देश में इस साल बासमती चावल का उत्पादन घट सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह खेती के रकबे में आई कमी है। इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के मुताबिक रकबा करीब एक लाख हेक्टेयर घटा है। यह साल 2025 के मुकाबले करीब चार प्रतिशत कम बताया जा रहा है। रकबे में सबसे ज्यादा गिरावट पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में दर्ज हुई है। इसका सीधा असर आने वाले महीनों में भाव पर पड़ सकता है। बाजार में बासमती की कीमतें पहले ही चढ़ने लगी हैं।
लगातार दूसरे साल गिरावट
रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2025 में करीब 24.9 लाख हेक्टेयर में बासमती की खेती हुई थी। इस साल इसमें करीब एक लाख हेक्टेयर की कमी बताई जा रही है। इससे पहले साल 2024 में यह रकबा करीब 27.5 लाख हेक्टेयर था। यानी लगातार दूसरे साल बासमती का क्षेत्रफल घटा है। दो साल में कुल गिरावट का आंकड़ा काफी बड़ा बैठता है। जानकारों का मानना है कि इसका असर कुल उत्पादन पर दिखेगा।
पंजाब में अलग तस्वीर
पंजाब में बासमती का रकबा पिछले साल के लगभग बराबर बना हुआ है। यहां उत्पादन पिछले साल से बेहतर रहने की उम्मीद जताई जा रही है। इसकी वजह पिछले सीजन का नुकसान है। साल 2025 में पंजाब में भारी बारिश और बाढ़ आई थी। इससे बासमती की फसल को बड़ा नुकसान हुआ था। इस बार हालात बेहतर रहने से पैदावार सुधर सकती है।
एमपी में भी घटा रकबा
बासमती की खेती कुछ ऐसे राज्यों में भी होती है। ये राज्य जीआई टैग वाले प्रमुख बासमती क्षेत्रों में नहीं आते। मध्य प्रदेश भी इन्हीं राज्यों में शामिल है। इस साल कम बारिश का असर एमपी की चावल खेती पर भी पड़ा है। चार सितंबर तक राज्य में चावल का रकबा पिछले साल से कम रहा। यह कमी करीब 1.75 लाख हेक्टेयर बताई जा रही है। साल 2025 के खरीफ सीजन में राज्य में करीब 42.10 लाख हेक्टेयर में चावल बोया गया था। इंडस्ट्री का एक अनुमान भी सामने आया है। इसके मुताबिक एमपी में छह से सात लाख हेक्टेयर में बासमती होती है। रकबे में आई कमी का बड़ा हिस्सा बासमती से जुड़ा बताया जा रहा है।
एमपी के किसानों पर असर
एमपी के कई जिलों में बासमती अब नकदी फसल मानी जाती है। रकबा घटने से राज्य की कुल आवक कम रह सकती है। कम आवक के दौर में मंडी भाव मजबूत रहने की गुंजाइश बनती है। जिन किसानों की फसल अच्छी रही, उन्हें इसका फायदा मिल सकता है। लेकिन कम बारिश वाले इलाकों में पैदावार पर दबाव रह सकता है। ऐसे किसानों के लिए बढ़ा हुआ भाव भी नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगा।
कीमतों में 15 से 20 फीसदी तेजी
रकबा घटने के बीच भारतीय बासमती के भाव में तेजी दिख रही है। इस समय भाव करीब 1,160 डॉलर प्रति टन बताया जा रहा है। यह पिछले साल के मुकाबले करीब 15 से 20 फीसदी ज्यादा है। इससे निर्यातकों को बेहतर दाम पर सौदा करने का मौका मिल सकता है। पश्चिमी एशिया के बाजार में भारतीय बासमती की मांग हमेशा अच्छी रहती है। इस क्षेत्र में चल रहे तनाव के बीच भी मांग बनी हुई है। निर्यातकों को उम्मीद है कि बाजार से बेहतर कीमत मिलती रहेगी।
करनाल में शुरू हुई आवक
हरियाणा के करनाल में पूसा 1509 बासमती की आवक शुरू हो चुकी है। यह किस्म दूसरी बासमती किस्मों से जल्दी तैयार हो जाती है। इसी वजह से मंडी में इसकी आवक भी पहले शुरू होती है। करनाल में फिलहाल यह करीब 3,950 रुपए प्रति क्विंटल बिक रही है। व्यापारियों के मुताबिक शामली जिले से आने वाली बासमती की भी अच्छी मांग है। उनका कहना है कि प्रीमियम किस्म पूसा 1121 का रकबा कम रहा है। ऐसे में आगे भाव में और तेजी की उम्मीद जताई जा रही है।
किसान क्या रखें ध्यान
भाव में तेजी के दौर में जल्दबाजी में फसल बेचना नुकसान दे सकता है। किसानों को मंडी भाव पर लगातार नजर रखनी चाहिए। नमी की मात्रा सही होने पर ही उपज मंडी ले जाना बेहतर रहता है। ज्यादा नमी होने पर व्यापारी दाम काट लेते हैं। किस्म के हिसाब से भाव में बड़ा अंतर रहता है। पूसा 1121 जैसी प्रीमियम किस्मों के दाम आमतौर पर ऊंचे मिलते हैं। उपज की सफाई और ग्रेडिंग से भी भाव बेहतर मिल सकता है।
आगे क्या हो सकता है
बासमती का बाजार काफी हद तक निर्यात मांग पर टिका रहता है। मांग बनी रही और उत्पादन कम रहा तो भाव मजबूत रह सकते हैं। ऐसे में किसानों को फसल के बेहतर दाम मिलने की उम्मीद है। निर्यातकों के लिए भी यह सीजन फायदे का साबित हो सकता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति लगातार बदलती रहती है। किसी बड़े देश की नीति में बदलाव का असर भाव पर पड़ सकता है। आने वाले हफ्तों में पूरी तस्वीर साफ होने की उम्मीद है।
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