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इथेनॉल में मक्का की मांग बढ़ी, फिर भी MSP में 253 रुपए का अंतर, किसानों को नहीं मिल रहा सही दाम

newz@gmail.com | Sep 10, 2026, 20:48 IST

अगस्त 2026 में मक्के का औसत थोक भाव 2,157 रुपए रहा। यह 2,410 रुपए के MSP से 253 रुपए कम है। इथेनॉल में मक्के की मांग बढ़ी है। किसान संगठनों का आरोप है कि बढ़ती मांग का फायदा उत्पादकों तक नहीं पहुंच रहा।

मक्का एमएसपी

देश में मक्का अब भोजन और पशु आहार तक सीमित नहीं है। एथेनॉल उद्योग में भी इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। इसके बावजूद किसानों को बाजार में उचित कीमत नहीं मिल रही। अगस्त 2026 में मक्के का राष्ट्रीय औसत भाव 2,157 रुपए रहा।

जुलाई में औसत भाव 2,115 रुपए प्रति क्विंटल था। महीनेभर में केवल 42 रुपए प्रति क्विंटल का सुधार हुआ। यह बढ़ोतरी करीब दो फीसदी बैठती है। किसानों के लिए यह सुधार पर्याप्त राहत नहीं बन सका।

MSP से 253 रुपए कम भाव

MSP (Minimum Support Price) का मतलब न्यूनतम समर्थन मूल्य होता है। केंद्र ने 2026-27 के लिए मक्के का MSP 2,410 रुपए तय किया। अगस्त का राष्ट्रीय औसत भाव इससे 253 रुपए कम रहा। यानी किसान को औसतन करीब 10.5 फीसदी कम कीमत मिली।

हर किसान को मंडी में MSP मिलना जरूरी नहीं होता। इसके लिए सरकारी खरीद व्यवस्था और केंद्रों की उपलब्धता महत्वपूर्ण रहती है। खरीद सीमित होने पर किसान खुले बाजार पर निर्भर होता है। ज्यादा आवक के दौरान व्यापारी कम कीमत लगा सकते हैं।

इथेनॉल मांग का लाभ कहां

सरकार पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने को लगातार बढ़ावा दे रही है। इससे मक्का ऊर्जा क्षेत्र का महत्वपूर्ण कच्चा माल बना है। कृषि बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक किसानों को बेहतर भाव मिलना चाहिए था। बढ़ती औद्योगिक मांग से फसल की कीमत मजबूत होनी चाहिए। किसान संगठनों का दावा अलग तस्वीर दिखाता है। उनके अनुसार, बढ़ती मांग का फायदा उद्योग तक सीमित है।

किसानों का कहना है कि मक्का आधारित इथेनॉल करीब 70 रुपए लीटर बिकता है। फिर भी मक्का उत्पादकों को लाभकारी कीमत नहीं मिल रही। यह कीमत किसानों और संगठनों के दावे पर आधारित है। रिपोर्ट में उद्योग की उत्पादन लागत उपलब्ध नहीं कराई गई।

इन राज्यों में बढ़े दाम

अगस्त में कुछ राज्यों में मक्के की कीमतों में तेजी आई। दिल्ली में भाव 31.9 फीसदी बढ़ा। हरियाणा में मासिक बढ़ोतरी 30.6 फीसदी दर्ज हुई। पंजाब में मक्का 14.2 फीसदी महंगा हुआ।

असम में कीमतों की मासिक बढ़ोतरी 10 फीसदी रही। आंध्र प्रदेश में मक्के का भाव 6.3 फीसदी बढ़ा। बढ़ोतरी के बावजूद कई बाजारों में कीमतें MSP से कम रहीं। इसलिए मासिक तेजी किसानों के लिए पर्याप्त नहीं मानी गई।

