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BIRC 2026: चावल निर्यात पर कीटनाशक अवशेषों का खतरा, खेत से जांच जरूरी, विशेषज्ञों ने सुझाए उपाय

Pawan Modiya | Oct 26, 2026, 11:44 IST

भारतीय चावल और दूसरे कृषि उत्पादों के निर्यात में कीटनाशक अवशेष बड़ी चुनौती बन रहे हैं। भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस में विशेषज्ञों ने खेत से निर्यात तक निगरानी, किसानों की जागरूकता, बेहतर जांच और कीट-प्रतिरोधी फसलों पर जोर दिया।

चावल

चावल निर्यात पर बढ़ी चिंता

भारत के चावल और दूसरे कृषि उत्पादों की विदेशों में मांग है। लेकिन निर्यात के दौरान खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां सामने आ रही हैं। इनमें कीटनाशकों के अवशेष एक बड़ी चिंता बनकर उभरे हैं। इससे निर्यात की गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर सवाल उठ सकते हैं।

नई दिल्ली में भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस (BIRC) के दौरान विशेषज्ञों ने इस मुद्दे पर चर्चा की। उन्होंने कृषि उत्पादों की पूरी सप्लाई चेन पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि गुणवत्ता जांच केवल निर्यात के अंतिम चरण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसकी शुरुआत खेत से होनी चाहिए।

विशेषज्ञों के अनुसार, किसानों को सही जानकारी देना भी जरूरी है। कीटनाशकों का इस्तेमाल फसल को कीटों और दूसरे नुकसान से बचाने के लिए होता है। लेकिन गलत इस्तेमाल या जरूरत से ज्यादा उपयोग अवशेषों की समस्या बढ़ा सकता है। इसलिए फसल सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन जरूरी है।

खेत से निर्यात तक निगरानी

एसजीएस इंडिया में खाद्य और प्रयोगशाला सेवाओं की प्रमुख पूर्वी शाह ने पूरी प्रक्रिया पर निगरानी का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि कीटनाशक अवशेषों से जुड़े अलर्ट निर्यात उद्योग को प्रभावित कर रहे हैं। कंटेनर से जुड़ी समस्याएं भी इस कारोबार के सामने चुनौती बन रही हैं।

पूर्वी शाह के अनुसार, समस्या का समाधान एक ही जांच से नहीं होगा। खेत से लेकर आगे के सभी चरणों पर नजर रखना जरूरी है। इसमें फसल उगाने, उपज खरीदने, प्रसंस्करण और निर्यात की तैयारी जैसे चरण शामिल हैं। हर स्तर पर सही जानकारी और गुणवत्ता जांच की भूमिका महत्वपूर्ण है।

यदि खेत में ही समस्या की पहचान हो जाए, तो समय रहते कदम उठाए जा सकते हैं। इससे खराब गुणवत्ता वाली उपज को आगे भेजने का जोखिम घट सकता है। समय पर जांच से निर्यातकों को भी नुकसान से बचने में मदद मिल सकती है। इस तरह निगरानी का उद्देश्य केवल गलती पकड़ना नहीं, बल्कि उसे रोकना भी है।

यूरोप में 1,600 अलर्ट दर्ज

यूरोपीय संघ में खाद्य सुरक्षा से जुड़े अलर्ट इस समस्या की गंभीरता दिखाते हैं। यूरोफिन्स एनालिटिकल सर्विसेज इंडिया के प्रबंध निदेशक पंकज जैमिनी ने आंकड़े साझा किए। उनके अनुसार, पिछले छह वर्षों में यूरोपीय संघ में करीब 1,600 रैपिड अलर्ट दर्ज हुए। इनमें लगभग 1,000 मामले कीटनाशकों से जुड़े थे।

ये आंकड़े बताते हैं कि कीटनाशक अवशेषों का मुद्दा केवल भारत तक सीमित नहीं है। कृषि आधारित कई देशों को ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। किसान फसलों को कीटों से बचाने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन निर्यात के लिए इस्तेमाल और अवशेषों पर लागू मानकों का पालन भी जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खाद्य सुरक्षा की शर्तें पूरी नहीं होने पर व्यापार प्रभावित हो सकता है। किसी खेप की जांच में समस्या मिलने पर उसकी मंजूरी अटक सकती है। इससे निर्यातकों को समय और धन का नुकसान हो सकता है। ऐसे मामलों का असर खरीदारों के भरोसे पर भी पड़ सकता है।

किसानों की भूमिका सबसे अहम

पंकज जैमिनी ने किसानों और कृषि अनुसंधान संगठनों की भागीदारी पर जोर दिया। उनके मुताबिक, समस्या घटाने के लिए पूरी व्यवस्था में बदलाव जरूरी है। किसानों को केवल नियम बताना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें फसल बचाने के बेहतर विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे।

