मन की बात में खेती पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को मन की बात का 139वां एपिसोड संबोधित किया। इसमें उन्होंने किसानों, कारीगरों और स्थानीय उत्पादों से जुड़ी कई प्रेरक पहलें साझा कीं। उनका जोर स्थानीय उत्पादों को पहचान दिलाने और नए बाजारों तक पहुंचाने पर रहा। उन्होंने लोगों से त्योहारों पर स्थानीय कारीगरों के उत्पाद खरीदने की अपील भी की।
प्रधानमंत्री ने कहा कि स्थानीय उत्पाद अब विदेशी बाजारों तक पहुंच रहे हैं। इससे किसानों और छोटे उत्पादकों के लिए नए अवसर खुल सकते हैं। उन्होंने मखाना, अरहर दाल, बांस के सामान और खादी जैसे उत्पादों के उदाहरण दिए। इन उदाहरणों में खेती के साथ प्रसंस्करण और पैकेजिंग का महत्व भी सामने आया।
किसानों के लिए यह संदेश कई तरह से अहम है। केवल फसल उगाना ही कमाई बढ़ाने का एकमात्र रास्ता नहीं है। सही गुणवत्ता, आकर्षक पैकेजिंग और बाजार तक पहुंच भी जरूरी हैं। स्थानीय उत्पादों को पहचान मिलने से ग्रामीण कारोबार को सहारा मिल सकता है।
मखाना पहुंच रहा ग्रीस
प्रधानमंत्री ने बिहार के पूर्णिया के मखाने का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि यहां का मखाना अब ग्रीस तक पहुंच रहा है। यह स्थानीय कृषि उत्पादों के लिए विदेशी बाजार खुलने का संकेत है। इससे मखाना उत्पादकों को व्यापक बाजार से जुड़ने की संभावना मिलती है।
मखाना बिहार के प्रमुख पारंपरिक उत्पादों में शामिल है। इसकी खेती और प्रसंस्करण से कई ग्रामीण परिवार जुड़े हैं। विदेशों में मांग बढ़ने से इस क्षेत्र में नए अवसर बन सकते हैं। हालांकि, किसानों को इसका सीधा लाभ मिलने के लिए कई कड़ियां मजबूत होनी चाहिए।
उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखना और सही तरीके से पैक करना जरूरी है। खरीदारों की मांग के अनुसार समय पर आपूर्ति भी महत्वपूर्ण है। भंडारण और परिवहन की व्यवस्था ठीक होनी चाहिए। इन कामों में किसान समूहों और प्रसंस्करण इकाइयों की भूमिका अहम हो सकती है।
अरहर दाल का विदेशी बाजार
प्रधानमंत्री ने कर्नाटक के कलबुर्गी की अरहर दाल का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि यह दाल मालदीव तक निर्यात हो रही है। इससे स्थानीय दाल उत्पादकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार की संभावनाएं सामने आती हैं।
अरहर दाल भारतीय भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी मांग घरेलू बाजार में भी रहती है। यदि उत्पादक गुणवत्ता और आपूर्ति बनाए रखें, तो नए बाजारों तक पहुंच संभव हो सकती है। इसके लिए किसानों, कारोबारियों और निर्यातकों के बीच तालमेल जरूरी है।
विदेशी बाजार में पहुंचने के लिए केवल अच्छी फसल पर्याप्त नहीं होती। उत्पाद की सफाई, छंटाई और पैकेजिंग भी मायने रखती है। निर्यात के नियमों और खरीदारों की शर्तों को समझना जरूरी है। इन प्रक्रियाओं से उत्पाद की पहचान और बाजार में भरोसा मजबूत हो सकता है।
रंगीन कपास से नई पहचान
प्रधानमंत्री ने पंजाब के मालवा क्षेत्र में चल रही एक पहल की चर्चा की। इसका नाम खेती विरासत मिशन है। इसके तहत जैविक खेती और पारंपरिक कृषि तरीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस पहल में प्राकृतिक रंगों वाली कपास पर भी काम हो रहा है।
प्राकृतिक रंगों वाली कपास की खासियत यह है कि इसके रेशों में रंग पहले से मौजूद होता है। इससे कपड़ा बनाने के दौरान रासायनिक रंगों की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि, अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता उत्पादन और प्रसंस्करण के तरीके पर निर्भर करती है। ऐसी पहलें खेती और कपड़ा उद्योग के बीच नया संबंध बना सकती हैं।
इस कार्यक्रम के तहत महिलाओं को बुनाई का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। इससे उन्हें कपड़ा बनाने के पारंपरिक कौशल सीखने का मौका मिलता है। प्रशिक्षित महिलाएं शॉल, तौलिये और दूसरे कपड़े तैयार कर सकती हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं के लिए कमाई के नए रास्ते बन सकते हैं।
प्रधानमंत्री ने इस पहल में महिलाओं की भागीदारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कुछ महिलाएं पहले मजदूरी और घरेलू काम करती थीं। प्रशिक्षण के बाद वे बुनाई के काम से जुड़ीं। इससे कौशल विकास और स्थानीय रोजगार के महत्व का पता चलता है।
बांस के उत्पादों की पैकेजिंग
