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सोयाबीन में पीला मोजेक रोग, ये आसान तरीके आजमाकर बर्बाद होने से बचाएं अपनी फसल

newz@gmail.com | Sep 5, 2026, 21:00 IST

सोयाबीन की फसल में पीला मोजेक और मोजेक रोग का खतरा बढ़ रहा है। पत्तियों पर चितकबरापन दिखे तो सतर्क हो जाएं। ICAR-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने रोगग्रस्त पौधे हटाने और कीटनाशक छिड़काव की सलाह दी है।

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सोयाबीन की फसल पर इस समय एक नए खतरे का साया मंडरा रहा है। पीला मोजेक और सोयाबीन मोजेक रोग किसानों की फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसे देखते हुए किसानों को खेत की नियमित निगरानी करने की सलाह दी गई है।

कैसे पहचानें रोग के लक्षण

पौधों की ऊपरी पत्तियों पर अगर चितकबरापन दिखे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पत्तियों का मुड़ना, सिकुड़ना या कुरकुरा होना भी इस बीमारी का साफ संकेत हो सकता है। यह लक्षण सबसे पहले कुछ चुनिंदा पौधों पर नजर आते हैं।

संक्रमित पत्तियों पर पीले और हरे रंग के मिले-जुले निशान बन जाते हैं। इसे पच्चीकारी जैसे लक्षण भी कहा जाता है। धीरे-धीरे ऐसे पौधों की बढ़वार भी रुक सकती है।

ICAR ने दी सतर्क रहने की सलाह

ICAR यानी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research) के राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने किसानों को रोग की शुरुआती अवस्था में ही सावधानी बरतने की सलाह दी है। संस्थान के मुताबिक समय पर उपाय नहीं किए गए, तो संक्रमण तेजी से दूसरे पौधों तक फैल सकता है।

इसलिए संस्थान ने कहा है कि किसान खेत में दिखने वाले संदिग्ध पौधों की तुरंत पहचान करें। शुरुआती स्तर पर ही ध्यान देने से बड़ा नुकसान टाला जा सकता है।

रोगग्रस्त सोयाबीन पौधों को जड़ सहित उखाड़ें

रोग के लक्षण दिखते ही संक्रमित पौधों को खेत से उखाड़ देना चाहिए। इन्हें खेत के अंदर बिल्कुल नहीं छोड़ना चाहिए। रोगग्रस्त पौधों को खेत से बाहर ले जाकर सुरक्षित तरीके से नष्ट करना जरूरी है।

सिर्फ संक्रमित पत्तियां तोड़ना काफी नहीं होता। पूरे रोगग्रस्त पौधे को जड़ सहित निकालना जरूरी है। इससे खेत में संक्रमण फैलने का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।

सफेद मक्खी और एफिड बनते हैं वाहक

पीला मोजेक और सोयाबीन मोजेक रोग फैलाने में सफेद मक्खी और एफिड कीट अहम भूमिका निभाते हैं। ये कीट संक्रमित पौधों से वायरस उठाकर स्वस्थ पौधों तक पहुंचा देते हैं। इसलिए सिर्फ रोगग्रस्त पौधे हटाना काफी नहीं है, इन कीटों पर नियंत्रण भी जरूरी है।

किसानों को सफेद मक्खी और एफिड की मौजूदगी पर लगातार नजर रखनी चाहिए। इनकी संख्या बढ़ने पर अनुशंसित कीटनाशक का छिड़काव किया जा सकता है। ध्यान रहे कि एक बार में किसी एक ही विकल्प का इस्तेमाल करना चाहिए।

कीटनाशक की सही मात्रा और तरीका

कीटों की रोकथाम के लिए थायामेथोक्सम और लैम्ब्डा-सायहेलोथ्रिन के मिश्रण का 125 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव किया जा सकता है। दूसरा विकल्प बीटा-सायफ्लुथ्रिन और इमिडाक्लोप्रिड का मिश्रण है, जिसकी अनुशंसित मात्रा 350 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर है।

इसके अलावा एसिटामिप्रिड 25 प्रतिशत और बाइफेंथ्रिन 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी के मिश्रण का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इसकी मात्रा 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर तय की गई है। यह उपाय सफेद मक्खी और एफिड के साथ तना मक्खी को नियंत्रित करने में भी मदद कर सकता है।

पीले स्टिकी ट्रैप से मिलेगी मदद

सफेद मक्खी की निगरानी और नियंत्रण के लिए पीले स्टिकी ट्रैप काफी उपयोगी माने जाते हैं। किसानों को खेत में अलग-अलग जगहों पर ये ट्रैप लगाने चाहिए। पीला रंग सफेद मक्खियों को अपनी तरफ आकर्षित करता है और वे ट्रैप की चिपचिपी सतह पर फंस जाती हैं।

किसानों को समय-समय पर ट्रैप की जांच करते रहना चाहिए। अगर ज्यादा कीट फंसे दिखें, तो खेत का बारीकी से निरीक्षण करना चाहिए। इसके बाद जरूरत के हिसाब से नियंत्रण के उपाय अपनाए जा सकते हैं।

छिड़काव में जरूरी सावधानियां

कीटनाशक का इस्तेमाल हमेशा तय मात्रा में ही करना चाहिए। छिड़काव से पहले उत्पाद का लेबल और निर्देश ध्यान से पढ़ लेना चाहिए। दवा मिलाते समय दस्ताने और मास्क पहनना जरूरी है।

तेज हवा या बारिश की आशंका के दौरान छिड़काव नहीं करना चाहिए। फसल की स्थिति और कीटों की संख्या देखकर ही दवा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर स्थानीय कृषि अधिकारी या कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

किसानों को कहां मिलेगी मदद

किसान ब्लॉक या जिला स्तर पर कृषि विस्तार अधिकारी यानी आरएईओ (RAEO) या उप संचालक कृषि कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं। इसके अलावा इंदौर स्थित भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान से सोयाबीन फसल की सुरक्षा और रोग प्रबंधन पर खास मार्गदर्शन लिया जा सकता है।

अगर किसानों को तुरंत सलाह चाहिए, तो वे किसान कॉल सेंटर के टोल-फ्री नंबर 1551 पर कॉल कर सकते हैं। समय पर सही पहचान और नियंत्रण से सोयाबीन की फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है।

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