भारत और घाना ने कृषि अनुसंधान और शिक्षा में सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है। दोनों देशों ने दो महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। इन समझौतों का उद्देश्य वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करना है। इनमें शिक्षा, अनुसंधान और क्षमता निर्माण भी शामिल हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और घाना के विदेश मंत्री सैम ओकुडजेटो अबलाकवा की मौजूदगी में समझौतों का आदान-प्रदान हुआ।
यह पहल भारत और अफ्रीकी देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। कृषि क्षेत्र में इसका खास महत्व है। दोनों देशों के बीच कृषि अनुसंधान, नई तकनीक और शिक्षा पर काम होगा। इससे संस्थानों के बीच संपर्क बढ़ाने का रास्ता खुलेगा। वैज्ञानिक अपने अनुभव और जानकारी साझा कर सकेंगे। इस सहयोग का लाभ खेती से जुड़ी तकनीकों के विकास में मिल सकता है।
कृषि अनुसंधान पर पांच साल का करार
दूसरा समझौता भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और घाना के क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के बीच हुआ। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research, ICAR) नई दिल्ली में स्थित है। घाना का यह संस्थान वहां की वैज्ञानिक अनुसंधान व्यवस्था का हिस्सा है।
इस समझौते की अवधि पांच साल रखी गई है। इसके तहत दोनों संस्थान संयुक्त कृषि अनुसंधान करेंगे। वैज्ञानिक और तकनीकी जानकारी का आदान-प्रदान भी होगा। कृषि तकनीकों को विकसित करने और उपयोग में लाने पर जोर रहेगा।
समझौते में क्षमता निर्माण को भी जगह दी गई है। इसके तहत वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच सहयोग बढ़ेगा। दोनों संस्थान साझा शोध परियोजनाएं भी चला सकेंगे। कृषि तकनीकों के व्यावसायिक उपयोग पर भी काम होगा।
इस साझेदारी को घाना की कंपनी अरिमा फार्म्स लिमिटेड ने आगे बढ़ाने में मदद की है। कंपनी को कुछ शोध और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए साझेदार माना गया है। इससे अनुसंधान और उसके व्यावहारिक उपयोग के बीच संबंध मजबूत हो सकता है।
टमाटर की खेती पर खास फोकस
इस कृषि साझेदारी के पहले चरण में सब्जियों पर शोध किया जाएगा। इसमें टमाटर के अनुसंधान और विकास को खास प्राथमिकता मिलेगी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद इसमें तकनीकी सहयोग देगी।
समझौते के तहत बेहतर कृषि तकनीकों को बड़े स्तर पर अपनाने में मदद मिलेगी। घाना में उपयुक्त अधिक उत्पादन देने वाली टमाटर किस्मों को बढ़ावा दिया जाएगा। इसका उद्देश्य वहां टमाटर का घरेलू उत्पादन मजबूत करना है।
टमाटर कई देशों में भोजन और खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी पैदावार बढ़ाने के लिए बेहतर किस्में और वैज्ञानिक तरीके जरूरी हैं। स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों से उत्पादन में मदद मिल सकती है। हालांकि, वास्तविक परिणाम खेती की परिस्थितियों पर निर्भर करेंगे।
भारत के कृषि अनुसंधान संस्थानों के पास फसल सुधार का अनुभव है। इस अनुभव को घाना के वैज्ञानिकों के साथ साझा किया जा सकेगा। इससे दोनों देशों के बीच कृषि ज्ञान का आदान-प्रदान बढ़ेगा।
कसावा और दूसरी फसलों पर काम
समझौते में कसावा, याम और दूसरी कंद वाली फसलें भी शामिल हैं। इन फसलों के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर सहयोग होगा। इसका उद्देश्य कृषि उत्पादों की उपयोगिता और मूल्य बढ़ाना है।
कसावा और याम कई अफ्रीकी क्षेत्रों में खाद्य फसलें हैं। इनके बेहतर प्रसंस्करण से किसानों और कृषि कारोबार को अवसर मिल सकते हैं। उत्पादों को अधिक उपयोगी रूप में तैयार करना भी संभव होगा।
मूल्य संवर्धन का अर्थ कृषि उत्पाद को अधिक उपयोगी या मूल्यवान बनाना है। इसके लिए प्रसंस्करण, पैकेजिंग और अन्य तकनीकों का सहारा लिया जा सकता है। समझौते में इन क्षेत्रों में सहयोग की व्यवस्था की गई है।
