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अफीम की खेती के नए नियम: लाइसेंस के लिए बढ़ी मॉर्फीन उपज, अब 4.4 किलो जरूरी

Pawan Modiya | Oct 26, 2026, 11:04 IST

केंद्र सरकार ने 2026-27 के लिए अफीम खेती की लाइसेंस नीति जारी की है। मुख्य श्रेणी में पात्रता के लिए पिछली फसल में मॉर्फीन उपज की सीमा 4.2 से बढ़ाकर 4.4 किलो प्रति हेक्टेयर की गई है। अगले साल के लिए लक्ष्य 5.9 किलो है।

अफीम

अफीम किसानों के लिए नए नियम

अफीम की खेती करने वाले किसानों के लिए केंद्र सरकार ने नई नीति जारी की है। इसमें लाइसेंस पाने और आगे खेती जारी रखने की शर्तें तय की गई हैं। अब मुख्य पात्रता श्रेणी में मॉर्फीन की न्यूनतम उपज का लक्ष्य बढ़ाया गया है। इससे अफीम पोस्ता उगाने वाले किसानों को अपने उत्पादन पर ध्यान देना होगा।

वित्त मंत्रालय ने तीन अधिसूचनाएं जारी कीं। ये अधिसूचनाएं अफीम की खेती के वार्षिक लाइसेंस और पात्रता शर्तों से जुड़ी हैं। नई नीति का फसल वर्ष 1 अक्टूबर 2026 से शुरू हुआ है। यह अवधि 30 सितंबर 2027 तक चलेगी।

अफीम की खेती सामान्य खेती की तरह खुली अनुमति के तहत नहीं होती। इसके लिए केंद्र सरकार से तय नियमों के अनुसार लाइसेंस लेना जरूरी है। किसान केवल अधिसूचित क्षेत्रों में ही इसकी कानूनी खेती कर सकते हैं। लाइसेंस की शर्तें पूरी करना भी जरूरी होता है।

मॉर्फीन उपज की सीमा बढ़ी

नई नीति में मुख्य पात्रता श्रेणी के लिए सीमा बढ़ाई गई है। किसानों को 2025-26 के फसल वर्ष में तय न्यूनतम उपज हासिल करनी थी। इसके लिए प्रति हेक्टेयर कम से कम 4.4 किलोग्राम मॉर्फीन की उपज जरूरी है। पिछली नीति में यह सीमा 4.2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी।

इस बदलाव का असर अगले फसल वर्ष के लाइसेंस पर पड़ेगा। जिन किसानों ने 2025-26 में तय उपज हासिल की, वे पात्रता की इस शर्त को पूरा कर सकते हैं। हालांकि, केवल उपज पर्याप्त नहीं है। उन्हें लाइसेंस नीति की बाकी शर्तें भी पूरी करनी होंगी।

यहां मॉर्फीन की मात्रा और अफीम के कुल वजन में अंतर समझना जरूरी है। नीति में मॉर्फीन की न्यूनतम पात्र उपज का मानक दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि किसान को उतनी मात्रा में अफीम का कुल उत्पादन करना है। पात्रता तय करने में निर्धारित मानक और सरकारी जांच अहम हैं।

अगले साल लक्ष्य 5.9 किलो

सरकार ने अगले फसल वर्ष के लिए भी लक्ष्य बताया है। 2026-27 में प्रति हेक्टेयर कम से कम 5.9 किलोग्राम मॉर्फीन उपज हासिल करनी होगी। यह शर्त 2027-28 में लाइसेंस पाने की मुख्य पात्रता श्रेणी से जुड़ी है।

इस तरह किसानों के सामने उत्पादन का लक्ष्य आगे बढ़ गया है। उन्हें मौजूदा फसल वर्ष में अपनी पात्रता का ध्यान रखना होगा। अगले वर्ष खेती जारी रखने की योजना भी इसी से जुड़ी होगी। किसानों को अपने पिछले उत्पादन और सरकारी रिकॉर्ड की जानकारी रखनी चाहिए।

फिर भी यह नियम सभी किसानों के लिए एकमात्र पात्रता रास्ता नहीं बताता। नीति में कुछ अन्य श्रेणियों के किसानों के लिए भी प्रावधान हैं। इनमें कुछ किसान, जिनकी फसल सरकारी निगरानी में वापस जोती गई थी, शामिल हो सकते हैं। अपील में राहत पाने वाले पात्र किसान भी नियमों के तहत विचार योग्य हैं।

बिना चीरा पोस्ता उगाने वालों के नियम

अफीम पोस्ता की खेती में एक अलग श्रेणी भी है। इसमें पौधों पर चीरा लगाए बिना पोस्ता स्ट्रॉ के लिए खेती की जाती है। इस तरीके में पौधों से चीरा लगाकर अफीम का रस नहीं निकाला जाता। इस श्रेणी के लिए भी न्यूनतम उपज की शर्त निर्धारित है।

