किसान की बात,सूत्र के साथ

धान के कटोरे में कृषि मंत्री, पर कितनों ने की खुद खेती?

editor | Aug 23, 2026, 11:24 IST

Dhaan ka katore : छत्तीसगढ़ की राजनीति में किसान सबसे बड़ा मुद्दा है। धान का समर्थन मूल्य हो, बोनस हो, कर्जमाफी हो या फसल खरीदी। सरकारों की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा खेती के आसपास ही घूमता रहा है। ऐसे में एक सवाल स्वाभाविक है। जिस राज्य की अर्थव्यवस्था और राजनीति में किसान इतनी अहम भूमिका निभाता है, वहां कृषि विभाग संभालने वाले नेता खुद खेती से कितने जुड़े रहे हैं?

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छत्तीसगढ़ बनने के बाद अलग-अलग सरकारों में कई नेताओं को कृषि विभाग की जिम्मेदारी मिली। इनमें कुछ की पहचान लंबे समय से किसान या कृषि से जुड़े व्यक्ति की रही, जबकि कुछ नेता मूल रूप से राजनीति से आए और उनके पास कृषि के साथ कई दूसरे विभाग भी रहे। पूर्व कृषि मंत्री रविंद्र चौबे इस मामले में अलग नजर आते हैं। उनके चुनावी हलफनामे में पेशा कृषि दर्ज है। आय के स्रोतों में खेती का भी उल्लेख है और उनके नाम कृषि भूमि दर्ज होने की जानकारी भी चुनावी रिकॉर्ड में मिलती है।

यानी चौबे के मामले में खेती सिर्फ मंत्री बनने के बाद का परिचय नहीं है। राजनीति में आने से पहले और राजनीतिक जीवन के दौरान भी कृषि उनकी आर्थिक पृष्ठभूमि का हिस्सा रही है।चौबे का राजनीतिक सफर भी गांव और सहकारिता की राजनीति से होकर आगे बढ़ा। वे ग्राम पंचायत के सरपंच रहे, जनपद पंचायत की जिम्मेदारी संभाली और सहकारी संस्थाओं से भी जुड़े रहे। बाद में लंबी राजनीतिक पारी खेलते हुए विधानसभा और सरकार तक पहुंचे। यही वजह है कि कृषि विभाग उनके पास आने पर उनकी किसान पृष्ठभूमि भी चर्चा में रही।

Dhaan ka katore: नेताम के हलफनामे में कृषि

मौजूदा कृषि मंत्री रामविचार नेताम का मामला थोड़ा अलग है। उनकी पहचान एक वरिष्ठ आदिवासी नेता और लंबे राजनीतिक अनुभव वाले राजनेता की है, लेकिन उनके चुनावी हलफनामों में कृषि को पेशे और आय के स्रोत के तौर पर दर्ज किया गया है। यानी उनके मामले में भी खेती से जुड़ाव केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं माना जा सकता, लेकिन कृषि मंत्री रहे हर नेता की कहानी ऐसी नहीं है।

चंद्रशेखर साहू लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे और रमन सिंह सरकार में कृषि विभाग संभाला। विधानसभा के रिकॉर्ड में भी कृषि मंत्री के तौर पर उनकी भूमिका दर्ज है। उनके कार्यकाल में कृषि (Dhaan ka katore) से जुड़े मुद्दों पर विधानसभा में सरकार की ओर से जवाब भी उन्होंने दिए। बृजमोहन अग्रवाल भी लंबे समय तक सरकार के महत्वपूर्ण चेहरों में रहे। उनके पास कृषि के साथ कई दूसरे बड़े विभागों की जिम्मेदारी रही। उनकी पहचान मुख्य रूप से एक अनुभवी राजनेता की रही है। ऐसे नेताओं के मामले में यह कहना मुश्किल होगा कि उनका मुख्य पेशा खेती रहा है।

कृषि का अनुभव क्यों जरुरी

किसान के लिए खेती (Dhaan ka katore) सिर्फ एक विभाग नहीं है। मौसम खराब होने पर फसल का नुकसान, खाद की कीमत, बीज की उपलब्धता, मंडी में भाव और भुगतान में देरी जैसी बातें उसके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हैं। जिस नेता ने खुद खेती की हो, उसके लिए इन समस्याओं का अनुभव शायद किसी सरकारी फाइल में लिखे आंकड़ों से अलग हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि कृषि विभाग चलाने के लिए सिर्फ किसान होना ही पर्याप्त नहीं है।

नीति, प्रशासन, बाजार और तकनीक की समझ भी उतनी ही जरूरी है। हालांकि सवाल यह नहीं कि कृषि मंत्री किसान था या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि कृषि नीति बनाने वाले नेता को किसान की जमीन और उसकी मुश्किलों की कितनी सीधी समझ थी। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह सवाल और अहम हो जाता है। यहां सरकार बनने-बिगड़ने में किसान बड़ा फैक्टर रहा है और धान की राजनीति ने कई बार चुनावी समीकरण बदले हैं।

ऐसे में कृषि मंत्रियों की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो तस्वीर एक जैसी नहीं दिखती। कुछ नेताओं के दस्तावेजों में खेती उनका पेशा दिखाई देती है, तो कुछ की पहचान पूरी तरह राजनीतिक रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिसके हाथ में किसानों की नीति है, क्या उसके हाथ कभी खुद खेत की मिट्टी से भी सने रहे हैं या फिर वे एसी कमरों में बैठकर नीति बनाते रहे हैं।

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