फसल कटाई के बाद नुकसान घटेगा
कृषि समझौते में फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान पर भी ध्यान दिया गया है। इस काम को कृषि क्षेत्र में पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट (Post-harvest Management) कहा जाता है। इसमें उपज को सुरक्षित रखने और सही तरीके से संभालने के उपाय शामिल हैं।
दोनों देश कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रिजरेटेड परिवहन से जुड़ी तकनीकों पर सहयोग करेंगे। उपज की छंटाई, ग्रेडिंग और प्रसंस्करण भी इसके दायरे में आएंगे। इन व्यवस्थाओं से कृषि उत्पादों को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिल सकती है।
कटाई के बाद उपज खराब होने से किसानों और कारोबारियों को नुकसान होता है। सही भंडारण से उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है। परिवहन और प्रसंस्करण की बेहतर व्यवस्था भी जरूरी है। इस समझौते में इन जरूरतों को शामिल किया गया है।
वैज्ञानिकों और तकनीक का आदान-प्रदान
समझौते में वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के आदान-प्रदान की व्यवस्था है। दोनों पक्ष शोध सामग्री और वैज्ञानिक जानकारी भी साझा कर सकेंगे। इसमें पौधों की आनुवंशिक विविधता से जुड़ी सामग्री शामिल है।
प्रजनन सामग्री और शोध पद्धतियों का आदान-प्रदान भी प्रस्तावित है। इससे फसल सुधार से जुड़े काम को आगे बढ़ाया जा सकेगा। दोनों देशों के संस्थान संयुक्त शोध परियोजनाएं भी तैयार कर सकते हैं।
समझौते का उद्देश्य केवल शोध तक सीमित नहीं है। इसमें विकसित तकनीकों को खेती और कृषि कारोबार में उपयोग करने पर भी जोर है। इससे वैज्ञानिक काम और व्यावहारिक जरूरतों के बीच तालमेल बढ़ सकता है।
संयुक्त समूह करेगा निगरानी
समझौते को लागू करने के लिए संयुक्त कार्य समूह बनाया जाएगा। इसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और घाना के संस्थान के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समूह सहयोग की प्रगति की समीक्षा करेगा।
समूह समझौते के तहत होने वाले कामों को दिशा भी देगा। इसकी बैठकें नई दिल्ली और अक्रा में समय-समय पर होंगी। इससे दोनों संस्थानों के बीच नियमित संपर्क बना रहेगा।
इस व्यवस्था से सहयोग की प्रगति पर नजर रखी जा सकेगी। शोध परियोजनाओं और तकनीकी गतिविधियों की समीक्षा भी संभव होगी। साझेदारी को आगे बढ़ाने में यह समूह अहम भूमिका निभाएगा।
भारत-अफ्रीका सहयोग को बढ़ावा
इन समझौतों को भारत और घाना के व्यापक संबंधों के संदर्भ में देखा जा रहा है। दोनों देशों ने व्यापार, निवेश, विकास और तकनीक पर भी चर्चा की। स्वास्थ्य, रक्षा और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे विषय शामिल रहे।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने घाना के राष्ट्रपति जॉन द्रवामानी महामा से भी मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों के संबंध मजबूत करने पर चर्चा हुई। जयशंकर ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाएं भी पहुंचाईं।
जयशंकर 6 से 10 अक्टूबर तक तीन देशों की यात्रा पर हैं। इस यात्रा में घाना के अलावा कोट द’आइवोर और इथियोपिया शामिल हैं। इसका उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों और सहयोग को आगे बढ़ाना है।
भारत और घाना के बीच कृषि समझौता दक्षिण-दक्षिण सहयोग का हिस्सा है। इसका अर्थ विकासशील देशों के बीच अनुभव और संसाधन साझा करना है। कृषि अनुसंधान में यह साझेदारी दोनों देशों के संस्थानों को जोड़ती है।
इस समझौते से घाना में कृषि तकनीक और शोध को बढ़ावा देने की उम्मीद है। भारत के लिए भी अंतरराष्ट्रीय कृषि सहयोग का दायरा बढ़ेगा। हालांकि, भारतीय किसानों को सीधे मिलने वाले लाभों का विवरण अभी सामने नहीं आया है।
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