छत्तीसगढ़ को देशभर में धान का कटोरा कहा जाता है। यहां धान उत्पादन के साथ पुरानी किस्मों की बड़ी विरासत भी है। राज्य के खेतों में आज भी कई पारंपरिक धान किस्में उगाई जाती हैं। इन किस्मों में अलग स्वाद, खुशबू और पोषण गुण पाए जाते हैं। अब इन खास धान किस्मों को वैज्ञानिक शोध और आधुनिक खेती से जोड़ा जा रहा है। इससे किसानों को सामान्य धान से ज्यादा मूल्य मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
23 हजार धान किस्मों का बैंक
रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) धान की विरासत बचाने का काम कर रहा है। विश्वविद्यालय में धान की 23,250 किस्मों का जर्मप्लाज्म बैंक तैयार किया गया है। इसमें देश के अलग-अलग क्षेत्रों की पारंपरिक किस्में सुरक्षित हैं।
ये किस्में वैज्ञानिकों के लिए शोध का आधार बनी हुई हैं। इनके जरिए मौसम बदलाव और पोषण जरूरतों के अनुसार नई किस्में विकसित की जा सकती हैं।
खास धान पर चल रहा शोध
छत्तीसगढ़ की कई पारंपरिक धान किस्मों को स्वास्थ्य गुणों के लिए जाना जाता है। अब इनके संभावित गुणों को वैज्ञानिक तरीके से समझा जा रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल के अनुसार कई किस्मों पर शोध चल रहा है। इनमें लाइचा, महाराजी और गठुवन जैसी किस्में शामिल हैं। इन किस्मों के उपयोगी गुणों का अध्ययन किया जा रहा है।
लाइचा धान की खासियत
लाइचा धान को स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। शोध में इसके कई फाइटोकेमिकल्स की मौजूदगी सामने आई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सामान्य चावल की तुलना में इसमें कई अतिरिक्त फाइटोकेमिकल्स पाए गए हैं। हालांकि इनके स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन जारी हैं। इसे किसी बीमारी के इलाज का विकल्प नहीं माना जा सकता।
महाराजी और गठुवन धान
महाराजी धान की किस्म पर भी वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है। इसके कुछ घटकों के प्रभावों को लेकर शोध चल रहा है। गठुवन धान को पारंपरिक रूप से स्वास्थ्य उपयोग से जोड़ा जाता रहा है। इसके संभावित औषधीय गुणों को समझने का प्रयास हो रहा है। वैज्ञानिक शोध पूरा होने के बाद ही इनके उपयोग की वास्तविक संभावनाएं स्पष्ट होंगी।
खुशबूदार धान से मिलेगा मूल्य
छत्तीसगढ़ की जवा फूल धान अपनी खुशबू के लिए प्रसिद्ध है। सुगंधित चावल की बाजार में अच्छी मांग रहती है। ऐसी किस्मों की खेती किसानों को बेहतर मूल्य दिला सकती है। इससे पारंपरिक खेती को नई पहचान मिल सकती है। किसानों को विशेष गुणवत्ता वाली फसलों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
फार्मा सेक्टर से जोड़ने की तैयारी
इन विशेष धान किस्मों को भविष्य में फार्मास्यूटिकल और न्यूट्रास्यूटिकल सेक्टर से जोड़ने की योजना है। यदि शोध में इनके उपयोगी तत्वों की पुष्टि होती है तो इनके लिए नए बाजार विकसित हो सकते हैं। इससे किसान केवल अनाज उत्पादन तक सीमित नहीं रहेंगे। वे विशेष उपयोग वाली फसलों से अतिरिक्त आय कमा सकते हैं।
मधुराज-55 से नई उम्मीद
पारंपरिक चपटी गुरुमटिया धान पर भी काम किया गया है। शोध के बाद इसे मधुराज-55 नाम दिया गया। इस किस्म में प्रोटीन सहित कई पोषक तत्व पाए जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसी किस्में भविष्य में पोषण आधारित खाद्य उत्पादों के लिए उपयोगी हो सकती हैं।
किसानों के लिए नया अवसर
पारंपरिक धान को बाजार से जोड़ने पर किसानों की आय बढ़ सकती है। इसके लिए बेहतर उत्पादन और बिक्री व्यवस्था जरूरी होगी। विश्वविद्यालय का लक्ष्य किसानों को विशेष किस्मों की खेती के लिए प्रोत्साहित करना है।
फार्मा, हेल्थ फूड और अन्य उद्योगों से जुड़ाव किसानों के लिए नए अवसर बना सकता है। छत्तीसगढ़ की धान विरासत अब सिर्फ परंपरा नहीं रहेगी। वैज्ञानिक शोध और बाजार से जुड़कर यह किसानों की समृद्धि का माध्यम बन सकती है।
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