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कार्बन क्रेडिट क्या है, किसान इससे कैसे कमा सकते हैं पैसे, जानिए पूरी प्रक्रिया और फायदे

newz@gmail.com | Sep 11, 2026, 14:12 IST

कार्बन क्रेडिट किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई का रास्ता बन सकता है। लेकिन कार्बन क्रेडिट से किसानों की कमाई बढ़ेगी कैसे, आइए जानें योजना, उसकी प्रक्रिया, फायदे और जरूरी सावधानियां।

कार्बन क्रेडिट

दूरदर्शन किसान की एक Reel ने इन दिनों कार्बन क्रेडिट पर चर्चा बढ़ा दी है। इसमें किसानों को मिलने वाले संभावित फायदे की जानकारी दी गई है। कार्बन क्रेडिट खेती से अतिरिक्त कमाई का नया जरिया बन सकता है। इसके लिए किसानों को पर्यावरण अनुकूल खेती अपनानी होगी।

सिर्फ तरीका बदलने से तुरंत पैसे नहीं मिलेंगे। पहले परियोजना बनेगी और उत्सर्जन में कमी मापी जाएगी। स्वतंत्र एजेंसी इसकी जांच और पुष्टि करेगी। इसके बाद पात्र परियोजना को कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र मिल सकता है। यह प्रमाणपत्र तय इलेक्ट्रॉनिक मंच पर खरीदा या बेचा जा सकेगा।

कार्बन क्रेडिट क्या होता है

कार्बन क्रेडिट प्रदूषण घटाने या कार्बन रोकने का प्रमाण माना जाता है। भारत में एक प्रमाणपत्र एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य दर्शाएगा। इसका अर्थ एक टन वास्तविक कार्बन डाइऑक्साइड होना जरूरी नहीं है। दूसरी ग्रीनहाउस गैसों का असर भी इसमें बदला जाता है।

सरकार ने CCTS (Carbon Credit Trading Scheme) के तहत व्यवस्था बनाई है। इसका उद्देश्य उत्सर्जन घटाने वाले कामों को आर्थिक मूल्य देना है। इस व्यवस्था में दो प्रमुख हिस्से रखे गए हैं। पहला अनुपालन तंत्र है और दूसरा ऑफसेट तंत्र है।

अनुपालन व्यवस्था मुख्य रूप से बड़े उद्योगों के लिए है। उन्हें सरकार द्वारा तय उत्सर्जन लक्ष्य पूरे करने होंगे। ऑफसेट व्यवस्था स्वैच्छिक परियोजनाओं के लिए बनाई गई है। इसमें गैर-बाध्य संस्थाएं अपनी परियोजनाएं पंजीकृत कर सकती हैं। कृषि क्षेत्र को इसी ऑफसेट व्यवस्था में जगह मिली है। इसे पहले चरण के प्रस्तावित क्षेत्रों में शामिल किया गया है।

किसानों की कमाई कैसे होगी

किसान ऐसी खेती से कार्बन क्रेडिट बना सकते हैं, जो उत्सर्जन घटाए। जमीन में ज्यादा कार्बन रोकने वाली गतिविधियां भी मददगार हो सकती हैं। पेड़ आधारित खेती से मिट्टी और पौधों में कार्बन बढ़ सकता है। फसल अवशेष जलाने से बचना भी उपयोगी कदम बन सकता है।

धान की खेती में पानी का बेहतर प्रबंधन मीथेन घटा सकता है। खाद का संतुलित उपयोग नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन घटा सकता है। बायोचार, जैविक खाद और मिट्टी संरक्षण भी उपयोगी हो सकते हैं। पात्रता संबंधित स्वीकृत पद्धति और नियमों से तय होगी।

हर गतिविधि पर अपने आप क्रेडिट नहीं मिलेगा। परियोजना को स्वीकृत प्रक्रिया और निर्धारित मानकों से गुजरना होगा। पहले परियोजना का आधार स्तर तय किया जाएगा। इसमें पुरानी खेती और उत्सर्जन का अनुमान दर्ज होगा। इसके बाद किसान नई कृषि पद्धति अपनाएंगे। तय अवधि में हुए बदलाव का रिकॉर्ड रखना जरूरी होगा।

फसल, खाद, सिंचाई और अवशेष प्रबंधन की जानकारी रखनी होगी। उपग्रह, मोबाइल और खेत जांच का इस्तेमाल संभव है। सत्यापन के बाद उत्सर्जन में वास्तविक कमी तय होगी। उसी आधार पर प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। छोटे किसान सीधे परियोजना चलाने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। उनके लिए समूह आधारित मॉडल ज्यादा उपयोगी रह सकता है। किसान उत्पादक संगठन किसानों को जोड़ सकते हैं। सहकारी संस्था या परियोजना संचालक भी सहयोग कर सकते हैं।

