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वाटरशेड परियोजना की मंजूरी अब तीन महीने में, केंद्र की नई तकनीकी गाइडलाइन में डेटा और जल संरक्षण पर जोर

newz@gmail.com | Sep 26, 2026, 21:00 IST

वाटरशेड परियोजनाओं की डीपीआर मंजूरी का समय छह महीने से घटाकर तीन महीने करने की तैयारी है। केंद्र ने नई तकनीकी गाइडलाइन पर चर्चा की है। इसमें डेटा, जल विज्ञान और डिजिटल सिस्टम के बेहतर इस्तेमाल पर जोर दिया गया है।

वाटरशेड परियोजना

देश के वर्षा आधारित खेती वाले इलाकों के लिए अहम बदलाव सामने आया है। वाटरशेड परियोजनाओं की मंजूरी प्रक्रिया तेज करने की तैयारी है। राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण ने नई तकनीकी गाइडलाइन पर चर्चा की। बैठक में डीपीआर तैयार करने का समय घटाने पर सहमति बनी। यह समय छह महीने से घटाकर तीन महीने किया जा सकता है। इसका उद्देश्य परियोजनाओं के काम के लिए ज्यादा समय देना है।

यह जानकारी 22 सितंबर की राष्ट्रीय तकनीकी समिति बैठक से सामने आई। बैठक नई दिल्ली के एनएएससी परिसर में आयोजित हुई थी। इसकी अध्यक्षता एनआरएए के सीईओ डॉ. चंद्र शेखर कुमार ने की।

नई गाइडलाइन पर काम जारी

यह बैठक रिवार्ड कार्यक्रम के तहत आयोजित की गई थी। REWARD का पूरा नाम Rejuvenating Watersheds for Agricultural Resilience through Innovative Development है। यह विश्व बैंक की मदद से चल रहा कार्यक्रम है। बैठक में राष्ट्रीय तकनीकी गाइडलाइन के दूसरे मसौदे पर चर्चा हुई। इसे भविष्य की वाटरशेड परियोजनाओं के लिए तैयार किया जा रहा है।

यह गाइडलाइन प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 3.0 से जुड़ी होगी। इसका वाटरशेड विकास घटक आगे की परियोजनाओं में उपयोग होगा। केंद्र के अनुसार, गाइडलाइन वैज्ञानिक वाटरशेड योजना पर जोर देगी।

बैठक में करीब 45 विशेषज्ञ और अधिकारी शामिल हुए। इनमें केंद्र और राज्य स्तर के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे। कृषि अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञ शामिल हुए। गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी चर्चा में भाग लिया। ओडिशा और कर्नाटक के प्रतिनिधि भी बैठक में शामिल हुए।

डीपीआर समय घटाने पर जोर

भूमि संसाधन विभाग के संयुक्त सचिव नितिन खाड़े ने अहम सुझाव दिया। उन्होंने डीपीआर तैयार करने का समय छह महीने से तीन महीने करने की बात कही। उनके अनुसार, इससे काम शुरू करने के लिए ज्यादा समय मिलेगा। उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल पर भी जोर दिया। इसे नई तकनीकी गाइडलाइन में शामिल करने का सुझाव दिया गया।

डीपीआर यानी Detailed Project Report परियोजना की विस्तृत योजना होती है। इसकी तैयारी और मंजूरी में ज्यादा समय लग सकता है। समय घटने पर राज्यों को परियोजनाएं जल्दी आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि तीन महीने की अवधि अभी अंतिम लागू नियम नहीं है। यह नई गाइडलाइन की प्रक्रिया में प्रस्तावित बदलाव है।

डेटा आधारित योजना बनेगी

आईसीएआर के उप महानिदेशक डॉ. ए.के. नायक ने अहम सुझाव दिया। ICAR का पूरा नाम Indian Council of Agricultural Research है। उन्होंने नई गाइडलाइन में कार्यप्रणाली साफ रखने पर जोर दिया। इससे परिणामों और निष्कर्षों की जांच आसान होगी। उन्होंने भूमि संसाधन सूची और जल विज्ञान को जोड़ने की बात कही।