चार राज्यों में बेहतर भाव

पश्चिम बंगाल में मक्का 2,539 रुपए प्रति क्विंटल रहा। यह राज्यवार सूची में सबसे ऊंचा भाव था। तमिलनाडु में कीमत 2,498 रुपए प्रति क्विंटल दर्ज हुई। कर्नाटक में भाव 2,485 रुपए प्रति क्विंटल रहा। आंध्र प्रदेश में मक्का 2,443 रुपए प्रति क्विंटल बिका। इन चारों राज्यों का औसत भाव घोषित MSP से अधिक था।

हालांकि, राज्य औसत हर मंडी की वास्तविक कीमत नहीं बताता। गुणवत्ता और स्थानीय मांग से भाव बदल सकता है। परिवहन खर्च और नमी का स्तर भी कीमत प्रभावित करता है। अलग किस्मों के मक्के को अलग भाव मिल सकता है।

उत्पादक राज्यों में दबाव

उत्तर प्रदेश और हरियाणा में मक्के के भाव दबाव में रहे। पंजाब और राजस्थान में भी किसानों को कमजोर कीमतें मिलीं। ओडिशा और मध्य प्रदेश जैसे उत्पादक राज्य भी प्रभावित रहे। उपलब्ध रिपोर्ट में इनके सटीक औसत भाव नहीं दिए गए। इसलिए इन राज्यों के लिए कोई अतिरिक्त आंकड़ा जोड़ना उचित नहीं होगा। रिपोर्ट केवल भाव पर बाजार दबाव की जानकारी देती है। मक्के की नई खरीफ आवक आने पर दबाव बढ़ सकता है। ज्यादा आपूर्ति के बीच कमजोर खरीद कीमत और घटा सकती है।

उत्तराखंड में बड़ा नुकसान

उत्तराखंड में मक्के के भाव में सबसे बड़ी मासिक गिरावट आई। कीमत 33.5 फीसदी गिरकर 1,380 रुपए प्रति क्विंटल रह गई। यह भाव राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम था। घोषित MSP से अंतर 1,030 रुपए प्रति क्विंटल रहा।

तेलंगाना और गुजरात में भी कीमतों में गिरावट दर्ज हुई। मूल रिपोर्ट में गिरावट का सटीक प्रतिशत नहीं दिया गया। कम भाव मिलने पर किसान की लागत निकालना मुश्किल होता है। कटाई और परिवहन खर्च भी उसकी आमदनी घटाते हैं।

किसान संगठनों की मांग

मक्का उत्पादक संगठनों ने खरीद व्यवस्था मजबूत करने की मांग की है। उनका कहना है कि एथेनॉल नीति का लाभ खेत तक पहुंचे। संगठनों ने मूल्य निर्धारण प्रणाली में सुधार की जरूरत बताई। उद्योग की सीधी खरीद बढ़ाने की मांग भी सामने आई।

विशेषज्ञों के अनुसार मूल्य श्रृंखला में किसान सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। फिर भी लाभ का बड़ा हिस्सा ऊपर तक सीमित दिखता है। सरकारी खरीद बढ़ने से बाजार को मजबूत मूल्य संकेत मिल सकता है। उद्योग की सीधी भागीदारी भी किसानों के विकल्प बढ़ा सकती है।

नई आवक से बढ़ सकती चिंता

आने वाले महीनों में खरीफ मक्के की नई आवक बढ़ेगी। ज्यादा आवक के कारण कीमतों पर दबाव बन सकता है। सरकारी खरीद नहीं बढ़ी तो किसानों की परेशानी गहरा सकती है। उद्योग की मांग और मंडी भाव में तालमेल जरूरी होगा।

किसान चाहते हैं कि मक्के को केवल औद्योगिक कच्चा माल नहीं माना जाए। इसे लाभकारी कृषि फसल के रूप में भी देखा जाए। बढ़ती मांग का सीधा फायदा उत्पादक को मिलना जरूरी है। तभी एथेनॉल विस्तार किसान आय का माध्यम बन सकेगा।

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