कमाई तय क्यों नहीं

दरअसल, कार्बन क्रेडिट से मिलने वाली कमाई पहले से तय नहीं होती। इसका मूल्य बाजार की मांग और उपलब्धता से बदलता है। किसान की कुल कमाई परियोजना के आकार पर निर्भर करेगी। सत्यापित उत्सर्जन कटौती भी इसमें अहम भूमिका निभाएगी।

पंजीकरण, निगरानी और सत्यापन पर खर्च हो सकता है। परियोजना संचालक अपनी सेवा का हिस्सा भी रख सकता है। इसलिए कुल बिक्री और किसान की शुद्ध आय अलग होगी। अनुबंध पढ़े बिना केवल बड़ी कमाई के दावे मानना ठीक नहीं है।

सरकारी व्यवस्था अभी प्रत्येक किसान को तय भुगतान की गारंटी नहीं देती। यह न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी योजना भी नहीं है। क्रेडिट जारी होने में समय लग सकता है। खेत का रिकॉर्ड कई मौसमों तक रखना पड़ सकता है। किसान को खेती की नई पद्धति लगातार अपनानी होगी। बीच में बदलाव आने पर क्रेडिट की मात्रा घट सकती है।

व्यवस्था की निगरानी कौन करेगा

BEE (Bureau of Energy Efficiency) इस योजना का प्रशासक है। यह नियम, प्रक्रिया और पात्रता व्यवस्था तैयार करता है। ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया कार्बन बाजार की रजिस्ट्री संभालेगा। रजिस्ट्री में प्रमाणपत्रों और लेनदेन का रिकॉर्ड रहेगा।

CERC (Central Electricity Regulatory Commission) व्यापारिक गतिविधियों की निगरानी करेगा। इसका उद्देश्य बाजार में भरोसा और पारदर्शिता बनाए रखना है। ACVA (Accredited Carbon Verification Agency) परियोजनाओं का सत्यापन करेगी। प्रमाणपत्र जांच के बाद ही जारी किए जा सकेंगे। यह व्यवस्था फर्जी क्रेडिट रोकने के लिए जरूरी है। गलत आंकड़े पूरे कार्बन बाजार का भरोसा कमजोर कर सकते हैं।

किसानों के लिए सावधानी भी जरूरी

किसान किसी कंपनी से जुड़ने से पहले पूरा अनुबंध पढ़ें। क्रेडिट का मालिक कौन होगा, यह साफ होना चाहिए। बिक्री मूल्य में किसान का हिस्सा लिखित होना चाहिए। परियोजना खर्च और सेवा शुल्क भी पहले तय होना चाहिए। जमीन का मालिकाना अधिकार किसी को हस्तांतरित नहीं होना चाहिए। किसान अपनी फसल चुनने का अधिकार भी सुरक्षित रखें।

डेटा के इस्तेमाल की शर्तें समझना जरूरी है। खेत, उत्पादन और जमीन संबंधी जानकारी संवेदनशील हो सकती है। बिना सरकारी मान्यता वाले एजेंट को अग्रिम भुगतान नहीं करें। सुनिश्चित लाभ और तुरंत कमाई वाले दावों से सावधान रहें। कार्बन क्रेडिट खेती का विकल्प नहीं है। यह सही व्यवस्था मिलने पर अतिरिक्त आय का माध्यम बन सकता है।

जरूरी FAQ

कार्बन क्रेडिट से किसान पैसे कैसे कमा सकते हैं?

किसान उत्सर्जन घटाने वाली स्वीकृत खेती अपनाकर परियोजना से जुड़ सकते हैं। परियोजना में हुए बदलाव का रिकॉर्ड रखा जाएगा। मान्यता प्राप्त एजेंसी उत्सर्जन कटौती का सत्यापन करेगी। इसके बाद पात्र कार्बन क्रेडिट जारी हो सकते हैं। बिक्री से मिली राशि अनुबंध के अनुसार किसानों में बांटी जाएगी।

क्या हर किसान को कार्बन क्रेडिट मिल सकता है?

केवल पर्यावरण अनुकूल खेती अपनाना पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित गतिविधि स्वीकृत पद्धति के तहत पात्र होनी चाहिए। परियोजना का पंजीकरण और सत्यापन भी जरूरी होगा। छोटे किसान समूह, सहकारी संस्था या किसान उत्पादक संगठन के जरिए जुड़ सकते हैं।

कार्बन क्रेडिट से कितनी कमाई हो सकती है?

इसकी कोई निश्चित सरकारी दर नहीं है। कमाई क्रेडिट की मात्रा और बाजार मूल्य पर निर्भर करेगी। परियोजना खर्च, सत्यापन शुल्क और संचालक का हिस्सा भी कट सकता है। किसान को अनुबंध में अपना हिस्सा पहले समझना चाहिए।

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