LRI का पूरा नाम Land Resource Inventory है। इससे भूमि की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन किया जाता है। नई गाइडलाइन में ऐसे आंकड़ों के बेहतर इस्तेमाल पर जोर है। जल विज्ञान के आंकड़ों को भी योजना से जोड़ने की तैयारी है।

बैठक में साझा निर्णय सहायता प्रणाली बनाने पर भी सहमति बनी। DSS का पूरा नाम Decision Support System है। इसका इस्तेमाल योजना और फैसलों में मदद के लिए किया जाएगा। राज्यों और अन्य पक्षों के बीच डेटा साझा करना आसान होगा। इसके लिए एक अलग वेब पोर्टल विकसित करने की योजना है।

इस पोर्टल से परियोजनाओं की निगरानी आसान होगी। साथ ही, जरूरी जानकारी साझा करने में भी मदद मिलेगी। डिजिटल व्यवस्था से योजना प्रक्रिया में डेटा की भूमिका बढ़ेगी।

ओडिशा और कर्नाटक से डेटा मांगा

बैठक में ओडिशा और कर्नाटक से आंकड़े साझा करने को कहा गया। इनमें वाटरशेड और जल विज्ञान से जुड़े डेटा शामिल हैं। इन आंकड़ों का इस्तेमाल नई गाइडलाइन को बेहतर बनाने में होगा। डेटा का विश्लेषण और रिपोर्ट तैयार करने पर भी काम होगा।

इससे गाइडलाइन में दिए दावों की पुष्टि करने में मदद मिलेगी। एनआरएए ने राज्यों से डेटा साझा करने की अपील की है। यह डेटा भविष्य की योजना तैयार करने में भी उपयोगी होगा।

एनआरएए के सीईओ डॉ. चंद्रशेखर कुमार ने डेटा सत्यापन पर जोर दिया। उन्होंने रिवार्ड कार्यक्रम से मिले आंकड़ों के आधार पर दावों की जांच कही। इससे नई गाइडलाइन को ज्यादा तथ्य आधारित बनाने में मदद मिलेगी। बैठक में वेब पोर्टल को जल्द विकसित करने की जरूरत भी सामने आई।

किसानों को क्या फायदा होगा

भारत के कई हिस्सों में खेती बारिश पर निर्भर हैं। ऐसे क्षेत्रों में पानी रोकना खेती के लिए अहम है। वाटरशेड परियोजनाओं में कई तरह के जल संरक्षण काम होते हैं। इनमें चेक डैम और तालाब गहरीकरण जैसे काम शामिल हैं। कंटूर बंडिंग और मिट्टी संरक्षण भी इसका हिस्सा हो सकते हैं।

इन कामों से खेतों में नमी बचाने में मदद मिलती है। भूजल स्तर बढ़ाने में भी ऐसे काम उपयोगी हो सकते हैं। सूखे के असर को कम करने में भी इनकी भूमिका हो सकती है। सरकार की पिछली जानकारी में भी इन्हीं लक्ष्यों पर जोर दिया गया है।

डीपीआर की प्रक्रिया तेज होने से परियोजनाओं की शुरुआत जल्दी हो सकती है। इससे जल संरक्षण ढांचे का लाभ पहले पहुंचने की संभावना बनेगी। हालांकि लाभ मंजूरी और जमीन पर काम शुरू होने पर निर्भर रहेगा। नई तकनीकी गाइडलाइन इस प्रक्रिया को ज्यादा वैज्ञानिक बनाने की कोशिश है।

नई गाइडलाइन कब लागू होगी

अभी नई राष्ट्रीय तकनीकी गाइडलाइन को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चल रही है। ओडिशा और कर्नाटक से डेटा मिलने के बाद समीक्षा आगे बढ़ेगी। इसके बाद गाइडलाइन को अंतिम रूप दिया जाएगा। इसे भविष्य की वाटरशेड परियोजनाओं में इस्तेमाल करने की योजना है।

इस गाइडलाइन का संबंध प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 3.0 से रहेगा। इसलिए आगे की परियोजनाओं में इसकी भूमिका अहम हो सकती है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, गाइडलाइन में आधुनिक तकनीक भी शामिल होगी। इसमें भूमि संसाधन, जल विज्ञान और डिजिटल सिस्टम शामिल हैं।

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