किसानों को कीटनाशकों के सही इस्तेमाल की जानकारी देना जरूरी है। उन्हें फसल और कीट के अनुसार सही सलाह मिलनी चाहिए। बिना जरूरत दवाओं का इस्तेमाल करने से बचना भी महत्वपूर्ण है। इससे अवशेषों का जोखिम घटाने में मदद मिल सकती है।

जैमिनी ने कीट-प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देने की जरूरत भी बताई। ऐसी फसलें कुछ प्रमुख कीटों से होने वाले नुकसान को कम कर सकती हैं। इससे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने की संभावना बनती है। हालांकि, ऐसी किस्मों का चयन स्थानीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार होना चाहिए।

कृषि अनुसंधान संस्थानों की जिम्मेदारी भी इसमें अहम है। उन्हें किसानों की जरूरतों के अनुसार बेहतर किस्मों और फसल सुरक्षा उपायों पर काम करना होगा। नई तकनीक और सही जानकारी खेतों तक पहुंचाना भी जरूरी है। किसानों की भागीदारी के बिना इन प्रयासों का असर सीमित रह सकता है।

जांच और रिकॉर्ड क्यों जरूरी?

निर्यात योग्य कृषि उत्पादों की गुणवत्ता जांच कई चरणों में होनी चाहिए। फसल तैयार होने के बाद उपज की खरीद और प्रसंस्करण पर भी ध्यान देना जरूरी है। निर्यात से पहले उचित नमूने लेकर प्रयोगशाला में जांच की जा सकती है। इससे समस्या का पता समय रहते लगाने में मदद मिलती है।

खेत में इस्तेमाल किए गए कीटनाशकों का रिकॉर्ड रखना भी उपयोगी है। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि कौन-सी दवा इस्तेमाल हुई। जरूरत पड़ने पर जांच के नतीजों की तुलना इन रिकॉर्ड से की जा सकती है। इससे समस्या के संभावित कारण का पता लगाने में सहायता मिलती है।

निर्यातकों को संबंधित बाजार के खाद्य सुरक्षा मानकों की जानकारी रखनी चाहिए। अलग-अलग देशों की शर्तें और जांच की जरूरतें अलग हो सकती हैं। इसलिए केवल सामान्य गुणवत्ता जांच पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। निर्यात के लिए भेजी जा रही उपज को तय मानकों के अनुरूप होना चाहिए।

भारत के कृषि निर्यात पर असर

चावल भारत के प्रमुख कृषि निर्यात उत्पादों में शामिल है। ऐसे में गुणवत्ता से जुड़ी समस्याएं व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी खेप में तय सीमा से अधिक अवशेष मिलते हैं, तो निर्यात प्रभावित हो सकता है। इससे कारोबारी लागत बढ़ने और खरीदारों का भरोसा कमजोर होने का जोखिम रहता है।

इसका असर केवल निर्यातक तक सीमित नहीं रह सकता। गुणवत्ता की समस्या से किसानों की उपज की मांग भी प्रभावित हो सकती है। निर्यात के लिए खरीदी जाने वाली फसल के मानक पूरे नहीं होने पर व्यापारिक अवसर कम हो सकते हैं। इसलिए खेत से ही गुणवत्ता सुधारने की कोशिश जरूरी है।

बेहतर निगरानी से किसानों, मिलों, प्रयोगशालाओं और निर्यातकों के बीच तालमेल मजबूत हो सकता है। हर पक्ष को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। किसानों को सही तरीके से कीटनाशक इस्तेमाल करने होंगे। वहीं, खरीदारों की शर्तें समझना और समय पर जांच करना निर्यातकों के लिए जरूरी रहेगा।

आगे क्या करना होगा?

विशेषज्ञों की सलाह का मुख्य संदेश है कि समस्या का समाधान मिलकर करना होगा। किसानों को जागरूक करने के साथ वैज्ञानिक विकल्प उपलब्ध कराने होंगे। जांच की सुविधा और गुणवत्ता रिकॉर्ड भी बेहतर बनाने होंगे। निर्यात की पूरी प्रक्रिया में निगरानी से जोखिम की पहचान जल्दी हो सकती है।

सरकार, अनुसंधान संस्थानों, परीक्षण प्रयोगशालाओं और निर्यात उद्योग के बीच सहयोग जरूरी है। इससे खाद्य सुरक्षा मानकों को समझना और लागू करना आसान हो सकता है। किसानों तक सही सलाह पहुंचने से फसल सुरक्षा के तरीकों में सुधार की संभावना है। लंबे समय में इससे भारतीय कृषि उत्पादों की विश्वसनीयता मजबूत हो सकती है।

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