महाराष्ट्र के जनजातीय समुदायों के उत्पादों का उदाहरण भी सामने आया। शबरी नेचुरल्स पहल के तहत कई स्थानीय उत्पाद बाजार में लाए जा रहे हैं। इनमें शहद, महुआ, चिरौंजी और बांस से बने सामान शामिल हैं। इन उत्पादों की पैकेजिंग में जनजातीय कला की झलक दिखाई देती है।
प्रधानमंत्री ने बताया कि इस पैकेजिंग को जापान का प्रतिष्ठित गुड डिजाइन अवॉर्ड मिला है। यह सम्मान उत्पाद की प्रस्तुति और डिजाइन के महत्व को दिखाता है। इससे स्थानीय उत्पादों को अलग पहचान दिलाने में मदद मिल सकती है। पारंपरिक कला को बाजार से जोड़ने का यह एक उदाहरण है।
उन्होंने कर्नाटक के एक स्टार्टअप का भी उल्लेख किया। यह स्टार्टअप बांस और कृषि अवशेषों से पैकेजिंग सामग्री तैयार कर रहा है। इससे कृषि के बचे हुए हिस्सों का उपयोग करने की संभावना बनती है। बांस जैसे संसाधनों से बनी पैकेजिंग नए कारोबार का आधार बन सकती है।
किसानों और छोटे उत्पादकों के लिए पैकेजिंग एक महत्वपूर्ण विषय है। अच्छी पैकेजिंग उत्पाद को सुरक्षित रखने में मदद कर सकती है। इससे खरीदारों को उत्पाद की जानकारी समझने में भी आसानी होती है। सही पैकेजिंग स्थानीय सामान को बाजार में अलग पहचान दिला सकती है।
मिलेट्स की खेती फिर बढ़ी
प्रधानमंत्री ने पूर्वोत्तर भारत में मिलेट्स की खेती लौटने का भी जिक्र किया। मेघालय और नगालैंड में पारंपरिक मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा मिल रहा है। उन्होंने इसे किसानों के लिए नए अवसरों से जोड़ा।
मेघालय के पश्चिम गारो हिल्स जिले में चेकजिंग संगमा ने आधुनिक तरीकों से मिलेट्स उगाए। प्रधानमंत्री के अनुसार, इससे उनकी आय बढ़ी और गांव में जागरूकता भी आई। यह उदाहरण दिखाता है कि पारंपरिक फसलें नए तरीकों के साथ आगे बढ़ सकती हैं। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार खेती का तरीका अपनाना यहां महत्वपूर्ण है।
नगालैंड के कोहिमा जिले के केजोमा गांव में भी खेती फिर शुरू हुई। वहां एक दशक से ज्यादा समय तक मिलेट्स की खेती बंद रही थी। वर्ष 2024 में गांव के लोगों ने इसे दोबारा शुरू किया। वर्ष 2025 में गांव ने अपना पहला मिलेट्स उत्सव भी मनाया।
मिलेट्स की खेती से स्थानीय भोजन और पारंपरिक ज्ञान को भी बढ़ावा मिल सकता है। इससे किसानों को फसल के विकल्प मिलते हैं। हालांकि, खेती बढ़ाने से पहले स्थानीय बाजार और मौसम को समझना जरूरी है। बीज, पानी और बिक्री की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण रहती है।
खादी और स्थानीय कारोबार
प्रधानमंत्री ने खादी की बढ़ती लोकप्रियता का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि गांधी जयंती पर खादी ग्रामोद्योग के उत्पादों की बिक्री एक दिन में 28 करोड़ रुपए से अधिक रही। यह पिछले वर्ष की तुलना में 1.5 करोड़ रुपए ज्यादा थी।
खादी और हस्तशिल्प से जुड़े कई कारीगर अपने कौशल के आधार पर आजीविका कमाते हैं। स्थानीय उत्पादों की मांग बढ़ने से उन्हें अधिक ग्राहक मिल सकते हैं। त्योहारों के दौरान खरीदारी इस कारोबार को सहारा दे सकती है। हालांकि, लंबे समय तक लाभ के लिए नियमित मांग और उचित दाम भी जरूरी हैं।
प्रधानमंत्री ने लोगों से स्थानीय कारीगरों के उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील की। उनका कहना था कि ऐसी खरीदारी से कारीगरों का उत्साह बढ़ेगा। इससे वोकल फॉर लोकल अभियान को भी मजबूती मिल सकती है। इस सोच का लक्ष्य स्थानीय उत्पादन और आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाना है।
किसानों के लिए क्या सीख है?
इन उदाहरणों से किसानों के लिए कई व्यावहारिक बातें सामने आती हैं। पहली बात, स्थानीय फसल और उत्पाद की खासियत पहचानना जरूरी है। दूसरी बात, गुणवत्ता के साथ पैकेजिंग पर भी ध्यान देना चाहिए। तीसरी बात, किसान समूह बनाकर बाजार से बेहतर जुड़ाव बना सकते हैं।
किसानों को किसी नई फसल या उत्पाद को अपनाने से पहले जानकारी जुटानी चाहिए। स्थानीय कृषि विभाग और विशेषज्ञों से सलाह लेना उपयोगी रहेगा। बाजार की मांग और उत्पादन लागत का आकलन करना भी जरूरी है। केवल किसी सफल उदाहरण को देखकर तुरंत बदलाव करना जोखिम भरा हो सकता है।
किसान उत्पादक संगठन, सहकारी समितियां और छोटे उद्यम बाजार तक पहुंच बनाने में मदद कर सकते हैं। इनके जरिए प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बिक्री के अवसर तलाशे जा सकते हैं। स्थानीय उत्पादों की कहानी और उनकी विशेषता ग्राहकों तक पहुंचाना भी महत्वपूर्ण है। इससे किसानों और कारीगरों को अपने उत्पाद की पहचान बनाने में मदद मिल सकती है।
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