उपलब्ध नीति विवरण के अनुसार, इस श्रेणी में सीमा 800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। यह मानक 2025-26 के उत्पादन के आधार पर रखा गया है। इसलिए किसानों को अपनी खेती की श्रेणी सही तरीके से समझनी चाहिए। दोनों श्रेणियों के नियमों को एक जैसा नहीं मानना चाहिए।

किसी किसान की पात्रता उसके लाइसेंस और लागू नीति पर निर्भर करेगी। उसे अपनी श्रेणी से जुड़े दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए। केवल दूसरे किसान के उत्पादन मानक देखकर निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा। जरूरत पड़ने पर संबंधित जिला अफीम अधिकारी से जानकारी ली जा सकती है।

लाइसेंस के लिए अन्य शर्तें

नई नीति में उपज के अलावा भी कई शर्तें रखी गई हैं। किसान को पिछली फसल में लाइसेंस के तहत तय क्षेत्र का पालन करना होगा। अनुमत सीमा से पांच प्रतिशत से ज्यादा अतिरिक्त खेती पर लाइसेंस नहीं मिलेगा। नीति में पांच प्रतिशत तक अतिरिक्त क्षेत्र को कुछ शर्तों के साथ स्वीकार किया जा सकता है।

मुख्य पात्रता श्रेणी में लाइसेंस का अधिकतम क्षेत्र 0.10 हेक्टेयर रखा गया है। यह क्षेत्र एक ही प्लॉट के लिए निर्धारित है। जरूरत के अनुसार किसान दूसरे की जमीन पट्टे पर लेकर क्षेत्र पूरा कर सकते हैं। जमीन और प्लॉट से जुड़े विवरण आवेदन में देना जरूरी है।

अवैध खेती करने वालों के लिए भी नीति में रोक है। संबंधित कानून के तहत आरोपित किसान लाइसेंस की पात्रता खो सकते हैं। पिछले फसल वर्ष में विभागीय निर्देशों का उल्लंघन भी परेशानी बन सकता है। इसलिए केवल उपज का लक्ष्य पूरा करना पर्याप्त नहीं माना जाएगा।

सरकार की निगरानी क्यों जरूरी?

अफीम की खेती भारत में केंद्र सरकार के नियंत्रण में होती है। इसकी अनुमति चिकित्सा और वैज्ञानिक जरूरतों से जुड़े कानूनी ढांचे के तहत दी जाती है। अफीम से मॉर्फीन, कोडीन और अन्य उपयोगी तत्व प्राप्त होते हैं। इनका इस्तेमाल कुछ दवाओं के निर्माण में किया जाता है।

मॉर्फीन का उपयोग गंभीर दर्द कम करने वाली दवाओं में होता है। इसलिए अफीम की गुणवत्ता और उसमें मौजूद तत्वों का आकलन महत्वपूर्ण है। सरकार उत्पादन, खेती के क्षेत्र और लाइसेंस की पात्रता पर निगरानी रखती है। इससे अवैध उत्पादन और गैरकानूनी हस्तांतरण पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है।

भारत में अफीम पोस्ता की कानूनी खेती चुनिंदा क्षेत्रों में ही होती है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश इसके प्रमुख राज्य हैं। खेती के लिए हर साल अलग नीति और पात्रता शर्तें जारी होती हैं। किसानों को हर फसल वर्ष की शर्तें अलग से देखनी चाहिए।

किसानों को अब क्या करना चाहिए?

अफीम की खेती करने वाले किसानों को पहले अपनी लाइसेंस श्रेणी की पुष्टि करनी चाहिए। फिर पिछले फसल वर्ष की उपज और सरकारी रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए। यदि किसी जानकारी में अंतर है, तो संबंधित अधिकारी से संपर्क करना उपयोगी होगा। आवेदन के लिए निर्धारित दस्तावेज भी तैयार रखने चाहिए।

पात्र किसानों को लाइसेंस के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होता है। नीति के अनुसार, पात्रता सूची और आवेदन से जुड़ी जानकारी आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जा सकती है। आवेदन की समयसीमा और आवश्यक विवरण की पुष्टि करना जरूरी है। किसानों को अनधिकृत लोगों के दावों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

नई नीति का सीधा संदेश है कि उपज के मानक अहम हो गए हैं। लेकिन लाइसेंस का फैसला सभी लागू शर्तों को देखकर होगा। इसलिए किसानों को केवल एक आंकड़े के आधार पर अपनी पात्रता तय नहीं करनी चाहिए। सरकारी अधिसूचना और जिला अफीम अधिकारी की जानकारी सबसे उपयोगी रहेगी।

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