेसर रमेश चंद की अध्यक्षता में समिति बनाई है। यह समिति गन्ने और चीनी के दाम, तौल और रिकवरी की जांच करेगी।

गन्ना किसान

गन्ना किसानों की शिकायतों पर केंद्र सरकार ने उच्चस्तरीय समिति बनाई है। इस समिति की अध्यक्षता प्रोफेसर रमेश चंद करेंगे। समिति गन्ना किसानों की मांगों की जांच करेगी। कर्नाटक और महाराष्ट्र के किसान कई दिन से प्रदर्शन कर रहे थे। अब सरकार ने इस पर कदम उठाया है। हालांकि गन्ने या चीनी के दाम में कोई तुरंत बदलाव घोषित नहीं हुआ है।

गन्ना किसानों का विरोध क्यों

कर्नाटक और महाराष्ट्र के गन्ना किसान कई दिन से नाराज थे। उनकी मांग गन्ने के सही दाम को लेकर थी। साथ ही तौल और चीनी की रिकवरी पर भी सवाल उठे। इसी वजह से वे सड़क पर उतरे। कर्नाटक के किसान गन्ने के बेहतर भाव पर जोर दे रहे थे। महाराष्ट्र के किसानों की चिंता तौल और रिकवरी में पारदर्शिता को लेकर थी।

कोगनोली टोल प्लाजा पर प्रदर्शन

प्रदर्शन का सबसे बड़ा असर कर्नाटक के बेलगावी जिले में दिखा। यहां कर्नाटक और महाराष्ट्र की सीमा पर कोगनोली टोल प्लाजा है। किसानों ने 13 और 14 अक्टूबर को यहां राष्ट्रीय राजमार्ग 48 जाम किया। इस जाम से पुणे और कोल्हापुर मार्ग पर यातायात प्रभावित हुआ। आंदोलन का असर कई दिन तक दिखा।

दिल्ली में बैठक के बाद समिति का ऐलान

समिति का फैसला 12 अक्टूबर की बैठक के बाद हुआ। यह बैठक दिल्ली में किसान प्रतिनिधियों के साथ हुई। बैठक में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रल्हाद जोशी शामिल थे।

सरकार ने उस बैठक में एक हफ्ते में समिति बनाने का भरोसा दिया था। लेकिन यह समिति दो दिन के भीतर ही बना दी गई। यानी सरकार ने तय समय से पहले कदम उठाया।

रमेश चंद कौन हैं

समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर रमेश चंद नीति आयोग के पूर्व सदस्य हैं। वे आईसीएआर-नार्म (Indian Council of Agricultural Research – National Academy of Agricultural Research Management) के निदेशक भी रहे हैं। इसके अलावा वे 15वें वित्त आयोग के सदस्य भी रहे हैं। अब वे गन्ने के दाम और चीनी उद्योग के सवाल परखेंगे।

समिति में कौन-कौन शामिल

अध्यक्ष के अलावा समिति में तीन अधिकारी सदस्य हैं। पहले सदस्य कृषि आयुक्त हैं। दूसरे सदस्य खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के संयुक्त सचिव हैं। वे चीनी का काम देखते हैं। तीसरे सदस्य उपभोक्ता मामलों के विभाग के संयुक्त सचिव हैं। वे वैध माप विज्ञान का काम देखते हैं।

समिति की जांच के पांच बिंदु

समिति देखेगी कि गन्ने का एफआरपी (Fair and Remunerative Price) बढ़ना चाहिए या नहीं। इसमें खेती की लागत को ध्यान में रखा जाएगा। दूसरा बिंदु मिल गेट पर चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य का है। इसमें उत्पादन लागत और मिलों की आर्थिक हालत को देखा जाएगा।

तीसरा बिंदु चीनी रिकवरी का है। इसकी रिपोर्टिंग और जांच की व्यवस्था परखी जाएगी। चौथा बिंदु मिलों में गन्ने के तौल का है। इसमें कांटों की कैलिब्रेशन और निरीक्षण भी शामिल है। पांचवां बिंदु मशीन से कटे गन्ने में वजन की कमी का है। यह देखा जाएगा कि इसका किसानों के भुगतान पर क्या असर पड़ता है।

समिति किसान संगठनों से बात करेगी। वह चीनी मिल संघों, राज्य सरकारों और विशेषज्ञों से भी राय लेगी। इसके बाद जल्द से जल्द अपनी सिफारिशें देगी। सिफारिशों पर सक्षम प्राधिकारी विचार करेगा।

किसान संगठनों ने क्या कहा

किसान संगठन इस फैसले से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। कर्नाटक रैयत संघ के नेता चुन्नाप्पा पुजेरी ने बयान दिया। उनके मुताबिक दिल्ली की बातचीत में गन्ने के दाम पर ठोस फैसला नहीं हुआ। किसान समिति के काम पर नजर रखेंगे।

किसान संगठनों ने चेताया है। नतीजों में देरी हुई, तो आंदोलन फिर शुरू हो सकता है। यानी बातचीत का रास्ता खुला है। लेकिन किसानों का भरोसा नतीजों पर टिका है।

किसानों की मुख्य मांगें

किसान संगठनों की कई मांगें हैं। वे गन्ने के लिए 5,500 रुपए प्रति टन का भाव चाहते हैं। वे चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 60 रुपए प्रति किलो चाहते हैं। वे स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की भी मांग कर रहे हैं। एक मांग कर्नाटक में बने एथेनॉल की सरकारी खरीद की भी है।

दोनों राज्यों की अलग चिंता

दोनों राज्यों के किसानों की चिंता पूरी तरह एक जैसी नहीं है। कर्नाटक के किसान केंद्र के एफआरपी से ऊपर एसएपी (State Advised Price) चाहते हैं। यानी वे राज्य स्तर पर भी बेहतर भाव चाहते हैं। महाराष्ट्र में मुद्दा थोड़ा अलग है। वहां किसानों की चिंता तौल और रिकवरी दर की पारदर्शिता को लेकर है।

अभी क्या नहीं बदला

सरकार ने फिलहाल गन्ने या चीनी के दाम बदलने की घोषणा नहीं की है। समिति की सिफारिशें आने के बाद ही आगे का फैसला होगा। तब तक किसानों और चीनी मिलों को इंतजार करना होगा।

आने वाले दिनों में समिति की बैठकें और किसान संगठनों से बातचीत अहम रहेगी। इन्हीं से तय होगा कि किसानों की नाराजगी कम होती है या नहीं। फिलहाल नजर इस पर है कि सिफारिशें कितनी जल्दी आती हैं।

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