मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में मिर्च की फसल मुसीबत बन गई है। यह मुसीबत किसानों के लिए बड़ी परेशानी है। ग्राम बालकुआं और आसपास के इलाकों में इस साल यह हुआ है। मिर्च की फसल पर वायरस का गंभीर हमला हुआ है। कई किसानों ने कर्ज लेकर लाखों रुपए की फसल लगाई थी। अब यह फसल तेजी से सूख रही है। किसानों ने प्रशासन से सर्वे कराने की मांग की है। साथ ही उन्होंने जल्द मुआवजे की भी मांग रखी है।
बालकुआं में नकदी फसल मिर्च
बालकुआं क्षेत्र में मिर्च और कपास की खेती बड़े पैमाने पर होती है। यहां मिर्च किसानों की सबसे बड़ी नकदी फसल मानी जाती है। इसी फसल से किसानों को हर साल अच्छी आमदनी होती है। लेकिन इस बार वायरस ने पूरा गणित बिगाड़ दिया है। शुरुआत में कुछ पौधे प्रभावित हुए थे। देखते ही देखते बीमारी पूरे खेत में फैल गई। कई किसानों की फसल अब बर्बादी की कगार पर है।
8 एकड़ में मिर्च, भारी खर्च
ग्राम बालकुआं के किसान हीरालाल बरफा के मुताबिक उन्होंने मिर्च लगाई थी। यह खेती 8 एकड़ में इसी साल की गई थी। नर्सरी, खाद, दवा और सिंचाई पर लाखों खर्च हुए हैं। मजदूरी मिलाकर अब तक करीब 6 लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। शुरुआत में फसल अच्छी दिख रही थी। उन्हें 20 से 25 लाख रुपए तक मुनाफे की उम्मीद थी।
यहां की मिर्च राजस्थान के जोधपुर तक भेजी जाती है। महाराष्ट्र तक भी इसकी मांग रहती है। लेकिन वायरस लगने के बाद फसल तेजी से खराब होने लगी। उनके मुताबिक करीब 40 से 50 प्रतिशत फसल बर्बाद हो चुकी है। उनका कहना है कि गांव के 20 से 22 किसान इसी परेशानी में हैं।
कर्ज लेकर की गई खेती
हीरालाल बरफा ने बताया कि खेती के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ा। यह कर्ज करीब 5 लाख रुपए का था। बाकी रकम उन्होंने घर से जुटाई थी। अब लागत निकालना भी मुश्किल दिखाई दे रहा है।
उनका कहना है कि सरकार ने समय पर मदद नहीं की। ऐसे में किसान आर्थिक संकट में फंस सकते हैं। अब उन्हें उम्मीद सिर्फ रबी सीजन की फसल से है। इस सीजन में वे चना लगाने की योजना बना रहे हैं।
10 एकड़ में 90% नुकसान
गांव के ही किसान गजानन खेमा राठौड़ ने भी अपनी परेशानी बताई। उन्होंने 10 एकड़ जमीन लीज पर लेकर मिर्च की खेती की थी। खेत मालिक को करीब 5 लाख रुपए चुकाने हैं। बीज, नर्सरी, खाद और दवा पर भी लाखों रुपए खर्च हुए हैं।
उनके मुताबिक फसल में 720 कंपनी का बीज लगाया गया था। वायरस लगने के बाद उन्होंने दवाइयों का छिड़काव भी कराया। कई कंपनियों की दवाइयां आजमाई गईं। इसके बावजूद कोई फायदा नहीं मिला। उनका कहना है कि अब करीब 90 प्रतिशत फसल वायरस की चपेट में है। सिर्फ 10 प्रतिशत फसल ही बची है।
बीज-दवा क्वालिटी पर सवाल
किसानों का आरोप है कि बीज की क्वालिटी संदेह के घेरे में है। दवाइयों की क्वालिटी पर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि इस बारे में अभी कोई आधिकारिक जांच पूरी नहीं हुई है। यह आरोप अभी साबित होना बाकी है। किसानों की मांग है कि इसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए।
उनका कहना है कि दोषी पाए जाने पर कार्रवाई होनी चाहिए। यह कार्रवाई संबंधित कंपनियों पर होनी चाहिए। किसान चाहते हैं कि सरकार जल्द कदम उठाए।
वायरस फैलने का कारण
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक मिर्च में यह वायरस खास तरीके से फैलता है। इसका मुख्य कारण सफेद मक्खी और थ्रिप्स जैसे कीट हैं। ये कीट पौधों का रस चूसते हैं। इसी दौरान वायरस एक पौधे से दूसरे में पहुंच जाता है। वायरस लगने पर पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं।
पौधों की बढ़वार भी रुक जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका कोई सीधा इलाज नहीं है। इसलिए शुरुआत में ही बचाव करना सबसे जरूरी है। इसके लिए प्रमाणित बीज का इस्तेमाल जरूरी बताया गया है। समय-समय पर कीट नियंत्रण भी जरूरी है। रोगग्रस्त पौधों को तुरंत खेत से हटाने की सलाह दी जाती है।
किसानों की प्रमुख मांगें
प्रभावित किसानों ने प्रशासन के सामने कुछ प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली मांग है कि प्रभावित गांवों का तुरंत सर्वे हो। इसके बाद वायरस फैलने के कारणों की वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए। किसानों का कहना है कि नुकसान का सही आकलन हो। इसके बाद उन्हें जल्द मुआवजा दिया जाए। साथ ही बीज और कीटनाशक कंपनियों की जांच भी हो।
किसानों को डर है कि राहत में देरी होने पर नुकसान बढ़ सकता है। कुछ किसान खेती छोड़ने को भी मजबूर हो सकते हैं। इसका असर आने वाले सीजन की खेती पर भी पड़ सकता है। किसानों को उम्मीद है कि प्रशासन जल्द उनके खेतों तक पहुंचेगा। कृषि विभाग की मदद से ही उनकी मेहनत और पूंजी वापस मिल सकती है। फिलहाल गांव के किसान अपनी फसल को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं।
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